Tuesday, March 7, 2017

तकब #२ @२०१७


नमस्कार मित्रों 
पुन: आपके समक्ष एक चित्र रख रहा हूँ. इस बार दिए गए चित्र को "व्यंग्य" भाव देने है आपको. नियम व् शर्ते उसी रूप में होंगी, चयन प्रक्रिया भी उसी रूप में रहेगी. श्रेष्ठ रचना को सम्मान पत्र से पुरस्कृत किया जाएगा.
निम्नलिखित बातो को अवश्य पढ़िए.
१. अपने भावों को कम से कम ८ - १० पंक्तियों की काव्य रचना शीर्षक सहित लिखिए. एक सदस्य एक ही रचना लिख सकता है. 
२. यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
[एक निवेदन- टाइपिंग के कारण शब्द गलत न पोस्ट हों यह ध्यान रखिये. अपनी रचना को पोस्ट करने से पहले एक दो बार अवश्य पढ़े]
३. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है जिसमे आपने रचना में उदृत भाव के विषय में सोच को स्थान देना है. 
४. आपके भाव अपने और नए होने चाहिए. [ पुरानी रचनाओं को शामिल न कीजिये ]
५. इस चित्र पर भाव लिखने की अंतिम तिथि १८ फरवरी, २०१७ है.
६. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा. साथ ही कोई भी ऐसी बात न लिखे जिससे निर्णय प्रभावित हो.
७. आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक समाप्ति की विद्धिवत घोषणा न हो तथा ब्लॉग में प्रकशित न हो.
८. विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और निर्णायक दल के सदस्य भी एक सदस्य की भांति अपनी रचनाये लिखते रहेंगे. हाँ अब उनकी रचनाये केवल प्रोत्साहन हेतू ही होंगी.
धन्यवाद !

इस तस्वीर के विजेता है सुश्री किरण श्रीवास्तव एवं श्री गोपेश दशोरा 


दीपक अरोड़ा
~ कब होगा उजाला ~

भ्रष्टाचार का चहुं ओर है बोलबाला
न्याय का हो रहा है मुंह काला
ऑर्डर ऑडर बस करते रहते
छीनते गरीब के मुंह से निवाला
अपने पद की महत्ता न समझी कभी
कागज के टुकड़ों से इसे है धो डाला
जाने कब छंटेगा इनके आगे से अंधेरा
कब फैलेगा ईमानदारी और नेकनीयत का उजाला


टिप्पणी- देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को खत्म करना मुश्किल जरूर है लेकिन नामुमकिन नहीं है। हर कोई यह ठान ले कि रिश्वत देना ही नहीं है तो हो सकता है उनका कार्य विलम्ब से हो, मगर होगा जरूर क्योंकि हम खुद साथ देते हैं इसलिए ही ऐसे कृत्य को बढावा मिलता है।



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~ऑर्डर - ऑर्डर~

जब
काया का रूप भाया
ढलती उम्र का
ख्याल तो आया
लेकिन
दिल के
टूटे फूटे दरवाजे पर
दस्तक देती
उसकी कातिल मुस्कान
कुछ समझ से परे था
लेकिन वक्त ने
करा दी जान पहचान
इश्क की अदालत में
मस्तिष्क ने
दिल को दे ही दिया
ऑर्डर - ऑर्डर

बूढ़ी हड्डियाँ
फिर जवान हो उठी
आँखों के परदे पर
मन आतुर हुआ गाने को
तू कितने बरस की ...
तू सोलह मै सतरहा
हटाकर चश्मे का पहरा
भावनाओं के सागर से
भर अहसास की गागर
जोश में खोकर होश
आँखों ने
दिल को दे ही दिया
ऑर्डर - ऑर्डर

बस नई नई जवानी
अंगडाई लेने ही वाली थी
हर उभरता ख़्वाब
सच होने ही वाला था
उम्र का पतझड़
बसंती राह पकड़ने वाला था
कि
एक कड़कती
फेफड़ो को फुलानी वाली
मधुर सी कर्कश आवाज ने
निंद्रा भंग करते हुए कहा
क्या अभी तक सोते हो
उठो ! चाय बनाकर लाओ
और सुनो पतिदेव
एक अपनी एक मेरी
चाय पीते हुए
सेल्फी खिंचवाओं
फेसबुक पर अपलोड करो
अपनी
महिला मित्रो को जलने दो
ये मेरा है
ऑर्डर - ऑर्डर



टिप्पणी: कभी कहीं पढ़ा था ..
कौन कहता है बूढ़े इश्क नही करते ...
वो इश्क करते है लेकिन लोग शक नही करते ....
सोचा इसे यह रूप दिया जाए ख़्वाब में सही लेकिन हकीकत से पहचान भी करवाई जाए :) :)




किरण श्रीवास्तव 
°ये कैसा कानून°


आर्डर- आर्डर
मत कर भईये
बहरापन बढ़ जायेगा,
अंधा तो पहले से
ही था...,
बहरा भी हो जायेगा!

कोई करे घोटाला
कोई डाले डाका,
पर वही जेल में
चक्की पीसे जो
ठन-ठन गोपाला !

नेता -अभिनेता
सेठ- महाजन
लगते इसके भाई हैं,
आंच न आये भाई पर
ये ऐसा जुगत लगाता है..!!

घोंट गला
सच्चाई का ये,
आर्डर-आर्डर करते हैं,
सच्चाई पर बोल दें
खुलकर
क्या ऐसा दिन आयेगा...???

टिप्पणी-
कानून का निर्णय निष्पक्ष होना चाहिए ।लेकिन आज के दौर में रूतबे के हिसाब से सजा का प्रावधान देखने सुनने को मिल रहा है। दबाव में आकर सच्चाई को दबा दिया जाता है प्रस्तुत व्यंग इसी पर आधारित है।





नैनी ग्रोवर 
~आर्डर नहीं देते~


कभी सुबह की चाय,
कभी गर्म पानी की माँग,
चक्ररघिन्नी सी बनी ज़िन्दगी,
ओढ़ औरत का स्वांग...

ठंडी हो गई बाबूजी की चाय,
व्यस्त थे बहुत समाचार पड़ने में,
चाय ही लाई ठंडी बहु,
सासु जी लगीं तौहमत मढ़ने में...

पति जी दफ्तर हैं जाने वाले,
नाश्ता हुआ तैय्यार नहीं,
तुम्हारे जैसा बैठूँ निठ्ठला,
इतना मैं बेकार नहीं...

बच्चों के स्कूल की बस,
बजा भोंपू, कान खाती है,
बस पे चड़ा बाय बाय ना करो,
तो शर्म बच्चों को आती है...

क्या हुआ बहु अगर एक दिन,
कामवाली बाई नहीं आई,
तुम ही करलो झाड़ू पोछा,
कर रही हो घर में कौन कमाई...

बीत रहा है यूँ ही हर दिन,
परिवार की नैया खेते-खेते,
मामूली सी ग्रहस्थन हूँ मैं,
घरवाले नहीं कोई आर्डर नहीं देते...!!


टिप्पणी:- घर की महिला अपेक्षा की जाती है के घर के सभी काम और सबकी देखभाल उसी की ज़िम्मेदारी है, यहाँ तक के उसके माता पिता भी उसे यही सीख देते हैं, और उस पर उनका ये मानना के हम कोई आर्डर तो नहीं देते ये तो उसका फ़र्ज़ है, ये सोचने पर बाध्य करता है के क्या सच में ..? हाँ फ़र्ज़ ज़रूर है सबकी देखभाल का परन्तु उसे मात्र सेवादार समझ लेना कहाँ की इंसानियत है..?




Madan Mohan Thapliyal
~न्याय~

मुंगरी की ठक- ठक
दिल की धड़कन
किसी की जिन्दगी लील गई,
किसी का आशियाना हुआ नीलाम
किसी की किस्मत बेदाग खिल गई.

सरोकार, पैरोकार, चमत्कार
सब हथौड़े के आधीन
सब कुछ होते हुए जिन्दगी पराधीन
न पानी न काँटा
कानून के जाल में फंस जाती है मीन.

यह अपना वतन है
जहाँ वकीलों और जजों की चलती है
कानून अंधा है
कोई मरे या जिए इनकी बला से
दूसरे के आँसुओं पर जिन्दगी पलती है.

सफेद, धवल वस्त्रों में सब काला है
काले अंग्रेजों का हर तरफ बोलबाला है
इनकी ही विरासत इनका ही कानून
इनकी ही दया इनका ही अंकुश
हर गरीब इनका निवाला है.

एक मुकदमा सालों चलता है
घर, जमीन, मान-मर्यादा सब खत्म
कई बार जिन्दगी दांव पर लग जती है
वाह रे ! कानून
मरने के बाद भी यहाँ मरने वाले पर मुकदमा चलता है.


टिप्पणी: कानून अंधा नहीं सचमुच अंधा है, यहाँ कमजोर सदा पिसता है, कोई सुनवाई नहीं, पैसा ही कानून है.



कुसुम शर्मा 
~अंधा और बेहरा क़ानून~
-----------------

पहन के सफ़ेदपोश करते काला काम
अदालतों में आना जाना इनका सुबह शाम
बाँध के पट्टी आँखों में गान्धारी बना क़ानून
धृतराष्ट्र के राज्य में कानों से सुनता कौन
न्याय के पद पर अन्याय का राज
खुले घूमते अपराधी बेक़सूरो का जेलों में वास
रोज़ हो रहा चीरहरण गुहार लगा रही द्रौपदी
लेकिन उसकी चीख़ अब कोई सुनता नहीं
अातंक का चारों ओर शोर है
देखके हर कोई यहाँ मौन है
बन्द पड़े दरवाज़े न्याय के अन्याय के साथ
घुट रही आशाये दम तोड़ रही आस
सालों बीत गये पर न सुधरा क़ानून
अॉर्डर- अॉर्डर करते ही सभी को करता मौन !

टिप्पणी :- हमारे देश का क़ानून सब कुछ देख कर सुन कर भी अंधा और बेहरा है जहाँ से न्याय मिलना चाहिए वही अन्याय हो रहा है !




Sunita Pushpraj Pandey 
~आर्डर आर्डर~


न्याय की देवी के आंखों पर
बंधी पट्टी देख
कानून को शायद अंधा इसलिए सब कहते हैं
हरपल ये हम सोचा करते थे
न्याय की देवी अंधी, गूंगी और बहरी
पर पैसा बोलता है
बड़े बड़े अपराधियों को पैसे के बल पर
बाल बराबर भी आंच न आते देखा
वर्दी पहनते ही कसमें खाते
कानून के रक्षकों को दिग्गजों की
जी हजूरी और उनकी ही सुरक्षा में मुस्तैद देखा

टिप्पणी :कानून कुछ मौकापरस्त लोगों के कारण खरीदा और बेचा जा रहा है



Pushpa Tripathi 
~मुझे छोड़ दिया जाए~


हर बार कहता हूँ अपराधी नहीं मैं
नफरत का पूरा साल बाकी नहीं मैं
दिल में तमाम जख़्म तिरी रहे हम
अब ये हालात की मुद्दतों में गिने हम !!

अजीब आलम का कैदी बना हूँ मैं
सर पे ताज दामन से बेआबरू हूँ मैं
जागती आँखों से दुनिया देखा हूँ मैं
तमाम खतरों के निशानात से वाकिफ़ हूँ मैं !!!

मैं बह रहा हूँ मेरा वजूद पानी है
गिरफ्त के कटघरे जकड़ा नहीं मैं
मैं चाहता हूँ मेरी जिंदगी बरी की जाय
ऑडर देकर मुझे छोड़ दिया जाय !!!

टिप्पणी :- जब दिल समय के अदालत में खड़ा होता है तो उसके पास सिवाय आगाजे उम्र -ए -दराज़ कहने को कुछ नहीं होता ... बस चाहता है हर अंजाम से बरी हो जाय !!!



मीनाक्षी कपूर मीनू 
~आर्डर~

आधुनिक है
नारी आज ,,
माँ काली
दुर्गा और
दुष्ट संहारी है
हँसी आती है
देख पढ़ के
आधुनिकता का ढोंग
करते आज भी
गाँव गाँव में
नर नारी करते
आर्डर ,,,,,
भोजन , पानी
खेत -खलियान
दासी मज़दूर
के कर सब काम
घूँघट आज भी
डाले है बेचारी
आर्डर पूरे कर
नहीं तो ,,,
डांट पड़ेगी भारी
आज भी सबके
आर्डर सुनती
चरितार्थ ये पंक्ति
आज भी करती
ढोर गंवार समान
है ये नारी
बस आर्डर पाने
की अधिकारी
मनस्वी,,,,,,
कभी न्यायालय
कभी शहर में
आर्डर आर्डर
करके
डंके की चोट पे
नर नारी की समानता
का रौला डालते
वास्तविकता
गर देखनी तो
गाँव की उस नारी का
कभी मन पढ़ पाते,,,
उठा के उसके स्वाभिमान को
आर्डर प्यार से सुनते सुनाते
उन्हें भी इंसान की तरह
हँसते हंसाते ,,,, ,,, :)


टिपण्णी ,,,, आज भी भारत की ज़्यादातर आबादी गाँव में नारी को शोषित करती है उन्हें घूँघट डलवा कर प्रताड़ित करती है । उन्हें आर्डर करती है । उनके साथ अच्छा सलूक नहीं किया जाता । ये पंक्तियां आज की नर नारी की समानता पर व्यंग कर रही है जो गाँव में आज भी ,,,, ?


