Thursday, December 12, 2013

7 दिसम्बर 2013 का चित्र और भाव



Neelima Sharrma
 ~ चाबियाँ" चाबियाँ ~
तब तक कीमती होती हैं
जब तक रहती हैं ताले के इर्द - गिर्द
और बना रहता हैं उनका वजूद और कीमत
जिस दिन ताला जंक से भर जाता हैं
और फिट नही रहती उसकी अपनी ही चाभी
उसके वजूद में
लाख तेल डालने और कोशिशो के बावजूद
तब बनवाई जाती हैं उसके लिय
एक नयी चाभी
जो खोल सके उसके बंद कोषो को

और नयी चाबी के वजूद में आते ही
फेंक दी जाती हैं
पुरानी चाबी एक अनुपयोगी वास्तु की तरह
किसी भी दराज में या कूढ़ेदान में

चाबी एक स्त्रीलिंग वास्तु हैं
उसका हश्र यही होता आया हैं
सदियों से ...................


बालकृष्ण डी ध्यानी 
~ मेरे घर कि कुंजी है ~

ये ही मेरी पूंजी है
ये जो है वो
मेरे घर कि कुंजी है

साथ मेरे ये है
पास मेरे ये है
मेरे घर कि कुंजी है

साथ इसके फेरे है
मेरे परिवार के ये घेरे है
मेरे घर कि कुंजी है

सुख दुःख का बसेरा है
यंही पर मेरा साँझ सवेरा है
मेरे घर कि कुंजी है

आना भी यंहा पर
जाना भी यंहा पर से है
मेरे घर कि कुंजी है

ये तो मेरा सहारा है
अपनो का वो सुखद किनार है
मेरे घर कि कुंजी है

ये ही मेरी पूंजी है
ये जो है वो
मेरे घर कि कुंजी है


Tanu Joshi 
~ताले चाबी की जोड़ी~

अपनी ही किस्मत पर इतराती,
कभी किसी राजमहल की तिजोरी पर,
कभी किसी फकीर की खोली पर,
हर एक का अपना-अपना कीमती,
हर एक का अपना मान, अपना सम्मान,
हैसीयत ना चले, ना चले जात-पात,
हाँ पर जो अपनी चाबी से खुले, वही भरोसेमंद कहलाये....


किरण आर्य 
~पूरक ~

चाबी हर ताले की
होती है अलहदा सी
और
उसके बिना ताला
होता है बिना काम का
जीवन में
दो लोगो का साथ
भी ऐसा ही होता है कुछ
एक के बिना
दूजे का वजूद
हो जाता
कुछ बौना सा तुच्छ
दोनों एक दूजे के
होते है पूरक
प्रतिद्वंदी नहीं
एक दूजे के बिना
है भटकन
राह मिलती है कहाँ
समझ कर इस बात को
देना होगा मान
रिश्ता समय की मांग
या जरुरत नहीं
रिश्ता है प्रेम से
स्निग्ध साथ
स्वार्थ या वासना का
कौर नहीं ....


जगदीश पांडेय
 ~ चाभी विकास के द्वार की ~

अब जाकर मुश्किल से मेरा चित्त शांत
कहीं हो पाया है
अपनें मन की चाभी से संवेदना का द्वार
खुलवाया है

लग रही जंग यहाँ देखो अनखुले कुछ तालों
पर
विकास की चाभी रखनें वालों को सोते हुवे
पाया है

लोहे की हो या पीतल की ,या हो सोनें और
चाँदी की
चाभियों पर हक जमानें हेतु यहाँ लोगों को
लडते पाया है

" चाभी विकास के द्वार की " यहाँ तुच्छ
लोगों नें ही पाया है
कौन सी चाभी किस ताले की है राजनीति
वालों नें समझ न पाया है


कुसुम शर्मा 
~ ऐ चाबी ~

ऐ किसकी जीत कि चाबी है
ऐ भाजपा के हाथ लगेगी
या कांग्रेस के पास टिकेगी
या फिर बसपा, सपा और गोगपा
जैसी पार्टियां मतों में
अपना भाग निभाएगी
ऐ किसकी जीत कि चाबी है

ऐ अन्य दलों और निर्दलियों
के बीच गिरेगी
या फिर लोकमत के हाथ लगेगी
ऐ किसकी जीत कि चाबी है

इस चाबी को देख कर
लगी सभी में होड़
कैसे जीते चाबी को
सभी रहे ये सोच

कैसे मुर्ख बनाये जनता को
कौन सी शराब पिलाये जनता को
कैसे भ्रमायें इस जनता को
सभी में ये ही होड़ मची हैं
चाबी के पीछे दौड़ मची है


Pushpa Tripathi 
~संवेदना है ये मन की~

मन ठेस लगी है दिल की
कोई चीज संचित हुई है
इस कश्मकश सफ़र में
ये वक्त बुरा सही है .... !!