गोपेश दशोरा 
~अन्धा कानून~

है अन्धा कानून यहाँ,
ना कुछ भी इसको दिखता है।
हो जात कोई या वर्ण भेद,
इसके सम्मुख ना टिकता है।
सक्षम हो या अक्षम हो,
अपराधी बस अपराधी है।
नेता हो या कोई धन कुबेर,
ना हक में किसी के माफी है।
कितना अच्छा लगता है,
जब ऐसा बोला जाता है।
तकलीफ तो बस तब होती है,
जब केवल बोला जाता है।
कथनी और करनी में यहाँ,
अन्तर बहुत ही भारी है।
आजादी को तो बरस हुए,
आजाद कहाँ नर-नारी है।
कचहरी के चक्कर में,
जब कोई फस जाता है।
ना जीता है, ना मरता है,
ना उससे निकल ही पाता है।
तारीखों पर तारीख मिले,
एक बार नहीं, सौ बार मिले।
जूते, एडी घिस जाते है,
पर कभी ना उसको न्याय मिले।
दे दो पैसा गर थोड़ा सा,
सब काम फटाफट होता है।
चाहे कितना हो बड़ा जुर्म,
रफा-दफा सब होता है।
काश, एक दिवस ऐसा आए,
गंगाजल अमृत बन जाए।
गीता पर रख कर हाथ कोई,
ना कसम कभी झूठी खाए।
ऐसा एक स्वर्णिम दिन आए,
धन की माया ना चल पाए।
राजा हो या प्रजा सभी
सम न्याय व्यवस्था सब पाए।

टिप्पणीः हमारी न्याय व्यवस्था में काफी दौहरापन है, सभी को समान न्याय की बातें तो की जाती है, पर मिलता नहीं। हाँ अगर पैसा है तो आपकी सजा माफ हो सकती है। पर गरीब को जमानत के लिए भी एडियां घिसनी पड़ती है।



किरण आर्य
~आर्डर आर्डर~

पत्नी ने आंखें मटकाकर
कहा प्रेम से
आर्डर आर्डर
देख पत्नी जी के
तीखे तेवर
पतिदेव की मैया गई मर
बोले प्राणों की प्यारी
तुमरे ये जालिम से तेवर
कर ना दे कहीं
मेरा ये मर्डर
जब भी तुम देती हो आर्डर
बजट जाता है मेरा बिगड़
उड़ता फिरू जितना भी
मैं बावरा
क़तर देती तुम पल में मेरे पर
क़तर कर मेरे पर
तुम जिस पल मुस्काती हो
सांप लोटते है सीने पर
जान मेरी निकल ही जाती है
हाई कोर्ट के जज के जैसे
फैसला तुम सुना देती हो
मैं बेचारा पति तुम्हारा
सफाई भी न दे पाता हूँ
मन ही मन बस हे प्राणप्यारी
खून के आंसू
पी मैं जाता हूँ
उस पल तुम जो मुस्काती हो
आरी सीने पर चल जाती है
तुमरा आर्डर आर्डर अब तो
कानो में दिन रात है गूंजता
मानो या ना मानो तुम प्रिय

ये मन बस तुम्हे ही पूजता है......
[ समीक्षा के दौरान प्रस्तुत रचना }



सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Tuesday, January 31, 2017

#तकब१ @२०१७



नमस्कार मित्रों 
एक बार फिर इस समूह के प्रांगण में आपका स्वागत है. आप में से कुछ मित्रों के सुझाव को मध्य नज़र रखते हुए २०१७ की शुरआत एक ही चित्र से कर रहे है. 
इस बार इसे प्रतियोगिता का नाम नहीं दे रहे है. लेकिन नियम व् शर्ते उसी रूप में होंगी, चयन प्रक्रिया भी उसी रूप में रहेगी. श्रेष्ठ रचना को पुरुस्कृत किया जाएगा सम्मान पत्र के साथ. 
निम्नलिखित बातो को अवश्य पढ़िए.
१. अपने भावों को कम से कम ८ - १० पंक्तियों की काव्य रचना शीर्षक सहित लिखिए. एक सदस्य एक ही रचना लिख सकता है. 
२. यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
[एक निवेदन- टाइपिंग के कारण शब्द गलत न पोस्ट हों यह ध्यान रखिये. अपनी रचना को पोस्ट करने से पहले एक दो बार अवश्य पढ़े]
३. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है जिसमे आपने रचना में उदृत भाव के विषय में सोच को स्थान देना है. 
४. आपके भाव अपने और नए होने चाहिए. [ पुरानी रचनाओं को शामिल न कीजिये ]
५. इस चित्र पर भाव लिखने की अंतिम तिथि १५ जनवरी, २०१७ है.
६. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा. साथ ही कोई भी ऐसी बात न लिखे जिससे निर्णय प्रभावित हो.
७. आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक समाप्ति की विद्धिवत घोषणा न हो तथा ब्लॉग में प्रकशित न हो.
८. विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और निर्णायक दल के सदस्य भी एक सदस्य की भांति अपनी रचनाये लिखते रहेंगे. हाँ अब उनकी रचनाये केवल प्रोत्साहन हेतू ही होंगी.

धन्यवाद !
इस बार की विजेता है सुश्री मिनाक्षी कपूर मीनू 
(बधाई एवं शुभकामनाएं तकब परिवार की ओर से )

आभा Ajai Agarwal
~एक क्लिक में ढूंढो ,चमको~
=========
गूगल बाबा ,गूगल बाबा ,
मुझको बना दिया ध्रुव तारा ,
नेट में ढूंढो मेरा नाम ,
एक क्लिक से होगा काम ,
गली गाँव शहर देश क्या
दुनिया भर के नामों में
तुम पहचाने जाओगे यदि
गूगल पर आ जाओगे ,
फेसबुक ,बलॉगर ट्वीटर
बहुत सारे पोर्टल यहां
याहू भी कर सकते हो
इंस्टाग्राम है मस्त यहां
मन की बात करो ट्विटर पे
गरियाओ हल्के हो जाओ
ब्लागर में जाकर तुम
किस्से कहानी कह आओ।
कितना अच्छा लगता है
सुंदर सपना लगता है
दुनिया में कोई भी -
मुझसे अब मिल सकता है
अरबों खरबों की भीड़ में
मेरा अलग वजूद यहां
नाम मेरा तुम टाइप करो
एक क्लिक में मुझसे मिल लो
ऑन लाइन आ जाओ सब
इस आकाश पे टिमटिमाओं सब।
गूगल अर्थ पे जाओ तुम
गाँव गली भी मिल जायेगी
और जरा सी सर्च करो
अंगने में माँ ,
खेतों में बापू दिख जायेगा।
एक क्लिक की बात है प्यारे
भीड़ में अलग नजर आओगे
आओ ऑन लाइन हो जाएँ ,
पढ़े पढायें देश बनाएं
एक क्लिक में हो शॉपिंग
एक क्लिक में सारे काम
प्रदूषण भी होगा कम
ईधन भी बच जायेगा
समय अलग बचेगा जो
काम हमारे आएगा

टिप्पणी: मेरे अनुसार एक क्लिक में आज सारी दुनिया सिमट आती है आपकी मुट्ठी में --आप के नाम पे क्लिक और आप चमकने लगते है --गूगल बाबा की करामात -- एक क्लिक से ढूंढिए अपने को अपनों को हो जाइये ऑनलाइन ,करलो दुनिया मुट्ठी में ---शायद मैं चित्र से न्याय कर पायी हूँ -------



किरण श्रीवास्तव
~तलाश~
------------
मुझे है
तलाश..!!
इंसान की ।
जो हो
वास्तव में
इंसान....।
इंसानियत हो,
जिसकी पहचान ।
कठीन हो,
शायद अभियान ।
दिनों-दिन
होती जा रही
मुश्किल रूझान...
इंसानी मुखौटो में,
भेड़िए बदहवास-
जो कर देते
इंसानियत को,
शर्मसार..
सरे बाजार!!
बेच देते जमीर
दिखाते झूठी शान,
साधू संत भी
कर देते,
इंसानियत को
लहूलुहान ..!
गर मिल जाये
इंसान तो
कर लूं दीदार
तो हो जाये
पूरी मेरी
तलाश...!!!!!!

टिप्पणी-
आजकल इंसान में इंसानियत का ह्रास होता जा रहा इंसान और पेशे दोनों कलंकित होते जा रहे ऐसे में एक सच्चे इंसान की तलाश शायद नामुमकिन लगने लगा है..!!




प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
~ मेरी पहचान ~

छिपने लगा था हर भीड़ में
तुमने न जाने कैसे पहचान लिया
अपने में ही सिमटा था मेरा व्यक्तित्व
क्यों उसे मेरे ही सामने खड़ा कर दिया
वैसे सच कहूं
मेरी पहचान का अस्तित्व
लोगो की भीड़ में दम तोड़ रहा था
मेरी पहचान में अपनी पहचान
ढूँढने वाले लोग भी
अपना नया साम्राज्य संवारने लगे
नई पहचान की पहचान बनकर
और
व्यतीत जीवन के कटु अनुभव
मेरे ऊपर पहाड़ सा भार बन
मुझे जमीन के नीचे धकेल रहे थे
और भीड़
शरीर के हर हिस्से को कुचलते हुए
तेजी से कदम बढ़ा रही थी
मेरे होने का झूठा भ्रम
टूटने ही वाला था
कि तुमने
मुझे भीड़ से निकाल
फिर अपने आवरण में समेट
पहचान लौटा दी है
हाँ तुम मेरा हौसला
तुम मेरी उम्मीद
या शायद
वक्त हो या फिर नियति हो

टिप्पणी: खुद से खुद की पहचान होना जरूरी है, अपने हौसले और उम्मीद का दामन पकड आगे बढ़ना होगा फिर नियति और वक्त आपके साथ होंगे




ब्रह्माणी वीणा हिन्दी साहित्यकार
~ आभासी संसार ~
÷÷÷÷÷÷÷÷÷

आजकल, आभासी युग में ,
लोगों को पहचानना
बड़ा ही मुश्किल है ,
कि कौन सा चेहरा जाहिल है?
कौन सा व्यक्ति काबिल है?
सफेद पोश भेड़िए
घूमते रहते इधर उधर /
माँ बहनों की अस्मिता को,
तार तार कर देते हैं इस कदर /
माना कि वैज्ञानिक अन्वेषक,
आसमान तक पहुँच गए,
जाॅच संस्थाएँ
खगालती हैं छुप छुपकर
दोषी व निर्दोषी के घर मे घुसकर /
किन्तु राजनीति का गढ ?
अज्ञात सफेद पोशों का अड्डा है !
कौन नेता कहाँ और कैसा है?
पहचानना कठिन जैसा है /
कई कई चेहरे रखते तमाम हैं /
इनका फैला हुआ तामझाम है //
************************
*************************

टिप्पणी: आज कल दूर भाषी यंत्रों का जाल बिछा है फिर भी दोषी को पहचानना मुश्किल है समाज सफेद पोशों से भर गया है कई कईचेहरे रखते हैं तमाम लोग, ,,,,,,


डॉली अग्रवाल
~ मुखोटा ~

मुझे मुखोटा ओढ़ जीना आ गया
बिन हँसी के हँसना आ गया
ये लो दोस्तों , मुझे भी इंसान बनना आ गया
आँखे भरी है बहती नही
दर्द है चीख आती नही
हँसी है पर होंटो पर आती नही
मेरी ख़ामोशी मेरा रूप बन गया
मुझे भी इस गुमनाम से जहाँ में जीना आ गया !
ज़िन्दों का काफिला है
मुर्दो सी सोच का
मुझे मुर्दाओं के लिए नही
ज़िन्दों के लिए आँसू बहाना आ गया !
नफरतों के बाज़ार में
खुद को बचाना आ गया
आईने में खुद को खुद से मिलाना आ गया
मुझे भी इंसान बनना आ गया !!

टिप्पणी: अतीत की स्मृति , और भविष्य की कल्पना कभी इंसान को खुद से मिलने नही देती !




 Madan Mohan Thapliyal  
तीन आखर- आदमी /मानव
***************

वीक्ष ( लेंस ) से टटोला
अपने एहसास को झिंझोड़ा
हाय ! कोई भी न मिला भीड़ में
जो कह दे, औरों से अलग है ए आदमी.

चाहत तो थी, खुद की पहचान बन जाऊँ मैं
विडम्बना देखिए, खड़ा दहलीज पर
चौखट की ओट से झांकता
अपने को अलग खड़ा देखता है आदमी.

बुद्धिचातुर्य से वशीभूत
स्वयं की मिसाल खोजता रहा उम्र भर
विश्व विजय की पताका लिए हाथ में
खुद से खुद ही हारता रहा आदमी.

एक सी काया, एक सा रूप
फिर भी अपने स्वरूप से बेखबर
धर्म के जाल में उलझता, नाहक-
औरों से उम्र भर बैर लेता मोल आदमी.

बुद्धि की विलक्षणता कहूँ
या सनक है तेरी
अमरत्व पाने की धुन पे हो सवार
हर पल दफन हो रहा है आदमी.

अपनी चाहत औ नसीहत
लिख दी उसने तेरी तकदीर में
जब छोड़ना होगा जहां को , उठा लेगा
देखता रह जाएगा, साथ था जो आदमी.

एक सांस का ही तो उलटफेर है, नादां
चल रही है तो घमण्ड में चूर है
दान,पुण्य, पूजा-अर्चना सब धरी रह जाएगी
आखिरी सांस लेगा जिस क्षण आदमी .

न कोई साथ आया न साथ जाएगा
लिए दिए का हिसाब होगा जमीं पर
राख का ढेर हो या माटी का
टटोल लो, कहीं दिखेगा नहीं आदमी.

है जिस देह पर अभिमान उसको
पंचतत्वों से है निर्मित, उन्हीं में मिलेगा
बेसुध खड़ा कतार में अलग दिखने के लिए
न जाने किस मोह से भ्रमित है आदमी .

मानव हो मानव बन कर रहो
यही तेरी सच्ची पहचान है
जनाजे के वक्त हर मुख से निकले ए दुआ
देखो ! वो जा रहा है, जो था सच्चा आदमी.
*********

टिप्पणी : मानव ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है, लेकिन आदमी को अपने गुरूर के आगे ईश्वर के बनाए सारे नियम अर्थहीन लगते हैं और इसी ऊहापोह में उलझकर एक दिन संसार से विदा हो जा है.



नैनी ग्रोवर
~ रिश्ते ~

इतना करीब से,
रिश्तों को देखा ना करो,
सिवाय मायूसी के,
कुछ भी हाथ ना आएगा...
साथी सभी हैं नश्वर तन के,
खोखले गिठाव बन्धन के..
माया के जाल में जकड़े हैं,
मतलब से हाथ ये पकड़े है..
धन और तन के ये झूठे नाते,
बदल के भेस मन को हैं लुभाते..
सुखों के पल में जो संग आयें..
आये दुःख तो किनारा कर जाएँ..
ऐसे अपनों से क्या कहिये,
अच्छा तो यही है के चुप रहिये..
कीजे कर्म अपना अपना,
क्यों देखें रोग दूजे के मन का..
जहाँ तक साँसों का आना जाना है,
तब तक तो साथ निभाना है...
एक दिन तो अकेले जाना है,
नहीं साथ कोई भी आना है..
फिर क्यों रिश्तों को रोऊँ मैं,
क्यों अपना समय गवाउँ मैं...
कोई अच्छा कर्म तो कर जाऊँ,
निर्भय होके प्रभु के दर जाऊँ..
मायावी दुनियां की छोड़ो बातें,
साथ ना कुछ भी जाएगा...
इतना करीब से,
रिश्तों को देखा ना करो,
सिवाय मायूसी के,
कुछ भी हाथ ना आएगा....!!

टिप्पणी :- भाव तो आप सब गुणीजन समझ ही गये होंगे, तस्वीर देख कर यही उत्तपन हुए ...।।



अलका गुप्ता
*हों जागरुक !*
************

प्रदर्शक ये !
चुनाव जनता का !
नेतृत्व खास !

नेता अपना !
जाँच पड़ताल के !
चुनें ध्यान से !

हो जागरुक !
कर्मठ जिम्मेदार !
ईमानदार !

देश संवारे !
भविष्य वर्तमान !
नेता महान !

प्रतिनिध से !
हो देश विकसित !
करें विचार !

टिप्पणी - देश की उन्नति चाहिए तो हमें ईमानदार कर्मठ नेता को पूरी जागरूकता के साथ चुनना होगा



प्रभा मित्तल
--अकेलापन--

चारों तरफ लोगों का हुज़ूम
बीच खड़ा एक बेबस आदमी
ये कैसी बेकल बेकसी है
कभी भीड़ में भी अकेले
तो कभी अकेले में भी
लग जाते हैं मेले...

​इस जीवन दर्शन ने
एकांत के सिलसिले में
मन ने, लो आज मन को
फिर से झकझोर दिया।
यादों की गठरी खुल गई
कुछ ने तो बेरहमी से
मुझको घेर लिया।

घंटों ..पहरों ...बीत गए
फुर्सत नहीं मिली
उन यादों से, जो कभी
निकली नहीं जेहन से।

अन्तर में रचे बसे
चलते-फिरते उन चेहरों से
कितनी ही बार अपनी कहते
अपने ही कानों सुना है मैंने
क्या देखा है तुमने मुझको
खुद से खुद की बातें करते...

मन ही मन मीलों चलकर
मंज़िल तय करते
हर मोड़ पर ठहर-
ठिठक मुड़ मुड़ कर
देखते ...हर बार
साथ चलने की चाह में
चार कदम आगे चलकर
दो डग पीछे हट जाते
क्या देखा है तुमने मुझको
रुक रुक कर रस्ता तय करते।

आखिर मिट गई दुविधा सारी
रिश्तों का हुजूम तो था भारी
पर आदमी भीड़ में अकेला
बहुत हुआ वक़्त का खेला

अब मंजिल दूर नहीं
वक़्त के थपेड़ों से लड़ना सीखा
इन कदमों ने चलना सीखा
जब भी अँधेरों रास्तों से गुज़रती हूँ
मन का उजाला साथ चलता है
अकेला आदमी कभी नहीं होता
उसका जमीर हरदम साथ होता है।

टिप्पणी: आदमी कभी अकेला नहीं होता उसका अनतःकरण हमेशा उसका साथ देता है।



मीनाक्षी कपूर मीनू
~आईना मन का~
,,,,,,,,,,,,,,

सभी इंसान अच्छे लगते है
मन के सच्चे लगते हैं
ख़ुशी से जब हाथ
पकड़ के
एक दूजे का
झूमते हैं तो सच में
बिलकुल बच्चे लगते है
अचानक मन बदलने लगता है
आँखों पर पर्दा पड़ जाता है
जाति वाद या धर्म का
झूठ का या
कच्चे कान के मर्म का
अवसाद मन का छा जाता है
तन पर
और आँखों का आईना
अब नहीं देखता समान
बदल देता है
सफेद को नीले पीले में
क्योंकि ,,, मनस्वी
मन बदलने से
वही दीखता है
जो हम देखना चाहते है
सब बदला बदला सा
वो अपना नहीं
बीच में हाथ पकड़ा खड़ा
नकाबपोश काला है
पीठ में छुरी चलायेगा
अपना होते हुए भी
पराया है।

टिपण्णी: मन भटकने से हम रास्ता भटक जाते है । सच झूठ का अंतर नकार हम वही देखने लगते है जो हमारी मन रूपी आँखों का आईना दिखाता है तब समान भाव में भी अलगाव नज़र आ ता है ।


प्रेरणा मित्तल 
~ख़ास~
*****

हज़ारों-लाखों आमों के बीच, कोई ख़ास,
नज़र रुक जाती है बस, उसी के आसपास।
जैसे हो हंसों के बीच एक कौआ,
या हो कौओं के बीच कोई हंस।

ग़ुदड़ी का लाल हो या दीपक तले अंधेरा,
पृथक हो भीड़ में बस, जिसे लोग निहार सकें,
श्वेत हो तो मर सकें या ईर्ष्या से जल सकें,
उँगली उठाकर स्याह पर, अहम् को हवा दे सकें।

जो बन गया, किसी के लिए इतना विशेष,
क्या अनजान था वह, या कुछ परवाह थी शेष।
क्या भिज्ञ था इससे, कि कुछ ख़ास है उसमें,
तभी तो आकर्षण जन्म लेता है, लोगों के दिल में।

या नितांत अनभिज्ञ, दूसरों की उठती निगाहों से,
जो दूर तक पीछा करतीं, उसके पदचिह्नों का,

उन नेत्रों में मंशा बस,
उसे ख़ास से आम बनाने की,
या स्वयं आम से ख़ास बनने की।

टिप्पणी : जो सबसे अलग हो चाहे अच्छा हो या बुरा सबके ध्यान का केंद्र बन जाता है। लेकिन क्या उसे इस बात का अहसास होता है ? और देखने वाले की नीयत भी अलग - अलग होती है।


सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Friday, December 30, 2016

#तकब१५ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता # 15 ]


#तकब१५ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता # 15 ]
१. इस बार दिए गए चित्रों में सन्देश स्पष्ट है. देखते है मित्र सदस्य किस तरह भावों को जोड़ पाते है. चित्रों में सामंजस्य के साथ कम से कम १० पंक्तियों की काव्य रचना शीर्षक सहित होनी अनिवार्य है [ हर प्रतियोगी को एक ही रचना लिखने की अनुमति है]. 
- यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
[एक निवेदन- टाइपिंग के कारण शब्द गलत न पोस्ट हों यह ध्यान रखिये. अपनी रचना को पोस्ट करने से पहले एक दो बार अवश्य पढ़े]
२. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है जिसमे आपने रचना में उदृत भाव के विषय में सोच को स्थान देना है.
३. प्रतियोगिता में आपके भाव अपने और नए होने चाहिए.
४. प्रतियोगिता १९ दिसम्बर २०१६ की रात्रि को समाप्त होगी.
५. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा. साथ ही कोई भी ऐसी बात न लिखे जिससे निर्णय प्रभावित हो.
६. आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक प्रतियोगिता समाप्त न हो या उसकी विद्धिवत घोषणा न हो तथा ब्लॉग में प्रकशित न हो.
विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और जो निर्णायक दल के सदस्य है वे भी इस प्रतियोगिता में शामिल है हाँ वे अपनी रचना को नही चुन सकते लेकिन अन्य सदस्य चुन सकते है. सभी का चयन गोपनीय ही होगा जब तक एडमिन विजेता की घोषणा न कर ले.
निर्णायक मंडल के लिए :
1. अब एडमिन प्रतियोगिता से बाहर है, वे रचनाये लिख सकते है. लेकिन उन्हें चयन हेतु न शामिल किया जाए.
2. कृपया अशुद्धियों को नज़र अंदाज न किया जाए।
धन्यवाद !
इस प्रतियोगिता की विजेता रही सुश्री आभा अग्रवाल जी - बधाई - शुभकामनाएं 


किरण श्रीवास्तव
(नव-वर्ष)
--------------------------

अंग्रेजी का वर्ष नया,
अब तो आने वाला है!
मास दिसम्बर कमर झुका कर,
अब तो जाने वाला है|
जन-जन में उत्साह जगा,
पर ठंड से दुबका जाता है!
सूरज की गर्मी का भी
नहीं पता चल पाता है,
डाली-डाली पत्ते-पत्ते
ठंड से सिकुड़े जातें हैं,
नये साल के जोश में इनको
ठंडक नहीं सुहाती है|
होश गंवाने को फिर इंसा,
मद्यपान अपनातें हैं
झूमते-गिरते आपा खोते
न्यू ईयर मनाते हैं..।

चैत्र शुक्ल-पक्ष प्रतिप्रदा -
हिन्दी नव-वर्ष होता है,
पूजा-पाठ कलश-स्थापन
और जागरण चलता है।
नव-वर्ष हिन्दी की अपने,
होती बात निराली है!
प्रकृति भी स्वागत करतीहै,
चहुंओर रहे हरियाली है!
फूल-फूल और कली-कली,
मानो हंसती-गाती है!
छेड़ तराने कोयल भी,
अपने गीत सुनाती है!
नये-नये पत्ते पेड़ों पर,
खड़े हैं सज-धज कर ऐसे,
महमानों के आने पर
कपड़े बदलें हो जैसे...|

हिन्दी हो या अंग्रेजी
साल तो आता जाता है,
समय चक्र चलता रहता
ठहर नहीं वो पाता है!
इससे लेकर हमें सबक,
आगे बढ़ते जाना है,
चाहा जीवन में जो भी
मुकाम वही अपनाना है!
नये साल में यही कामना -
नहीं कोई दुखियारी हो,
मंगलमय हो सभी के लिए
और सदा शुभकारी हो..!!
----------------------------------------

टिप्पणी: अंग्रेजी वर्ष हो या हिन्दी वर्ष दोनों ही के कार्य-क्षेत्र अलग और दोनों ही जीवन में महत्वपूर्ण है। अंग्रेजी नववर्ष में कड़ाके की ठंड उत्साह को क्षीण तो करते ही हैं , पाश्चात्य रहन-सहन ,आचरण हमारे संस्कार को भी धराशायी कर देतें हैं ...। हिन्दी नववर्ष -हमारी परम्पराएं धार्मिकता हमारे संस्कार को जीवन्त तो करती ही है ,वहींप्रकृति भी मानों हमारे साथ दिल खोल कर स्वागत को तैयार खड़ी रहती है।


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~नववर्ष - मेरा तुम्हारा~

पाश्चत्य नववर्ष में
सर्दी की ठिठुरन लिए
मदिरा का सेवन कर
मदहोश हो थिरकते रहते
अश्लीलता की करते नुमाइश
अर्धरात्रि में तमोगुण संग
नववर्ष का आरम्भ होता
तामसिक प्रवृति का फिर
जहाँ तहाँ प्रदर्शन होता
कैसा विचित्र है
विदेशियों का यह त्यौहार

वेदों में अंकित है युगादि का सत्य
चंद्रमा की कला का है ये प्रथम दिवस
ब्रह्मा ने इसी दिन कर सृष्टि का निर्माण
नक्षत्रो का देकर उपहार
सतयुग का किया था प्रारम्भ
चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रथमा
ही अपने नववर्ष का है शुभारम्भ
भारतीय संस्कृति का
प्रकृति से है गहरा नाता
नववर्ष भी नही इससे अछूता
पतझड़ का असर कम होता जाता
वसंत ऋतू का फिर आगमन होता
पेड़ पौधे पल्लवित होते
पुष्प नववर्ष का स्वागत करते
शालिवाहन की वीरता का प्रतीक
शक संवत बना साक्षी है
शैल्पुत्री प्रकृति का दूसरा रूप
कर अराधना उसकी
नवरात्र की होती शुरआत
विक्रमादित्य ने फहरा विजय पताका
राज्यभिषेक भी इसी दिन करवाया था
फिर मंगल कार्यो की गणना का आधार
विक्रम संवत को ही बनाया था
इस शुभ दिन कर बाली का वध
राम ने उसकी प्रजा को मुक्ति दिलाई थी
इस नवबेला में उर्जा शक्ति का होता प्रसार
नई फसलो संग उत्साह उमंग का होता विस्तार
और हम अपनी धर्म संस्कृति छोड़
न जाने क्यों विदेशी संस्कार अपनाते
अपनी प्रथा परम्पराओ का लेकर ज्ञान
स्वीकार कर, करो तुम सम्मान

टिप्पणी: किसी भी त्यौहार पर्व [ अन्य देशो के ] बारे में जानना अच्छी बात है या उनकी खुशी में शामिल होना भी अच्छा है लेकिन अपनी परम्पराव संस्कृति को भूल कर, बिसरा कर, छोड़कर नही...


नैनी ग्रोवर
~ नया साल~

देख मुँह लाल दूजे का,
पीट पीट के अपना मत करो,
मान अपनी परम्पराओं का,
अजी कुछ तो समझा करो...
बहके कदम, भोंडे कपड़े,
मुंह में सिगरेट दबाये,
भारत में ये नया साल मनाने,
ये हिप्पी कहाँ से आये...?
माँ बन गई मम्मी जीते जी,
और पिता हो गए डैड..
चाचा चाची बने अंकल आंटी,
बुध्दि हो गई मेड...
हाय ब्रो हाय सिस ने सारा,
कुनबा बिगाड़ डाला,
अपने हाथों हमने,
अपनी भाषा का चमन उजाड़ डाला...
अब नए साल के इंतज़ार में,
सारे पगला रहे हैं,
डेबिट और क्रेडिट कार्ड के,
जलवे दिखा रहे हैं...
जम के पियेंगे रात भर,
हुड़दंग मचाएंगे,
नए साल के पहले दिन,
माँ से फिर सर दबवायेंगे...
अरे छोड़ो यूँ नया साल मनाना,
किसी काम ना आएगा,
बैठो संग परिवार, खाओ पियो,
खुशियों की लहर लाएगा...
जैसी होगी शुरुआत साल की,
वैसा ही मिलेगा फल,
उठ सुबह सवेरे ले नाम प्रभु का,
और काम पे अपने चल...!

टिप्पणी.. आज के मौहाल पे छाये पश्चिम साये को दूर करें,, और अपनी परम्पराएँ समझना ही जीवन जीने का स्वच्छ और निर्मल मार्ग है ।