भारी ठण्ड जमी है चाभी
क्या कीमती कोई चुराए
यहाँ तोड़ते सभी दिलों को
'पुष्प 'नफरते ताले लगाये .... !!



कवि बलदाऊ गोस्वामी 
~चाबी~
तुम्हारे सर्वस्व पूँजी का एकमात्र
मै चाबी हूँ।
कहन से गहनत्तर तक,
अर्थपूर्ण बने ताले की
मै चाबी,
एकांत गहरे एकांत में तुमसे दूर।
दरअसल तुम,
अपना कर्त्तव्य भुलते
गलत राह पर चलते,
स्वंम मुझसे हो रहे हो दूर।

देखो:
जरा सीधे चलो
कभी यदि____
मुझे पाना
तो उठा लेना....
क्योंकि,
तुम्हरे प्रत्येक ताला की
खुलना या कि न खुलना
मुझ पर है आधारित।
यदि तुम,
समझते हो तो समझना
मेरी व्यक्त कल्पना,
क्योंकि,
तुम्हारे सर्वस्व पूँजी का एकमात्र
मै चाबी हूँ।


नैनी ग्रोवर 
~काश~
काश एक ऐसी चाबी होती,
खोल देती दिलों पे लगे वो ताले,
जो जात-पात की दीवार पे,
इंसानों ने लगाए हैं ...

काश होती एक ऐसी चाबी,
और खोल पाती वो ऐसे ताले,
जो नफरत की जमीन पर,
धर्म के ठेकेदारों ने लगाए हैं ..

काश होती एक ऐसी चाबी,
जिससे मै खोल पाती वो त़ाला,
जो कुटिल राजनीति के गलियारे पे,
सत्ता के दलालों ने लगाए हैं...

काश होती एक ऐसी चाबी,
और खोल पाती वो ताले,
जो औरत की आज़ादी पर ,
समाज के पेहेरेदारों ने,
डर के दरवाजों पे लगाए हैं

डॉ. सरोज गुप्ता 
~खुल जा सिम-सिम ~

बाखुशी दी चाबी आप को !
दिखाओ न आँखें बाप को !!

बुझी राख में भी है आग !
धुआं न समझो भाप को !!

हार जीत तो होती रहती है !
बीच में छोड़ा क्यों जाप को !!

करें भरोसा वरदान बरसेंगें !
मिटाओ कुर्सी के अभिशाप को !!

देते हैं शुभकामनाएं आप को !
लगा दो झाड़ू सारे पाप को !!

अलका गुप्ता 
~ताली~

सन्मार्ग के हम ...पथिक हों |
प्रेम पथ का सदा विस्तार हो |
हों ..छल कपट से दूर सभी ..
कुंजी..सत्कर्म भी ..साथ हो ||

संस्कार का..न कभी ..भी ह्रास हो |
सम्मान में दूजे के भी ....मान हो |
भ्रष्ट ना कोई भी... यहाँ इंसान हो |
उत्कृष्ट चाभी ..सदा यही.. साथ हो ||

कदमों का ..बढ़ते हुए सब साथ हो |
निज स्वार्थ कर्म का ..परित्याग हो |
सत्कर्म और कर्तव्य में सौभाग्य हो |
मिलाएं हाथ इस ताली का विस्तार हो ||


प्रतिबिम्बबड़थ्वाल 
~कहाँ ताला कहाँ चाबी~

रिश्तो का ताला खोले अपनत्व की चाबी
दोस्ती का ताला खोले विश्वास की चाबी
मोहब्बत का ताला खोले अहसास की चाबी
अंधविश्वास का ताला खोले ज्ञान की चाबी

जीत का ताला खोले हमारी एकता की चाबी
भक्ति का ताला खोले हमारी आस्था की चाबी
धर्ममार्ग का ताला खोले हमारे कर्म की चाबी
किस्मत का ताला खोले हमारे हौसले की चाबी