अलका गुप्ता
~अंतर नव वर्ष का ~
~~~~~~~~~

भावनाएँ उल्लास मय !
सृष्टि संग उमड़ प्रवाहित ॥
संचरित प्रकृति नवांकुर...
अनायास हँसे प्रत्फुटित ॥

नव वर्ष पदार्पण संवत्...
गुनगुना चैत्र मंगल कलश !
प्रसार मातु आँचल तले
आगाज उंमिलन अलस !!

तब मुस्कान भानु रस पिउ..
हरितिमा चंचल फागु घुलित ।
उछले... रंग...वेग..संवेग...
आए..नव-वर्ष... संकलित ॥

ठिठुरने अहसास जब लगें
चादर मॆं वर्फ की सर्द हो ।
आतुर सी लगे प्रकृति...
छिपा पांख..पंख जर्द हो ॥

हैपी न्यू ईयर बोल जब
अंतराल सुप्त बोने लगे ।
झरे पात पंगु वृक्ष शीत...
दुबक हर कोण सोने लगे ॥


टिप्पणी: हिन्दी नव संवत्सर एवं इंग्लिश सन के नव वर्ष के आगमन पर प्रकृति का भारत मॆं हम जो अंतर महसूस करते हैं बस उसी कॊ व्यक्त कर पाने का प्रयास किया है


मीनाक्षी कपूर मीनू
~ नव आगमन ~
--------
दिसम्बर माह की ठिठुरन में
" अंग्रेज़ी नव वर्ष " दिवस आया
सबके मुख पर खुशियां छायी
पीने पिलाने का दौर चलाया

अंग्रेजी ने रंग दिया तनमन
शोर शराबा चले संग संग
मनस्वी ,,भूल अपनी संस्कृति
सब ने बदले अपने रंग ढँग

आज भू ले हम भारत वासी
हिंदी पावन 'नव वर्ष बेला '
प्रकृति का संदेश न समझे
घर होटल में लगता है मेला

चैत्र मास के शुक्ल पक्ष को
अंकुरण हिन्दी नव बेला का
तन मन प्रफुल्लित उमंग भरा
प्राकृतिक सौंदर्य का मेला सा

खुशियां लाएं 'दो दिवस' मनाएं
हिन्दी को तो न ठुकराएँ
ये तो अपना मातृ दिवस है
इसके संग संग सब चलाये

भारत है तो इण्डिया अच्छा है
संस्कृति है तो फैशन अच्छा है
मनस्वी,, बुज़ुर्गों का गर रखें मान
तो पीना पिलाना भी अच्छा है

बिना राग द्वेष के मिल के खाएं
नव वर्ष रूप में हैप्पी न्यू ईयर मनाएं

टिप्पणी: अपनी भारतीयता को जीवंत रखते हुए सभी त्यौहार मनाने चाहिए क्योंकि भारत की पहचान ही है कि विभिन्नता को एक सूत्र में बाँधना। यहाँ अनेकता में एकता है मगर अपनी संस्कृति को भूलते हुए नहीं बल्कि इसका मान बढ़ाते हुए सभी त्योहारो को, दिवस को मनाना चाहिए ताकि भारतीय सबके साथ कदम से कदम मिला करआगे बढ़ सकें और अपनी भारतीयता की पहचान दे सके।



Madan Mohan Thapliyal 'शैल'
~आभास नव वर्ष के आगमन का~


( नव वर्ष की शुभकामनाएं )

जब डालियों पर हो फूलों की बहार
तितलियाँ मंडराएं झूम-झूम कर-
धरणी करे अद्भुत श्रृंगार -
सारंग छौने घूमें, स्वच्छंद -
हिमगिरि की बयार बहे मंद-मंद -
आम की मंजरी पर हो मधुप गुंजार
निर्झर झरनों की अनिमिष प्रीत -

प्रकृति सजती नव दुल्हन सी -
मन्थर गति वाले हिमनद का संगीत -
हो प्रफुल्लित कोयल गाए गीत
हिमनद सिकोड़ते अपनी बाहों को-
सुरभित करते बन कंदराओं को
ठिठुरती सर्दी कहती निज घर जाती
लिए दिए का धर्म निभाती
घने दरख़्तों की झीनी ओट से
झांकती रवि किरणें -
धरती को नमन करती और कहतीं
कुछ नया है होने वाला
जब धरा का कण-कण हो हर्षित
समझो नव वर्ष है आने वाला
चैत्र मास, मधुमास है आने वाला
ऐसी हो जहाँ की पुण्य धरा
क्यों न हो हर्षित जनमानस
क्यों न बजे नव वर्ष का संगीत
स्वागत हे मधुमास तुम्हारा
नव वर्ष का खुशी से गाएँ गीत!!!!

सारा विश्व नव वर्ष का
प्रथम दिन कहता जिसको
ठिठुरन भरी सर्दी चहुंओर
जनवरी मास कहते उसको
चारों ओर बर्फ़ की सफेद चादर
कितना सुख, कितना आदर
किसकी खुशी, किसका रंग
जाड़े से होता सब बदरंग
जीव जन्तु भी छिप जाते
ले आश्रय धरती का
पर्ण विहीन होते बृक्ष
निर्जीव सा लगता सारा मधुबन
कैसा हर्ष, कैसा स्वागत
कैसा नव वर्ष का आगमन
मदहोश हो, सब हैं थिरकते
नूतन वर्ष की जै-जैकार हैं करते
अर्द्ध रात्रि से पौ फटने तक
धमाचौकड़ी और हुड़दंग
नव वर्ष का अनोखा स्वागत और रंग!!!!!!

टिप्पणी: सभी देशवासियों को नव वर्ष की ढेर सारी शुभकामनाएं, भारत एक कृषि प्रधान देश है और इसकी संस्कृति युगों से प्रकृति की उपासक रही है,चाहे वर्ष का प्रथम दिन हो चाहे आखिरी, खुशी नित नये रंग में पल्लवित होती है.


डॉली अग्रवाल
~नया साल - एक ख्याल ~

कुछ अंग्रेजो का नही
कुछ हिंदी का नही
हर वो लम्हा नया साल है
जहाँ जीने का सवाल है !!

किसी नन्हें की इस दुनिया में आँखे खोलना शायद नया साल है ,
किसी मरते हुऐ का ज़िन्दगी जीना शायद नया साल है ,
दर्द को भूल कर सुख का आभास शायद नया साल है ,
उदय होते सूरज का ढल जाना शायद नया साल है ,
खिल के फूल डाली से उतर जाना शायद नया साल है ,
सपनो का साकार हो जाना शायद नया साल है ,
बीते वर्ष का अंत हो जाना शायद नया साल है !

वक्त को थामना मुश्किल है
वक्त के साथ चलना मुश्किल है
कुछ पल और जी लो ज़िन्दगी के
बीते वक्त का लौटना मुश्किल है !!

टिप्पणी: में जो भी लिखती हू वो मैच नही होता चित्र से ! मेरी सोच इससे आगे जाती नही , जो लिखा बस लिख दिया ! आप सबको पढ़ कर मन की बात लिखी !


Ajai Agarwal आभा अग्रवाल
~मंगलमय नव वर्ष --
============
चैत्र शुक्ला प्रतिपदा ,
अवतरण तिथि
आदि पुरुष श्री ''राम '' की
लो आया नव वर्ष
लाव लश्कर संग ----
पतझड़ का हो रहा अंत
दिगम्बर हुई डालों पे
झाँक रहे नव द्रुम मनोहर
बांज बुरांस अशोक
गुलमोहर फूले
रक्तवसना नववधू प्रकृति
सुगन्धित समीर से आरक्त ,
खेत पहने सोना चांदी की चूनर ,
बासन्ती साड़ी पे- रंगों भरी
पिचकारी की फुलकारी
गदराई गेहूं की बाली ,
बौराई अमराई ,
पलाश दहके ,टेसू महके
कोयलिया कुहुके
नील व्योम का नीला निस्वन
कलियाँ करती जादू टोना
मानो उत्सव का आवाह्न
देख श्रृंगार ऋतुराज का
भर अंजुरी फूलों की
रति उतरी करने आरती --
मंगल कलश पराग के ढुलके
भँवरें गुनगुन गान सुनाएँ
लो नव वर्ष है आया
चैत्र शुक्ला प्रतिपदा -
धरती पे आये --
राम चन्द्र संग चारों भाई
प्रकृति भी दे रही बधाई
नव सृजन -नव कलेवर
नव उत्सव ,यही है विक्रमी संवत
अवतरण तिथि
श्री ''राम '' की
और लो नव वर्ष आया
लाव लश्कर संग आया ------
आयी जनवरी ,शीत भारी ,
ओढ़ कुहरे की रजाई ,
शिथिल जगती लेती जम्हाई
पेड़ दिगम्बर रूप धारें ,
फाल इसको कहते सारे
आलस औ तम --सूर्य हारा
हड्डियां तक कँपकपायें
पशु-पक्षी सब कसमसाये
न सृजन ना ही है उत्सव
अलाव को सब घेर बैठे।
धवल हिम की सर्द साड़ी
ज्यूँ कुँवारी विधवा हुई हो ,
सर्द अहसासों में डूबी
संगमरमर की ऋचा सी
स्वप्न बुनती जा रही हो ,
वेदनाओं की ऋचायें
स्वयं को समझा रही हो
इस समय को उत्सव बनायें
उदासियों के श्वेत घेरे
सर्द अहसासों के फेरे
डस न ले इंसान को।
मौन मन की वाटिका में ,
कुछ पुष्प बातों के बिखेरें ,
आगमन है शीत का --
हम विजन में मंगल उतारें
शरद की इस ऋतु में ,
नव वर्ष के गीत गायें
आज झूमें ,खिलखिलायें ,
उंघती सी इन छलकती प्यालियों में
प्राण अपने हम उड़ेलें
अर नया इक गीत गायें
उंघती सी इस ऋतु में
फाल की इन डालियों में
धवल हिम की चादरों संग
पच्छिम का कोई गीत गायें
हिम ढकी इन वादियों के
मरमरी कोमल बदन के
बांकपन को - भर नजर हम आज चूमे ,
एक अल्हड़ बांकपन औ
सर्दी भरा अहसास लेकर
पच्छिम का न्यू ईयर मनाएं
शरद की चांदनी की
सेज में हम गुनगुनायें।
आज हम न्यू ईयर मनाएं ॥ ----


टिप्पणी: विक्रमी संवत का नव वर्ष ,प्रकृति के नव सृजन का समय --चैत्र मास -और कलेंडर का नव वर्ष जनवरी यानी शीत से कँपकँपाती प्रकृति ,एक में प्रकृति का उत्फुल आनन्द , श्रृंगार करे हुए ऋतुराज की आरती उतारने आयी नववधू के रूप में प्रकृति और एक में धवल हिम की साडी पहने तप करती नव यौवना तपस्विनी --दोनों पावन ,दोनों निर्मल --एक काम--सृजन का प्रतीक ,एक शिव के लिए तप करती अपर्णा का प्रतीक ---मनाइये दोनों को --सहजता से --दोनों अपने स्थानों की सभ्यता के प्रतीक हैं ----आभा ॥


कुसुम शर्मा
~नववर्ष का करे अभिनन्दन ~
-------------------
नव वर्ष का करे अभिनन्दन
ख़ुशियों से भरे सबका जीवन
पुलकित हो धरती का कण कण
ऐसा हो नव वर्ष का आगमन !!

विश्व की बात निराली
छाई कही पर सूरज की लाली
कही पर चंदा की उजयाली
कही पूर्व तो कही है पश्चिम
इनकी संस्कृति भी है भिन्न भिन्न

पश्चिम की बात निराली
इनकी संस्कृति भी है प्यारी
अँधियारे से है यहाँ उजियारा
पतझड़ मे भी दीपों की यहाँ माला

करके हुड़दंग चाहे नव वर्ष मानाते है
पर जाने वाले साल की अच्छाई को अपनाते है !

यहाँ सर्द ऋतु है आई चारों ओर वर्फ है छाई !
प्रकृति ने भी इसका साथ दिया है
सफ़ेद चादर बिछा कर नववर्ष का स्वागत किया है
तभी तो जनवरी नाम दिया है !
रात के १२बजते ही सभी खुशी से नाचते है
हैपी न्यू ईयर कह कर नववर्ष मानाते है !!

पूर्व की बात निराली
यहाँ सदा सूरज की उजयाली

नव कोपल है खिल रहे
गगन और धरती मिल रहे
नव पुष्प है खिल रहे
जिसमे भँवर गुंजन कर रहे

शंख की ध्वनि छाई चारों ओर
मचा नवरात्र की पूजा पाठ का शोर
हर वर्ष हरियाली लगाते है
ऐसे पूर्व मे नववर्ष मनाते है

है चैत्र का महिना नवरात्र का आरम्भ
पूजा पाठ से करे नववर्ष का आरम्भ !!

टिप्पणी :- सभी नववर्ष का स्वागत अपने अपने तरीक़े से मनाते है पश्चिम मे नववर्ष जनवरी से शुरू होता है 
वहाँ दिसम्बर मे ३१ की रात के १२ बजते ही नववर्ष आरम्भ हो जाता है लोग नाचकर इसका स्वागत करते है 
इसे अंग्रेज़ी का नव वर्ष कहते है !!पूर्व मे नववर्ष चैत्र मास यानी कि मार्च मे अारम्भ होता है हिन्दू कैलेंडर के हिसाब से ---इस समय चन्द्रमा की कलायें बढ़ती है नवरात्र का आरम्भ इसी समय होता है चारों ओर पूजा पाठ होता है और इस समय नववर्ष का आगमन शुभ माना जाता है इसलिए हिन्दू वर्ष से नववर्ष का आरम्भ चैत्र मे होता है 



प्रभा मित्तल
!!नूतन वर्षाभिनन्दन !!

सौर, चंद्र, नक्षत्र, सावन और अधिमास
इनके मेल से बना विक्रम संवत खास।
यहीं से शुरु हुए बारह महीने बरस के,
हफ्ते में दिन सात और तीस का मास।

सृष्टि की रचना का प्रथम दिवस
सूरज की पहली किरण जन्मी
यहीं से सतयुग का उदय हुआ
विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया
प्रभु राम-राज्याभिषेक इसी दिन
काल गणना का प्रारम्भ और
रात से अब दिन भी बड़ा हुआ।

​सूर्य का मेष राशि में प्रवेश
चैत्रमास का शुक्ल पक्ष और
जब तिथि हो प्रतिपदा
नवरात्रि का प्रथम दिवस
कर नए साल की शुरुआत
नवसंवत्सर ​कहलाता है।

आया वसंत हरियाली छाई
चहुँ ओर खुशहाली आई
मौसम ने भी ली अँगड़ाई
वृक्ष लताएँ फूलों से लदकर
नव पल्लव खिलने को आतुर
मंद समीरण मादक बनकर
नए साल का स्वागत करती
नटी प्रकृति भी मुसकाई !

दुनियाभर में इसी माह
काम-काज का तय होता है
नया रूप और लेखा-जोखा।
कह लो चाहे चैत्र या मार्च
कुछ तो है इसमें बात खास।

यौं तो देश-देश की बात है
अपनी संस्कृति अपना कायदा
यहाँ रात है वहाँ भोर हुई
दिन और रात का अन्तर है

जब पतझड़ की उदासी फैली
न आध्यात्मिक न वैज्ञानिक
अकारण पश्चिम की नकल में
क्यों अपने सूर्योदय को भूलें?
31 दिसम्बर आधी रात अंधेरी
सर्दी में ठिठुर-ठिठुर कर
नए साल के स्वागत में
क्यों अंग्रेजी में जश्न मनाएँ?
सोचो....
हम अपनी रीति क्यों छोड़ें?

हम भी भोर का स्वागत करें
मंगल कलश स्थापित करें
घर- घर होवें मंगलाचार
द्वार-द्वार तोरण बंदनवार।
नए-नए परिधान पहन कर
बड़ों को प्रणाम करें छोटों से
स्नेह-सिक्त हो गले मिलें
यथा योग्य अभिवादन कर
जी भर खुशियों से इठलाएँ।

अंग्रेज़ी का हो हल्ला या
शक्ति-भक्ति का वंदन
नए बरस का नया दिन है
सभी रहें प्रसन्न-वदन औ
रखें अपना उत्साहित मन।

धन-धान्य और समृद्धि लेकर
हर साल नया आता है
गु़ज़रे वक़्त का अँधेरा लेकर
जीवन में सुबह का उजाला और
मन में उत्साह नया भर जाता है
पिछला भूल कर आगे बढ़ें....
करें नव वर्ष का अभिनन्दन !!
नूतन वर्षाभिनन्दन !!
हैप्पी न्यू ईयर !!


टिप्पणी: (नव वर्ष मनाने के उत्साह में हमें अपनी संस्कृति नहीं भूलनी चाहिए।पश्चिम की सभ्यता हमारी नहीं है..वे लोग अपना कायदा अपनाते हैं तो हम भी अपनी सभ्यता भूलकर उनका अन्धानुकरण न करें।)




सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Monday, November 21, 2016

तकब १४ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #14]

#तकब१४ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #14]
मित्रो लीजिये अगली प्रतियोगिता आपके सम्मुख है. नियम निम्नलिखित है 
१. दिए गए चित्रों में सामंजस्य के साथ कम से कम १० पंक्तियों की काव्य रचना शीर्षक सहित होनी अनिवार्य है [ हर प्रतियोगी को एक ही रचना लिखने की अनुमति है]. 
- यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
[एक निवेदन- टाइपिंग के कारण शब्द गलत न पोस्ट हों यह ध्यान रखिये. अपनी रचना को पोस्ट करने से पहले एक दो बार अवश्य पढ़े]
२. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है जिसमे आपने रचना में उदृत भाव के विषय में सोच को स्थान देना है. 
३. प्रतियोगिता में आपके भाव अपने और नए होने चाहिए. 
४. प्रतियोगिता ११ नवंबर २०१६ की रात्रि को समाप्त होगी.
५. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा.
६. आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक प्रतियोगिता समाप्त न हो या उसकी विद्धिवत घोषणा न हो तथा ब्लॉग में प्रकशित न हो.
विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और जो निर्णायक दल के सदस्य है वे भी इस प्रतियोगिता में शामिल है हाँ वे अपनी रचना को नही चुन सकते लेकिन अन्य सदस्य चुन सकते है. सभी का चयन गोपनीय ही होगा जब तक एडमिन विजेता की घोषणा न कर ले.
निर्णायक मंडल के लिए : 
1. अब एडमिन प्रतियोगिता से बाहर है, वे रचनाये लिख सकते है. लेकिन उन्हें चयन हेतु न शामिल किया जाए.
2. कृपया अशुद्धियों को नज़र अंदाज न किया जाए।
धन्यवाद !

तकब 14  के विजेता है श्री मदनमोहन थपलियाल 'शैल' जी - हार्दिक  बधाई  इस परिवार की ओर से 

बालकृष्ण डी ध्यानी
~शून्य पर मेरी ऐ कविता~


शून्य पर मेरी ऐ कविता
अपने पर हो जैसे रचित सरिता
हर उद्गम का स्थान है जो
प्रथमता पद का प्राण है वो
शून्य पर मेरी ऐ कविता ..............

एक गोल से पल्लवित होती
कृष्णधवल के संग रंग रोपण करती
तरह तरह के वो स्तर पर जाती
अपने को जंचती और परखती
शून्य पर मेरी ऐ कविता ..............

शून्य आसमान है वो निहारती
कैसे कैसे वो आभा जगाती
शून्य से बस अब अलख जगी है
जैसे वो मेरी कोई बिछड़ी सखी है
शून्य पर मेरी ऐ कविता ..............

जब कुछ नहीं था तब भी थी वो
जब सब कुछ है तब भी है वो
रातों में चमकते वो सितारे जैसी
अंधियारे मन की वो उजियारे जैसी
शून्य पर मेरी ऐ कविता ..............

संख्यों की संरचना है वो
मेरे अंदर की एक गणना है वो
अमूमन इकाई की वो शुरुवात
मेरे साथ आप को भी इससे हो जाएगा प्यार
शून्य पर मेरी ऐ कविता ..............

टिप्पणी : कविता की अलख भी शून्य से उभरती है और अपने ,हृदय के पटल दिमाग के कक्ष से उभरते हुये शून्य रूपी कागज के शून्य भावों में उभरकर एक नया भाव उपजा कर जाती है उसी तरह शून्य पर मेरी ऐ कविता अपने को परखने का एक माध्यम बने बस यही हेतु है 



नैनी ग्रोवर 
~शून्य~


शून्य से उपजा मानव,
शून्य से ही धरा,
शून्य है ब्रह्मांड का रूप,
शून्य में ही, सब भरा...
निराकार से आकार बना,
आकार से हुआ साकार,
साकार से फिर उपजा,
सृष्टि का सुंदर पारावार...
एक सामान रहता है सदा,
ना घटता है ना बढ़ता,
शून्य जीवन की परिभाषा है,
नित नई अपिलाषाएँ गढ़ता..
शून्य से ही मिली गणना,
जिससे सारा संसार चले,
शून्य मन से ही उपजे प्रेम,
जिससे हमारा परिवार चले..
भरे हुए में कैसे भरे कोई,
शून्य हो तो बात बने,
शून्य मन से पूजो तो,
पथ्थर भी प्रतिपाल बने...!!


टिप्पणी:- शून्य का मतलब ज़ीरो भी है और खाली भी.. मैंने यहाँ दोनों को सांझा सोचा है..!




डॉली अग्रवाल 
~शून्य नही थी में ~

जीते थे मुझ में कुछ ख़्वाब
कुछ एहसास और कुछ धड़कने भी
नाकार दिया था तुमने मेरा वजूद
शून्य बना छोड़ दिया
में भी जीवांत थी
जीना चाहती थी
जुड़ना चाहती थी
दशमलव भी कबूल किया था
क्योकि 1 ( एक ) साथ जुड़ा था
पर गणितीय ज्ञान तुमसे जुड़ा था
तुम आज भी एक ही हो
काश शून्य जोड़ा होता
तो
आज लाख बना होता !!

टिप्पणी : शून्य की भी किसमत क्या -- संख्या से आगे जुड़े तो वजूद नही पीछे जुड़े तो लाख बने !




प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~ शून्य - अनंत ~

शून्य
में गणित से कहीं अधिक आध्यत्म है
शून्य
ही वैदिक काल से अनंत की संकल्पना है
शून्य
कोई अविष्कार नहीं, यह एक खोज है
शून्य
सदियों से हमारी संस्कृति का हिस्सा है
शून्य
कही बना कहानी तो कही बना किस्सा है
शून्य
कहीं भरा और कहीं नज़र आता खाली है
शून्य
ही शुरआत है और यही अंत भी है
शून्य
में ही छुपा प्राणी जगत का सत्य है
शून्य
ही ब्रह्मांड में देता समय को गति है
शून्य
ही समग्र का क्रांति का ध्वजाहक है
शून्य
ही कालचक्र के नियमो का आधार है
शून्य
ही परमार्थ एवं मुक्ति का द्वार है
शून्य
ही आदि है एवं अनंत भी है
शून्य
ही शून्य है एवं शून्य ही पूर्ण है

टिप्पणी :
ईशोपनिषद में कहा गया है
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः॥
ॐ वह (परब्रह्म) पूर्ण है और यह (कार्यब्रह्म) भी पूर्ण है; क्योंकि पूर्ण से पूर्ण की ही उत्पत्ति होती है। तथा [प्रलयकाल मे] पूर्ण [कार्यब्रह्म] का पूर्णत्व लेकर (अपने मे लीन करके) पूर्ण [परब्रह्म] ही बचा रहता है. त्रिविध ताप की शांति हो 'पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते' का भावार्थ है "शून्य" के समान 'अनंत से अनंत घटाने पर भी अनंत ही शेष रहता है'





Shalini Mehta 
~शून्य सहज नही ~

शून्य सहज नही
शून्य वहम भी नही
शून्य शोध नही
शून्य ठोस भी नही
शून्य मोक्ष नही
शून्य कोश भी नही
शून्य सरल से तरल होता भाव है
शून्य व्याख्या नही; विश्वास है
शून्य मिट्टी से हयूमस
हयूमस से पादप
पादप से वृक्ष
वृक्ष से हरीतिमा
हरियाली से जीव
जीव से नभ
नभ मे मेघ
मेघ मे वर्षा
वर्षा मे प्रकृति
प्रकृति की गोद मे कुलांचे मारता शून्य

टिप्पणी : (प्रतियोगिता हेतु नही लिखी गई उपरोक्त पंक्तियाँ; क्योंकि रूक नही पाये भाव प्रतिबिम्ब  बड़थ्वाल जी को पढते हुए इसीलिए लिख दिया )




ब्रह्माणी वीणा हिन्दी साहित्यकार
~मेरी अवधारणा~
🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
शून्य के प्रति ,
मेरी अवधारणा है
हम परमात्मा नहीं हैं
उनका सिर्फ अंश हैं छाया हैं
एक विवेक शून्य बालक
अतः शून्य से ही प्रारंभ,
मेरी अबोध जीवन यात्रा
मैं गुब्बारा व सिर्फ पतंग हूँ और डोर ?
,भगवान व नियति के हाथ में
शून्य से ही हम प्रगति करते हैं
वो भी कर्म व भाग्य के द्वारा
शून्य को गणात्मक आधार मानते है
किन्तु बिना 1संख्या ( ईश्वर ) के बिना
शून्य सिर्फ शून्य है
कोई अस्तित्व नहीं
धूल ,धरा ,नभ ,जल व मानव -मन
सब अपनी स्थिति में,
यदि परम पिता की दिव्य चेतना
इन सभी शून्य को,
रूपांतरण व जीवंत ना करें /
शून्य रह जाएंगे /
********************

टिप्पणी: प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल जी की भावना का स्वागत है मैं भी शून्य को जीवन की सृजनात्मक शक्ति मानती हूँ सिर्फ परमात्मा से अनुप्राणित ,,,,धन्यवाद





किरण श्रीवास्तव
 "अस्तित्व"

शून्य से ही बना शरीर,
शून्य से विस्तार है!
कर्म शुरू भी शून्य से,
शून्य से अवतार है।।

उतार-चढ़ाव है जीवन में,
नहीं कही ठहराव है!
ठहर जाये जीवन तो फिर,
शून्य से शुरूआत है ।।

भागे जब आगे-आगे तब,
शून्य वजूद हो जाता है!
नतमस्तक हो जाये पीछे,
भाव समझ आ जाता है।।

एकाकीअस्तित्व नहीं ...,
मिलकर ही निर्माण है!
मिलकर के ही राष्ट्र बने,
फिर बनता देश जहां है।।

टिप्पणी- गणितीय शून्य और शून्य(खाली) दोनों को परिभाषित करने की कोशिश की है....।



कुसुम शर्मा 
~शून्य~
----
विश्व का आधार भी और अंत भी है शून्य,
है अपने मे पूर्ण भी और अपूर्ण भी है शून्य ,
हुआ है समय का आरम्भ भी और अंत भी इससे
होता नही अस्तित्व जो इसका तो कैसा होता ये शून्य

किसी को रंक तो किसी को राजा बनाता है ये शून्य
लगे आगे तो क़िस्मत बदल दे लगे पीछे तो क़िस्मत पलट दे
कहने को तो है शुन्य पर चमत्कार है शून्य

होती नही गणना इसके बिना पूरी
इसी ने बाँधी है इस सृष्टि की घूरी
यही वेदों का मूलधार
यही यज्ञों का सूत्रधार
यही आत्मा है यही परमात्मा है
यही अगोचर और अगम है
न यह महान है, न ह्रस्व है, न लघु है,
न दीर्घ है, न यह लाल है, न हरा है,
न मजीठ, न पीला और काला ही है।
यह वर्णवहीन और आकृतिविहीन है!

होता नही यह तो होती नही गणना
तो पता कैसे चलता रावण के १० सर
और कौरवों के १०० पुत्रों की गणना !!

टिप्पणी :- शून्य अपने ही पूर्ण है कुछ न हो कर भी सब कुछ है वेदों का मूलधार है यज्ञों का सूत्रधार है यह किसी की भी क़िस्मत पलट सकता है न इसका कोई आकार है न ही वर्ण इसके बिना अंकों की संख्या पूरी नही होती यही नही होता तो हम गणित को कैसे जान पाते न ही हमे पता चलता रावण के १० सिर और कौरवों के १०० पुत्रों के बारे मे विश्व के अंगिनत तारो के विषय मे यानी की ये नही तो सृष्टि का कोई आधार नही !!




Madan Mohan Thapliyal
 🎀🎀🎀🎀 मैं शून्य हूँ  🎀🎀🎀🎀
( समग्रता )
 🎀🎀🎀🎀

मैं शून्य हूँ -
मुझसे पहले न कोई था-
और न कभी होगा.
पूर्ण सत्य भी मैं -
पूर्ण ब्रह्म भी मैं -
चराचर जगत का नियन्ता भी मैं -
ब्रह्मांड का उद्गम भी मैं -
विस्तार भी मैं.
साकार भी मैं -
निराकार भी मैं.
मैं किसी के बन्धन में नहीं -
मैंने किसी को बांधा नहीं -
मैं स्वच्छंद हूँ -
सर्वत्र हूँ .
अचेतन औ चैतन्य भी मैं -
वेद-वेदांत का ज्ञान भी मैं -
ॠषि मुनियों का ध्यान भी मैं -
विद्या विशारद भी मैं -
संज्ञाशून्य भी मैं -
ज्ञान भी मैं, अज्ञान भी मैं -
हर वस्तु का मूल्यांकन भी मैं -
गणित भी मैं, गणितज्ञ भी मैं -
सिद्धांत भी मैं, सूक्ति भी मैं -
हर तंत्र,मंत्र का आरम्भ भी मैं -
समाधान भी मैं -
उत्पति भी मैं, प्रलय भी मैं -
जीवन भी मैं, मोक्ष भी मैं -
प्रत्यक्ष भी मैं, परोक्ष भी मैं -
जीवन का सूत्रधार भी मैं -
सर्वोपरि मैं, चिरनिद्रा भी मैं.
मेरे करते ही सब शुरू होता है -
और अन्त भी होता है-
मैं अजर हूँ, अमर हूँ!!!!
******

टिप्पणी: सम्पूर्ण सृष्टि को चलाने वाला शून्य ही है, शून्य सबकुछ है, शून्य के बगैर कोई कल्पना भी नहीं कर सकता है.




Prerna Mittal
~ अनंत~
*****

कैसी यह बेरहम ज़िंदगी
शून्य से शुरू शून्य पर ख़त्म
बिना बताए, बिना पूछे मिल जाती
क्या इसका कोई मतलब नहीं

लाया कोई हमें इस संसार में क्योंकर ?
क्या मन बहला रहा ईश्वर, खिलौने बना-बनाकर ?
क्या उद्देश्य इतना ही, मनोरंजन हो उसका ?
अरे रुको ! या कदाचित् इससे कुछ ज़्यादा ?

शून्य बढ़ा देता है मूल्य, दस गुना, फिर और दस गुना
कहीं चाहता यही तो नहीं, सो हमारा यह जीवन बुना
बनें अपने युग के आर्यभट, बनाए नित नए कीर्तिमान
अपने साहस, बुद्धि और त्याग से करें समाज का नवनिर्माण
कर जाएँ समाज के लिए कुछ ऐसा
जो किसी ने कभी ना किया हो वैसा
देख रहा है वह, कौन बढ़ा पाता है शून्य को कितने गुना
क्या पीछे छोड़ जाएगी उसकी संतान, अपने क़दमों के निशाँ ?

टिप्पणी : व्यक्ति का जीवन केवल कीड़े-मकोड़ों की तरह जीने के लिए नहीं बल्कि कुछ कर जाने के लिए होता है । जिस तरह शून्य का कोई अंत नहीं उसी तरह करसक आदमी मरकर भी अमर हो जाता है ।





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Thursday, October 20, 2016

#तकब१३ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता 13



#तकब १३ (तस्वीर क्या बोले - प्रतियोगिता 13)
इस बार चित्र पर आप अपने भाव भारत के प्रधानमंत्री श्री मोदी जी की कूटनीति, राजनीति और सोच पर लिखे। 
- काव्य की किसी भी विधा में हो, 10 पंक्तियाँ, शीर्षक सहित, स्वरचित हो और देवनागरो लिपि में हो। 
- 12, अक्टूबर 2016 इस प्रतियोगिता में अपनी रचना भेजने का अंतिम दिन है। आप अपनी रचनाये अपनी दीवार या कही तभी प्रेषित करे जब समाप्ति के बाद विजेता और ब्लॉग में पोस्ट होने की घोषणा हो जाये।
शुभकामनाये
(एडमिन की रचनाये प्रतियोगिता के लिए शामिल नही होंगी - धन्यवाद )

इस बार विजेता है सुश्री  किरण श्रीवात्स्व जी .. बधाई  एवं  शुभकामनाएं 

रोहिणी शैलेन्द्र नेगी 
~मार्ग-दर्शक~
********
चलो ले चलूँ तुम्हें डगर उस,
मिले जहाँ सम्मान, रहें ख़ुश,
विश्व-पटल अंकित कर रेखा,
ध्वजा वहाँ जहाँ कभी न देखा,

मैं निर्भिग्य सदा सेवक बन,
प्रधानता का परिचय दूँगा,
सर्व-प्रथम सुख तुमसे मेरा,
दूर अज्ञान समस्त करूँगा,

विडम्बनाएें फैला कर कुछ,
हैं अराजक तत्व समझते,
शोषित-कुपित रहें जनता जो,
सिर-आँखों पर उनको रखते,

मेरा प्रण मैं साथ सदैव,
सभी के संग-प्रसंग रहूँगा,
विजय-घोष का डंका बन कर,
विश्वाधार अनन्त बनूँगा ।।



किरण श्रीवास्तव 
~युग पुरूष~
=====================

नमो तुम्हें शत् शत् नमन
दिया सभी को चैन अमन..।
जीते तूने सबके जज्बात,
करके सबसे "मन की बात"।
किया सदा सही नेतृत्व,
सच तुमसे सब ही हैं तृप्त ।

देश के वीर जवानों को
तूने ऐसा मान दिया,
सीमा पर अभियान चलाकर,
शहादत का परिणाम दिया ।
देकर श्रद्धांजलि वीरों को
ऐसा सच्चा सम्मान दिया।

उस माता को है, नमन हमारा,
जिसने तुमको जन्म दिया ।
देश भक्ति का भाव दिया,
रग- रग मे उत्साह दिया,
आदर प्रेम सहिष्णुता का,
ऐसा खाटी संस्कार दिया।

खलबल मची राजनीति में
फिर भी आंच ना आयेगा
सत्ता का लालच है जिनको
फिर वो पलटी खायेगा।
जो भी बड़े विरोधी है
उनको समझो मनोरोगी हैं....।

जग जननी भारत माता भी
तुम जैसो पर वारी हैं ।
भारत माता की खातिर,
जनता भी सब कुछ हारी है ।
सबको अब है यही दरकार ,
हर बार मोदी सरकार...!!


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~नेतृत्व~

संघ का स्वयंसेवक
संस्कृति का संवाहक
भारत माँ का सच्चा साधक
श्रेष्ठ भारत का सपना लिए
संस्कारो का बना प्रचारक

पाकर माँ का आशीर्वाद
भारत माँ की सेवा करने चला
हर वर्ग का रख ख्याल
नागरिक कर्तव्य का भेद समझाया
जन योजनाओं की कर शुरआत
सांझा करता मन की बात

देकर मात विपक्ष को
दुश्मनों को कर अकेला
कूटनीति की बदल परिभाषा
राजनीति का बना बड़ा खिलाड़ी
कर कर्म बना जनता का सेवक
विश्व गुरु बने भारत
चला है वो लेकर केवल लक्ष्य एक

कर भ्रमण दुनिया का
शांति का सन्देश पहुँचाया
नीति राष्ट्र हित की लेकर
अपना लोहा मनवाया
मित्र राष्ट्रों को लेकर साथ
सबका साथ सबका विशवास पाया

कर त्याग गौतम सा, संसद में शीश नवाया
देश विदेश में भारत की बनी नई पहचान
तिरंगे संग ‘मोदी’ का परचम लहराया
गर्व है हमें, जो भारत ने ऐसा नेतृत्व पाया
जनता की आस और विश्वास का नाता गहराया

जय भारत ......


ब्रह्माणी वीणा हिन्दी साहित्यकार 
*गीतिका *
=======
~मोदी का अपना व्यक्तित्व~
*********************
🍭🍭🍭🍭🍭🍭🍭🍭🍭🍭🍭
********************************
देश कर्णधार बनकर ,,,, ,वादों को निभाया मैंने
बुझा था दीप जागरण का,,,,,उसे जलाया मैंने /
~~~~~
सब ओर थीं आॅधियां,जाति,धर्मअथिकार की,
जन गण में एकता का,पाठ पढ़ाया हमने /
~~~~~~~~
जिंदगी में सदा, आशीर्वाद रहा है अपनी माॅ का ,
उनके ही चरणों में, देश गौरव व जन्नत पाया मैंने /
~~~~~~~~
चिंता नहीं मुझको, ,,,,,,संसदीय दल विरोधियों की
जब घिरा काश्मीर,पाक दुश्मन कोभगाया हमने
~~~~~~~~~
मैं संघ सेवक हूँ, निस्वार्थ समर्पित भारत माता का,
राष्ट्र सर्वोपरि"नीति लेकर सदैव लोहा मनवाया मैंने
~~~~~~~~~~
हिन्दी मातृभाषा, स्वाभिमान व पहचान है हिन्द की
शपथ लेते हेतु, भाषा हिन्दी ही अपनाया हमने /
~~~~~~~~~~
भारत विश्व गुरु बने ,फहराए देश का ध्वज- तिरंगा ,
दिल में यही आकांक्षा है,यही ख्वाहिश जताया मैंने
~~~~~~~~
जय हिन्द ,जय हिन्दी, जय जवान ,
वंदे मातरम् ,,,,,

संदर्भ संदेश
========
प्रस्तुत रचना में मोदी की अपनी मुखरित कर्तव्य गाथा है वे राष्ट्र के प्रधानमंत्री के साथ साथ निस्वार्थ देश भक्त ,संघ सेवक, सफल राजनीतिज्ञ के रूप में, ,देश के गौरव पूर्ण पटल पर अवतरित हुए हैं, ,,वे
अप्रतिम है कुशल कर्णधार है भारत स्वदेश के, ,,,,,,,,,जय हिन्द जय जवान



बालकृष्ण डी ध्यानी 
*****************
कुछ तो बात अलग है

कुछ तो बात अलग है
चले जिधर भी तू चले तेरे संग संग जग है

निर्मल गंगा पल पल बहती जाती
अविरल गंगा कल कल अपना मार्ग स्वयं बनाती
लेकर सारा शांतिकुंज अपने साथ चला तू
तीन रंगों को अब अपने रंग में रंग ने चला तू

कुछ तो बात अलग है
तुझ से अब हम हैं अब हम से तू है

आठ दिशायें अब बोल पड़ी है
चुप थी अब तक वो अपना मुंह खोल पड़ी हैं
भुजाओं को तेरे देने अपने वो सारे बल को
देखा तुझे और वो सारी दौड़ पड़ी है

कुछ तो बात अलग है
मेरे भारत भाग्य की तू एक किरण है

कुछ तो बात अलग है

टिप्पणी : बस प्रेम है हमे इस भारत के प्रधान सेवक से


नैनी ग्रोवर 
~ नई राह~

बाद युगों इक,
नई राह मिली है,
स्वच्छ भारत की,
नई चाह मिली है..
पकड़ के जिसे,
हम चले सरहद की और,
हौंसलों को,
वो मजबूत बाहं मिली है..
वीर सैनिकों को दिया,
इक इशारा जो तुमने,
मिटटी में मिला आतंक वहीं,
जहाँ पनाह मिली है..
जतला दिया दुनिया को,
अब और ना सहेगा भारत,
नई रणनीति की हमें,
इक नई सलाह मिली है...!!


गोपेश दशोरा 
-हर-हर मोदी...


है नरों में इन्द्र यह,
साबित भी इसने कर डाला,
जो भी आया इसके सम्मुख,
एक बार तो इसने धो डाला।
बिन बोले यह हर काम करे,
दुश्मन से भी ना तनिक डरे,
जो कहता है वो करता है,
वचनों से अपने नहीं फिरे।
चाणक्य का अवतार है यह,
राजनीति का महागुरु,
जब से आया है सत्ता में,
परिवर्तन का दौर हुआ शुरू।
देश के सब नेताओं को,
नीति इनसे ही सिखलाई।
विश्व पटल पर इसने ही,
भारत की नव छवि दिखलाई।
कितना विरोध भी इसका हो,
नहीं ध्यान किसी पर देता है।
कर्मों से देता है उत्तर,
संसार देखता रहता है।
हर-हर मोदी, घर-घर मोदी,
का नारा जब से सफल हुआ।
देश हुआ समृद्ध वहीं,
दुनिया के सम्मुख सबल हुआ।
विश्व शक्तियां अब तो यहां
आगे चल कर हाथ बढ़ाती है।
क्या करना, कैसे करना है?
अपनी नीति बतलाती है।
मोदी ऐसे ही बने रहो,
भारत को आगे जाना है।
भारत माँ के सच्चे लाल हो तुम,
अब तो सकल विश्व ने माना है।


टिप्पणीः पहली बार एक ऐसा नेता को देखा है जिसमें हिम्मत है सच को सच और झूठ को झूठ कहने की, और दुश्मनों को उनकी भाषा में जवाब देने की। अब लगता है कि भारत का अच्छा समय आने वाला है।


Sunita Pushpraj Pandey 
मोदीनामा
कुछ तो बात है तुममे मोदी हर हर मोदी नही घर घर तुम सा मोदी चाहिये
बापू के बाद तुमने ही साफ सफाई की क्रांति फैलाई
घर घर सौचालय बनवा तुमने नेक काम किया गररजे भी तुम ही बरसे भी तुम भी
डिजिटल इंडिया का स्वपन तुम्हारा देखते देखते साकार हुआ
सर्जिकल स्ट्राइक करवा लाखो मुँह पर ताले जड़ डाले ।


मीनाक्षी कपूर मीनू 
मैं और तुम बने * हम *

मैं ...........
मैं नहीं तुम हो
तुम नहीं किसी से कम हो
तुम से ही निकला
मैं ..............
बैठ धरा पर चाय पीते पिलाते
कदम तुम सब संग आगे बढ़ाते
आज मैं.........
हूँ जहाँ ,,तुमने ही तो भेजा है
आओ ....उठो चलो सँग मेरे
आज तुम्ही तो हो अंग मेरे
देश को आगे बढ़ाना है
भ्रष्टाचार को मिटाना है
आंतक को दूर भगाना है
मैं ... ........
को सब संग मिलाना है
आज है ज़रूरत
हमें एक होने की....
मिलजुल के हर एक
दुःख को सहने की
देश के कोने कोने में
छिपे आतंक को
पकड़ बाहर निकालेंगे
मनस्वी ,,,
अपने भारत को स्वच्छ
और डिज़िटल बनाएंगे .....
मैं ...और तुम ..
रिश्ता पवित्र पुराना है
आओ उठो... चलो
मैं और तुम से
*हम *बनाना है ,,,
*हम*हो कर ही नतमस्तक
करेंगे हम सब को
*भारत मोदी* बन
*मोदी*
कहलायेगा तब तो ,,,,,,,,, , :)


कुसुम शर्मा 
~है भारत माँ का सच्चा लाल~
*******************
है भारत का सच्चा लाल
तभी तो है उसकी शेर सी चाल
बड़े वेग से बढ़ता जाए
कहे काम जो करता जाए
देश बिदेश मे डंका बजाया
अपनी भाषा का मान बढ़ाया
योग का प्रचार किया जब
विश्व को योग दिवस दिया तब
हर क्षेत्र को आगे बढ़ाया
नारी का तुम ने स्थर बढ़ाया
दुश्मन देश के छक्के छुड़ाये
अंतकवादी को वही गिराये
जो आज तक हुआ नही
वो तुम ने कर के दिखलाया
सर्जिकल स्टाइक जैसे मिशन
तुम ने सफलता से करवाया
मृत सैनिकों का मान बनवाया
सहते तुम रहते तीखे व्यंग्य
विपक्ष हर दम तुम्हारे कामों से दंग
तुम हो भारत माँ के सच्चे वीर
कभी ख़ाली न जाये तुम्हारे तीर

टिप्पणी :- भारत मे बहुत सालों बाद एक ऐसा नेता हुआ है जिसने अपने देश का नाम विदेशों मे जा कर भी ऊँचा किया हमारी मात्र भाषा को विदेश मे भी मान दिलाया जो मिटने लगी थी उसे पूर्ण रूप से जीवित करके उसको उसका स्थान दिलाया ----योग के बारे मे बता कर विश्व भर मे योग दिवस मनवाया ----हर क्षेत्र को उन्नति की दिशा दी --हर क्षेत्र मे नारी को प्राथमिकता दी ---विपक्ष चाहे कुछ भी कहता रहे वह अपना काम करते रहते है ----अतंकवाद को ख़त्म करने के लिए तुमने सर्जिकल स्टाइक जैसा मिशन किया जो पूर्ण रूप से सफल रहा ---यह ऐसा कार्य था जो कभी किसी ने नही सोचा था कि हम भी ऐसा कर सकते है -----जिससे दुश्मन भी चक्करा गया और उसकी सच्चाई सारी दुनिया के आगे आ गई ----


प्रभा मित्तल 
~~~~कर्तव्यनिष्ठा~~~

मनुष्यमात्र के लिए तुम प्रेरणा के मूल स्रोत,
वचनबद्ध औ कर्म भाव से सर्वथा ओत-प्रोत।
तुम हिमालय सम उज्ज्वल उन्नत दृढ़ बली,
सीमा पर सजग सैनिक,तुम अपनी कर्मस्थली।
मन की बात की जन-जन से,स्नेह की धारा बही,
दुःख-सुख सुन उनका,प्रांत-प्रांत की खबर मिली।
स्वस्थ तन हो स्वस्थ मन हो,रहे निर्धन न कोई,
स्वच्छ हो घर-बाहर हमारा,न सुनें कहीं बेटी रोई।
दुश्मन को ललकारा है पोक हमारा, कश्मीर न देंगे
जंग हुई तो तुम ही नहीं सँभलोगे, हम संभाल लेंगे।
भारत भूमि हो या जननी वो सदा रहे मातृ-भक्त,
माँ की आँखों के तारे बन राष्ट्र को बना रहे सशक्त।
भ्रष्टाचार खत्म हो और काले धन पर रोक लगे,
सेवा औ सर्व-धर्म समभाव से बापू की राह चले।
प्रज्वलित हैं आशा के दीपक अच्छे दिन लौटेंगे
प्रधानमंत्री मोदी जी के सपने अवश्य ही सच होंगे।
सत्यमेव जयते,सत्यमेव जयते,सत्यमेव जयते!!

टिप्पणी: हमारे प्रधान मंत्री मोदी जी की कर्तव्यनिष्ठा पर किसी को संदेह नहीं।कुछ तो बात है इस व्यक्तित्व में जो विरोधी शक्तियाँ भी इस व्यक्ति को नहीं झुका पाईं।

सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Saturday, September 24, 2016

#तकब१२ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता तकब 12




#तकब१२ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #12]
मित्रो लीजिये अगली प्रतियोगिता आपके सम्मुख है. नियम निम्नलिखित है 
१. दिए गए चित्रों में सामंजस्य के साथ कम से कम १० पंक्तियों की काव्य रचना शीर्षक 
सहित होनी अनिवार्य है [ हर प्रतियोगी को एक ही रचना लिखने की अनुमति है]. 
- यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
[एक निवेदन- टाइपिंग के कारण शब्द गलत न पोस्ट हों यह ध्यान रखिये. अपनी रचना को पोस्ट करने से पहले एक दो बार अवश्य पढ़े]
२. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है जिसमे आपने रचना में उदृत भाव के विषय में सोच को स्थान देना है.
३. प्रतियोगिता में आपके भाव अपने और नए होने चाहिए.
४. प्रतियोगिता २२ सितम्बर २०१६ की रात्रि को समाप्त होगी.
५. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा.
६. आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक प्रतियोगिता समाप्त न हो या उसकी विद्धिवत घोषणा न हो तथा ब्लॉग में प्रकशित न हो.
विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और जो निर्णायक दल के सदस्य है वे भी इस प्रतियोगिता में शामिल है हाँ वे अपनी रचना को नही चुन सकते लेकिन अन्य सदस्य चुन सकते है. सभी का चयन गोपनीय ही होगा जब तक एडमिन विजेता की घोषणा न कर ले.
निर्णायक मंडल के लिए :
1. अब एडमिन प्रतियोगिता से बाहर है, वे रचनाये लिख सकते है. लेकिन उन्हें चयन हेतु न शामिल किया जाए.
2. कृपया अशुद्धियों को नज़र अंदाज न किया जाए।
धन्यवाद !
इस बार की विजेता है सुश्री वीणा ब्रहमाणी जी - शुभकामनायें 
राज मालपाणी ..
{राष्ट्र भाषा हिंदी}

हिंदी भारतवर्ष में ,पाई है मातु सम मान
यही हमारी अस्मिता और यही है पहचान
[ इसे पढ़ा था और इसके आधार पर कविता को सजाया ]

हिन्दी भाषा कितनी सुन्दर, है ये कितनी आसान
हिन्द देश की हिन्दी संस्कृति, है ये सबसे महान

हिन्दी राष्ट्र की अस्मिता , हिन्दी वतन की आन
हिन्दी सरस, सुधारस, है अशक्त तन में प्रान

हिन्दी सूत, सखी, श्याम-सी, है इसका वरदान
चीर-भारती,चक्षु सूर, एकता की अखण्ड कमान

हिंदी को कबीरा ने अपनाया, दिया मीराबाई ने मान
आज़ादी के शहीदों ने, दिया इस हिन्दी को सम्मान

हिन्दी चरित्र है भारत का, नैतिकता की है परिभाषा
हिन्दी सबका स्वाभिमान, यही सबकी है अभिलाषा

अंग्रेज़ी सभी के पास थी , थी मेरे पास हिंदी
जिसके पास जो थी, उसने उसी में लिख दी

___________" जय हिंद - जय हिंदी "____________




ब्रह्माणी वीणा हिन्दी साहित्यकार 

देव नागरी हिन्दी मातृ भाषा

देव सुता, कवि -मानस- हंसिनि ,लोकहुं लोक लुभावत हिंदी /
मातु समान महान सुजानहि , मोद प्रमोद लुटावत हिंदी /
मोहन की मुरली सम लागति ,गान सुगान सुनावत हिंदी /
सूर कबीर यथा रसखानहुॅ ,छंद कवित्त सिखावत हिंदी //
*************************
आखर- आखर कंचन जैसन ,लेख सुलेख रचावत हिंदी /
मातु पिता सम लागति प्रेमिल ,नेह -सुधा बरसावत हिंदी /
देशज भाषहि नेक अनेकहि,देवन -नागरि भावत हिंदी /
भारत में महिमा गरिमा अति, देश विदेशन छावत हिंदी //
*************************

संदर्भ चित्र संदेश 
===========
मेरा भाव हिन्दी दिवस पर ,,,हिन्दी की महिमा पर केंद्रित है वो माँ के समान प्यारी है अपनी मातृभाषा की लिपि माध्यम अक्षर= क ख ग सोने के समान मूल्यवान है जय हो हिन्दी,,,



नैनी ग्रोवर 
~मुझे जब हिंदी मिली~

चली जा रही थी मैं,
अपने में गुम,
बिन किसी उद्देश्य के..
जाने कैसी भटकन थी,
स्वयं भी समझ ना पाई,
टूटे-फूटे भावों को,
जोड़ने की अभिलाषा,
परन्तु छोड़ ना पाई..
टूकड़े-टुकड़े जोड़,
मैं भाव सजाने लगी,
फिर भी,
एक मरुथल सी प्यास,
मुझमे समाने लगी..
भावों से दूर,
मैं स्वयं को खड़ा पाती थी,
जब शब्दों की कमी,
मुझको सताती थी..
मझधार में डूबी-डूबी,
कलम लग रही थी,
कागज की आँखों में भी,
नमी लग रही थी...
सौतेली सी लगती थीं,
लिखी हुईं लकीरें,
जैसे बेरंग सी,
बना दीं मैंने तस्वीरें..
एक दिन सह्रदय मित्र ने,
"हिंदी" से परिचय करवाया,
भावों और शब्दों का,
तालमेल समझाया..
आने लगा समझ उद्देश्य,
कलम भी रंग में आई,
भावों ने भी जागकर,
खूब ली अंगड़ाई..
धन्यवाद प्रतिबिम्ब जी,
आपको कोटि-कोटि मेरा,
अब कोरे कागज़ पे लिखूंगी,
मैं रोज़ नया सवेरा..
हिंदी है पहचान हमारी,
हिंदी ही है ज्ञान,
हिंदी से ही जुड़े हैं हमसब,
जय हिंदी, जय-हिंदुस्तान...!!



टिप्पणी: हिंदी ने मुझे मेरी पहचान दी, शत शत नमन मेरी मातृ भाषा को..



अलका गुप्ता 
~~हिंदीगर्व हमारा ~~


मातृ-भाषा...हमारी...तुम्हारी...हिंदी |
शर्मिंदा..नहीं...है...आज हमारी..हिंदी |
समझ रहा विश्व ध्वनि विज्ञान अवतरित ये...
देवनागरी...संस्कारित...प्यारी....हिंदी ||

स्वाभिमान है आत्म ज्ञान हिंदी गर्व हमारा |
हिंदी..हैं .हम वतन...हिन्दुस्तान रव हमारा }
जन-जन की भाषा समझें वह हर भाव हमारा |
गुंजित है...ज्ञान-विज्ञान..संस्कार..पर्व हमारा ||

व्यर्थ गाते गीत हम क्यूँ विवश विप्र गुलामो के आगे |
तन मन बसे गुलामी..तोड़ न पाएँ ये..बंधन के..धागे |
ये सावन के अंधे..हैं..असली हरियाली को क्या जाने...
सिखे सिखाए श्वान हैं जो कम हियर..गो देयर पे भागे ||



नोट-जबकि हम और समस्त विश्व यह समझ चुका है कि हिंदी हर प्रकार से एक सुगम्य ग्राह्य और वैज्ञानिक भाषा है जिसकी अति प्राचीन देवनागरी लिपि है ... जिस पर हमें गर्व होना चाहिए ..पर अपनी ही मातृभूमी पर हिंदी का प्रचार प्रसार करना पड़ रहा है ...यह गुलाम मानसिकता में जकड़े लोग दुसरो की भाषा पर अपने को अभिजात्य समझ रहे हैं |


गोपेश दशोरा 
~अपनी हिन्दी~

भारत माँ के भाल की बिन्दी
कितनी प्यारी अपनी हिन्दी,
कितना प्यारा लगता है जब,
कोई अपना बोले हिन्दी।
हिन्दु, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई,
जैन, पारसी या हो सिन्धी
धर्म कर्म सब अलग है सबके,
पर सब में एका करती हिन्दी।
छोटे- बड़े का भेद है इसमें,
है कितनी व्यवहारिक हिन्दी।
है अनेको भाषा जग में,
सबसे मीठी लगती हिन्दी।
रोला, छप्पय, कवित्त, सोरठा,
छन्दो से इठलाई हिन्दी।
उपमा, यमक, अनुप्रास, उत्प्रेक्षा
अलंकारों से शरमाई हिन्दी
मात्र भाषा इसे ना समझो,
ईष्वर का वरदान है हिन्दी।
गर्व करों महसूस सभी तब,
जब-जब मुख से निकले हिन्दी।

टिप्पणीः हमारी मातृभाषा जो आज मात्र भाषा बन कर रह गयी है। लेकिन वास्तव में हिन्दी जैसी कोई भाषा नहीं है। और यह बात आज की नई पीढ़ी को समझनी होगी।


किरण श्रीवास्तव 
( मैं हिन्दी हूँ)
===================

नहीं केवल एकभाषा हूँ,
मैं देश की परिभाषा हूँ।
सबने मुझको मान दिया,
मातृभाषा का सम्मान दिया ...।

मुझमें ही तो संत बसे हैं,
कबीर रहीम और पंत बसे हैं।
आभार सभी कृतिकारों का,
भारत के राज दुलारों का ।

वर्चस्व हमेशा बना रहे,
कोशिश तुम करतेही रहना।
चहुंओर उपयोग रहे अपना,
एक राष्ट्र बनाना तुम ऐसा ।

मुझसे ही पहचान तुम्हारा,
मुझपर ये एहसान तुम्हारा ।
औरों को भी मान मिले ,
ऐसा हो कर्तव्य तुम्हारा ।

भारत का मैं हूँ गहना ,
सुख- दु:ख भी है ,मुझको सहना ।
फिर भी माथे की बिंदी हूँ,
हां मैं ही तो हिन्दी हूं...!!!!

===================
टिप्पणी--
हिंदी हमारी मातृभाषा है,श्रेष्ठ है फिर भी इसका उपयोग अन्य क्षेत्रों में कम है।आज विदेशी भाषा का बोलबाला है । वैसे हर भाषा का अपना अलग महत्व है।जानकारी होना जरूरी है, लेकिन अपनी मां तो आखिर अपनी ही मां होती है।इसके महत्व को जानें, इसे दिल से स्वीकार करे । इसके विकास में अग्रसर रहें।चहुंओर प्रयोग हो इसका । ताकि गर्व से कह सके हम हिंदी हैं हम हिन्दूस्तानी हैं.....।



प्रभा मित्तल
~~~हिन्दी मेरी पहचान~~~

हिन्दी मेरी भाषा है
हिन्दी मेरा मान है
हिन्द वतन है मेरा
हिन्दी ही पहचान है।

मेरी माता है हिन्दी,सो
हिन्दी आसां लगती है
हिन्दी में सपने आते हैं
सोच में हिन्दी भाती है

वैसे तो मेरे आज़ाद देश में
हर प्रान्त की अपनी भाषा है।
यहाँ हर जन - मानस में बसी
हिन्दी एकता की परिभाषा है।

पावन संस्कृत की लाडली
हिन्दी मधु रस की गोली है,
फिर भी क्यों हर जुबान पर
यहाँ अंग्रेजी की ही बोली है।

बच्चों की शिक्षा अंग्रेज़ी
शुभ सुबह भी होती अंग्रेज़ी,
प्रणाम - नमस्ते बुढ़ा गए,
हाय-बाय में रहती अंग्रेजी।

अम्मा बाबू जी के घर में
मॉम डैड अब रहते हैं,
दीदी - भईया को भी सब
सिस - ब्रो ही कहते हैं।

अक्सर दुःख होता है मन में,
आज़ादी तो अंग्रेजी ले गई।
भाषा के अल्प-प्रयोग से,माँ
हिन्दी बेड़ियों से जूझ रही।

साल में एक दिन श्राद्ध जैसे
हम हिन्दी दिवस मनाते हैें।
हर दिन काम करें इसपर तो
राष्ट्र-भाषा दिवस मनाएँगे।

प्रण करें सभी मिलजुल कर
प्यारी हिन्दी को अपनाएँगे,
देश-विदेश में चर्चित भाषा को
राष्ट्रभाषा का गौरव दिलवाएँगे।

(हर देश की अपनी भाषा होती है,तो हम अपनी भाषा की उपेक्षा क्यों कर रहे हैं? हम सब प्रण करें कि हिन्दी को अपनाकर इसे राष्ट्रभाषा का गौरव दिलवाएँगे।)



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~एक दिवस नहीं~

जन्म से मेरा इसका नाता
सुनता, पढ़ता, लिखता आया
मातृभाषा कह इसे अपनाया
मातृभूमि की पहचान बनाया
हम एक दिवस पर क्यों सिमट जाएँ?

मन्त्र मुग्ध करने वाली मेरी हिन्दी
स्वर व्यंजन से सुशोभित मेरी हिन्दी
संस्कृत से जन्मी संस्कारित मेरी हिन्दी
भारत की संस्कृति का आधार मेरी हिन्दी
हम एक दिवस पर क्यों सिमट जाएँ?

अपनी भाषा को पिछड़ा कहते
पर भाषा को खुशी से अपनाते
राज की हम इसे भाषा कहते
राष्ट्रभाषा करने हेतु क्यों नही लड़ते
हम एक दिवस पर क्यों सिमट जाएँ?

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Wednesday, August 24, 2016

#तकब११ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #11]







#तकब११ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #11]
मित्रो लीजिये अगली प्रतियोगिता आपके सम्मुख है. नियम निम्नलिखित है 
१. दिए गए चित्रों में सामंजस्य के साथ कम से कम १० पंक्तियों की काव्य रचना शीर्षक 
सहित होनी अनिवार्य है [ हर प्रतियोगी को एक ही रचना लिखने की अनुमति है]. 
- यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. 
चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
[एक निवेदन- टाइपिंग के कारण शब्द गलत न पोस्ट हों यह ध्यान रखिये. अपनी रचना को
पोस्ट करने से पहले एक दो बार अवश्य पढ़े]
२. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है जिसमे आपने रचना में उदृत भाव 
के विषय में सोच को स्थान देना है. 
३. प्रतियोगिता में आपके भाव अपने और नए होने चाहिए. 
४. प्रतियोगिता २० अगस्त २०१६ की रात्रि को समाप्त होगी.
५. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो 
तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा.
६. आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक प्रतियोगिता समाप्त न हो या 
उसकी विद्धिवत घोषणा न हो तथा ब्लॉग में प्रकशित न हो.
विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और जो निर्णायक दल के सदस्य है वे भी इस 
प्रतियोगिता में शामिल है हाँ वे अपनी रचना को नही चुन सकते लेकिन अन्य सदस्य चुन 
सकते है. सभी का चयन गोपनीय ही होगा जब तक एडमिन विजेता की घोषणा न कर ले.
निर्णायक मंडल के लिए : 
1. अब एडमिन प्रतियोगिता से बाहर है, वे रचनाये लिख सकते है. लेकिन उन्हें चयन हेतु न 
शामिल किया जाए.
2. कृपया अशुद्धियों को नज़र अंदाज न किया जाए.



इस बार की विजेता है  सुश्री आभा अग्रवाल  - बधाई  एवं शुभकामनाएं 

Meena Prajapati 
~पृथ्वी के रंग~

मुझमें बहुत कम रंगत हैं
पर! मेरी दुनिया रंगीन है
यहाँ हरे, लाल, पीले
नीले, सतरंगी सभी जन हैं
ये मेरे अपने हैं इसलिए ही,
मुझे कुरेदते हैं, मसलते हैं
चढ़ते हैं, खोदते हैं
सभी रंग बहुत खुश हैं
अपने लाल आयतो में
मैंने तो इंसान बनाये थे
मन्दिर, मस्जिद, द्वारा नहीं
तुम समझदार व्यक्ति थे
बेज़ुबान को मारने
वाले हैवान नहीं
मुझे घेरो मत हाथों से
धर्म, जाति-पाति के
गहने ना पहनाओ
रंगत, खुशियाँ बांटो
फूल ,पाती,तलैया
मेरे हर अंग को
नोच खा लिया है
मेरा बलात्कार हुआ है
मुझे फाड़ दिया है
गाय और सूअर जैसे
नहीं सह पा रही हूँ
तेरा कुरेदना और फाड़ना
मेरा दम घुट रहा है
मैं पृथ्वी और मेरा
रंग ढल रहा है
हौले हौले।

टिपण्णी:- उपरोक्त पंक्तियाँ लिखते समय मुझे इस तस्वीर के रंगों ने बहुत प्रभावित किया और पृथ्वी को घेर कर खड़े लोग मुझे परेशान करने लगें। अपनी इसी परेशानी को मैंने अपनी कविता में लिखनी की कोशिश की है।





Prerna Mittal 
~वसुधैव कुटुंबकम~
~~~~~~~~~~

वसुधैव कुटुंबकम का आज तक, जिसका जैसे मन चाहा, उसने मतलब लगाया,
ज़ी टी.वी. ने भी इसे, अपना प्रचार वाक्य बनाकर ख़ूब नाम कमाया ।

महाउपनिषद में प्रथम उल्लेख, वसुधैव कुटुंबकम का,
ऊँच-नीच भेदभाव से ऊपर प्रयोजन था एकता का।
आर्यन थे इसके प्रवक्ता,
हमारी संस्कृति के निर्माता ।
धरती थी उस समय अभिशापित,
ऊँच-नीच जात-पात से कलुषित ।
बुद्ध, महावीर स्वामी ने सामंजस्य बिठाया,
सारे विश्व को समानता का पाठ पढ़ाया ।

ख़्वाब अखंड भारत का देखा चंद्रगुप्त मौर्य ने,
सिकंदर महान भी चला विश्व पर विजय करने ।
शायद यही था तात्पर्य इनके लिए वसुधैव कुटुंबकम का,
बनाएँ पूर्ण धरा को एक कुनबा करके साम्राज्य स्वयं का ।

चौदहवीं सदी में मंगोलों ने मचाई बहुत धूम,
साम, दाम, दंड, भेद सब अपनाया घूम-घूम ।
पन्द्रहवीं सदी में कोलंबस ने ढूँढा अमेरिका,
परिवार को खोजना ही रहा होगा उद्देश्य उसका ।

बाद में मुग़लों ने सबको मुसलमान बनाया,
वसुधैव कुटुंबकम का नया मतलब समझाया ।
अंग्रेज़ों ने भी किया, सम्पूर्ण दुनिया पर राज,
पूरी वसुधा को क़ुटुंब बनाया, सर पर पहना ताज ।

आख़िरकार कम्प्यूटर-इंटरनेट ने किया स्वप्न पूरा पूर्वजों का,
कभी सोचा ना होगा ऐसा, करते समय सृजन वेदों का ।
पृथ्वी बन गई अब, क़ुटुंब सच में,
सिमट गई, हस्त में पकड़े मोबाइल में ।

सहकर्मी, मित्र और पड़ोसी अब परिचितों से आँखें चुराते हैं,
पोकीमोन की खोज में अजनबियों को दोस्त बनाते हैं ।
अब है आदमी को ख़बर, पूरे जगत की,
सुध ना है केवल, अपने घर के जन की ।

टिप्पणी: यह चित्र एकता और भाईचारे का संदेश दे रहा है । जिसे हमारी संस्कृति में हमेशा प्राथमिकता दी गई है । उसमें दिए गए वसुधैव कुटुंबकम के संदेश की मैंने इतिहास और आज के संदर्भ में अपने दृष्टिकोण से विवेचना करने की कोशिश की है ।




Sunita Pushpraj Pandey 
****दुनिया ****


दुनियाभर के लोग
अलग - अलग रूप, अलग - अलग रंग
जीतने को दुनिया कर रहे मानवता का खून
कहाँ रहे जीसस अब कहाँ गये संत रविदास
न रहे अब वैसे पीर फकीर
जो करते इंसानियत का गुणगान
सुख शांती कायम रखने को
कभी उठा करती थी तलवार
अब रक्त पिपासा बन
सत्ता के मद में मचा रही संहार।

टिप्पणी - बहुत कष्ट होता है मानवता का खून बहते




नैनी ग्रोवर
~ सोलह आने सच ~


दाता ने दी धरती,
और अम्बर नीला नीला,
चाँद सितारे बना के उसने,
दिखा दी अपनी लीला..
फिर बनाए आदम और हुव्वा,
दिया धरती पे भेज,
बसने लगी फिर ये दुनियाँ,
ज्यूँ सूरज का तेज...
बना लिए फिर मानव ने,
भिन्न भिन्न ये भेस,
दे दिए, नाम धरती को,
देश और विदेश..
कोई नही पराया जग में,
बात है सोलह आने सच,
इसलिए कहा सन्तों ने,
नफरत से तू बच...
पहरावा पहचान मात्र है,
ज्यूँ सूरत अलग अलग है,
पर खून है सबमे एक ही जैसा,
ज्यूँ जोत से ज्योति ना विलग है...
रंग बिरंगी इस दुनिया में,
प्यार ही प्यार बरसा दो,
ऐ नीली छतरी वाले,
मानव को ये बात ज़रा समझा दो...!!

टिप्पणी : इंसान से इंसान की बेरुखी, और जात पात का भेदभाव,





Kiran Srivastava
(हमारी पृथ्वी)
==================

रंग बिरंगे देश यहाँ पर
अलग -अलग सी भाषा है,
अलग-अलग है रंग रूप
पर एक ही परिभाषा है।

रीति रिवाज संस्कृति का
अगता अद्भुत मेला है,
सभी त्योहार दिलों में बसतें है
सभी रूप अलबेला है।

हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई
मिल-जुल कर हमें रहना है,
इसकी रक्षा की खातिर
कुछ भी कर गुजरना है।

आओ मिलकर करें संकल्प
मिल-जुल करके रहेंगे अब,
आंच न आने देंगे इस पर
इसकी रक्षा करेंगे सब..!!!!

===================
टिप्पणी- ईश्वर प्रदत दुनियां बहुत खूबसूरत है।विभिन्नताओं के होते हुए भी इसकी कला ,संस्कृति रीति रिवाज मन को मोह लेतें हैं इन सभी धरोहरों की रक्षा के साथ साथ पृथ्वीकी रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है।




कुसुम शर्मा 
~इंसानियत भूल गया इंसान~
---------------------


छा रहा संसार में
आतंक का ज़ोर है ।
चारों ओर
त्राहि त्राहि का शोर है !
मानवता क्यो
भूल गया इंसान
उसके सर चढ़ा
जानवर का
क्या ख़ून है !

जो खेलते थे कभी
रंगो की होली
वही खेल रहे अब
ख़ूनों की होली
क्यो आपस मे
बड़ा ये बैर है
किसने चलाया
ये खेल है

कोई कहता है
हम हिन्दू
कोई कहता
मुस्लबान है
कोई सिख तो
कोई ईसाई
सभी लड़ रहे
धर्म के नाम पर
क्या बचा
यहाँ पर इन्सान है

कोई मज़हब या धर्म
नही सीखाता
आपस मे बैर रखना

छोड कर राह नफरत की
प्रेम से जीना सीख लो
ये धरती है हमारी
इसे प्रेम से सींच लो
जाति धर्म को छोड कर
इंसान होना सीख लो !!

टिप्पणी :- आजकल धर्म के नाम पर अतंक सारे संसार मे छाया हुआ है एक इन्सान दूसरे इन्सान को मार रहा है जैसे वह इंसान नही कोई जानवर हो । वह आपस मे धर्म के नाम पर लड़ते रहते है कोई भी धर्म हमे नफरत करवाना नही सिखाता न ही वह कहता है कि एक दूसरे को मारो ! ये संसार हमारा घर है इसे हमे प्रेम से सजाना चाहिए, हम किस जाति या धर्म के है यह बाद की बात है सबसे पहले हम इन्सान है इस बात ध्यान रखना चाहिए ।



Madan Mohan Thapliyal शैल
वसुधा औ मानव
************

जब मैं न था माते-
तेरा अकूत भंडार था -
न कोई सीमा न बन्धन -
मात्र विस्तार ही विस्तार था .
झरनों की रंगत -
पक्षियों का कलरव -
फल - फूलों से लदी डालियां -
अद्भुत अपूर्व तेरा श्रृंगार था .
मणि- माणिक , हीरे- जवाहरातों से सुसज्जित -
रंगोली सी सजी धरणी -
रंग- बिरंगी तितलियों की चपलता -
आलौकिक तेरा परिधान था .
वैभव की थी नहीं कमी -
सब कुछ था भरा - भरा -
स्नेह पूरित था सब -
न कहीं किसी का तिरस्कार था .
मैं आया परिभाषित करने -
इस भंडार को-
माया - मोह ने जकड़ा-
जगा दिया अहंकार को.
शक्ल सूरत को लगा पूजने -
दिशा भ्रमित होने लगा -
न मिला विस्तार कोई -
सीमाओं में बाँध के रख दिया अपने आप को .
संत, पैगंबरों को बाँटा -
ऋषि - मुनियों औ अवतारों को बाँटा -
मन्दिर, मस्जिद की दे दुहाई -
उलझा दिया अपने आप को .
तेरी ममता को लगा भूलने -
भौतिक सुविधाओं में लगा झूलने -
निज स्वार्थ को कर पोषित -
छिन्न - भिन्न कर दिया तेरे प्यार को .
कर सुधार भूल अपनी -
छोड़ ए सारा क्रंदन -
लगा माथे पर तिलक माटी का -
रंगोली ली सी सजी, धरा को कर नमन .....

टिप्पणी  - धरती और मनुष्य का जन्म जन्मों का संबन्ध है. भौतिक सुखों की होड़ छोड़कर हमें पृथ्वी के अस्तित्व को क़ायम रखने में मानवता का परिचय देना चाहिए..





कौशल उप्रेती
~लिखना~

दिल में जो आये वो पैगाम लिखना
हमने सहर लिखा.. तुम शाम लिखना

कुछ इस तरह से दिलों के रंज भुला
मेरे हिस्से कि धूप भी अपने नाम लिखना

कलम जमाने से रख के रूबरू
महके जो हर खिजां में वो बाम लिखना

मन को फैला के दुनियाँ से बड़ा
कभी काबा तो कभी चार-धाम लिखना

कौशल इस तरह अपनाना खुद को
दिल कि बात दिल से बे-लगाम लिखना

टिप्पणी : हम सब एक हैं चाहे किसी भी जात धर्म से हैं, धरती सबकी है और सब धरती के... वसुधैव कुटुम्बकम्...




प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ......
~विश्व शांति~

परम धरम श्रुति विदित अहिंसा।
पर निंदा सम अध न गरीसा।। [मानसकार ]

विश्व शांति के लिए हर राष्ट्र को
अहिंसा का सही अर्थ समझना होगा
तन, मन, कर्म, वचन और वाणी से
किसी प्राणी को नुकसान न पहुँचाना होगा
यही तो हमारे संस्कार में समाहित है
'अहिंसा परमो धर्मं' को स्वीकारना होगा
साम्प्रदायिक और असाम्प्रदायिक के तर्क वितर्क से
बहार निकल सर्वधर्म संभाव को अपनाना होगा
राजनीति से नही कूटनीति का उपयोग कर
धर्मनिरपेक्ष शब्द को हमें अपनाना होगा
भारत मे परपरागत सब धर्मो का सम्मान है
यहे हमें मानना और विश्व को सिखाना होगा
'वसुधैव कुटुम्बकम' का देकर सबको विचार
शान्ति और सुरक्षा की अभिवृद्धि का प्रयास करना होगा

टिप्पणी: विश्व शांति और सुरक्षा आज हर राष्ट्र का उत्तरदायित्व है और भारत इसमें प्रमुख भूमिका निभा सकता है।



Ajai Agarwal
Ajai Agarwal धरती माँ का पुनः संस्थापन
=================
स्वप्नाभिलाषी तुम कहो ,
मैं तो यही बस मानती हूँ ,
हाथ तुम हाथों में दे दो ,
कारवां बनना ; नियति है ,
प्यार के दो शब्द बोलो
गाँठ उर की खोल देंगे
ध्येय ; हो कल्याण सबका !
लक्ष्य ,ये लेकर चलेंगे ,
अहिंसा धर्म परम् है
इसी से, मानवता बचेगी
विश्व जीवन ज्योति जागे
सृष्टि को यौवन मिले
हर रंग हर बिम्ब की
सृष्टि को सौगात देदें
आज हम सौगन्ध ये लें
हाथ में ले हाथ सबका ,
छोड़ के धर्मों के पहरे ,
तोड़ के जाती के बन्धन
एक हो धरती को बचाएं
कुछ तुम त्यागो ,कुछ मैं छोडूं
सुविधाओं को कम करें अर
शस्यश्यामल धरती माँ का
हम करें पुनः संस्थापन -
हम करें पुनः संस्थापन

टिप्पणी ---सुविधाओं और लालच के जंजाल से ,हिंसा की जकड़ से ,देश धर्म जाती रंगों के बन्धन से मुक्ति पाएंगे तभी धरती को सजा पाएंगे उसका पुनः संस्थापन कर पाएंगे और इसके लिए केवल दिल में प्यार की आवश्यकता है ---

सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/