भगवान सिंह जयाड़ा 
~चाबी तेरे रूप अनेक~

छोटा हो या बड़ा हो ताला ,
कभी न बिन चाबी खुलता ,
लाखो करोड़ों मे भी ताला ,
अपनी चाबी नहीं भूलता ,
शक्ल सूरत में दिखे एक सी ,
पर यह क्या ,कलाकारी है ,
रखे ख्याल अपने का ही ,
यह चाबी की जिम्मेबारी है ,
चाबी बिश्वाश का प्रतीक है,
इस से निर्भयता जगती है ,
इस से सबक लेते है हम सब ,
हम भी बनें बिश्वाश की चाबी ,



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Saturday, December 7, 2013

28 नवम्बर 2013 का चित्र और भाव



जगदीश पांडेय .
कब तक यूँ ही इस तरह सोचते रहोगे तुम
कब तक बेबसी का शिकार बनते रहोगे तुम

कोई नही होगा इस भींड में जो साथ दे तेरा
कब तक मतलबी लोगों से बनते रहोगे तुम

काली परछाई बन कर साथ देंगे सब यहाँ
जब तक जेब से हरे भरे चलते रहोगे तुम

न बन के रह मात्र बूत पत्थर दिलों के संग
कदम बढा दावा है मेरा सम्हलते रहोगे तुम

जीवन के मंच पर कठपुतली न बन "दीश"
हर पल अपनी तकदीर बदलते रहोगे तुम



प्रजापति शेष ...
जो अपने छोड़ जाते है ,
अपनी राहें मोड़ जाते है ,
उन्हें हो ना हो कइयों के
नाजुक दिल तोड़ जाते है ,
अकेले पड़ जाते है शेष
दुनिया की अटपटी होड़ पाते है


किरण आर्य 
भीड़ में दम
तौड रही है जिंदगी
कभी रुसवा कभी तनहा सी
भटकती दौडती
अपने वजूद को तलाशती
एक अंधी दौड़
जो भूर्ण के अस्तित्व में आने
अपने वजूद को पाने की
जद्दोजहद से होती है शुरू
लीक से हटकर
भीड़ से परे
जो मन करता है हिम्मत और
निकालता है राह
कंटको के बीच से
वहीँ पाता है मंजिल
वर्ना तो भटकन
मृगतृष्णा मन की करती विवश
अंधाधुंध दौड़ता मानुष निरंतर
चाह केवल यहीं
पाए वजूद जिंदगी उसकी


बालकृष्ण डी ध्यानी 
बस बढ़ तू

बस सब खड़े थे वो खड़े रह गये मै आगे निकल गया
बढ़ना था मुझे आगे और मै आगे बढ़ गया

खड़े रहने से कुछ नही होना था हासिल अब मुझे
लक्ष्य निर्धारित था मेरा और मेरा वो पग आगे बढ़ गया

रुकना अंत था मेरी उस नयी सोच के लिये
उस सोच को पाने को मै अब आगे बढ़ गया

सब यंहा कुछ ना कुछ सोच और लक्ष्य लिये खड़े हैं
लिकिन उनके पग आत्म विशवास से हारे खड़े हैं

भीड़ है इतनी अंधेर बड़ा घना है अब चहूँ और तेरे
अब वो प्रकाश मिलेगा मुझे मेरे उस एक कदम बढ़ाने के बाद

तो चल ना खड़ा रह इस तरह इस भीड़ का हिस्सा बन तू
बन बस तू अब उस प्रकाश का हिस्सा जो तेरा है

बस सब खड़े थे वो खड़े रह गये मै आगे निकल गया
बढ़ना था मुझे आगे और मै आगे बढ़ गया


प्रजापति शेष ...
अपने आप से भाग कर ,
अनुशासन को त्याग कर
यों पंक्ति भंग कर ,
कौनसा संस्कार शेष
अंगीकृत करने चले हो,
मात्र रंगभेद को जानकर,
श्रेष्ठता हासिल नही होती ,
अपनों के लिए त्याग करो ,
अपनों के त्याग से भला ,
कहीं मंजिल हासिल होती है ,


Pushpa Tripathi 
------- मै सोच भागता रहा ----------

सोच ------ इस संख्या कतार में तू अकेला क्यूँ भागता रहा
जिस्म पत्थरों से खड़े और मन है भागता रहा ।
वक्त तिरछा है सीधा नहीं आसान ये कहना
जो संजोये थे लम्हे सुकून के ----- सुबहो शाम भागता रहा ।
सारा आकाश सिमटा है भीतर जलते दिलों के
सारांश जीवन चलता है स्थिर मन के भागता रहा।
मिलता नहीं चाहकर भी कोई मुकामे सफ़र जिंदगी की
स्वाभाविकता खड़े भीड़ में 'पुष्प ' जिधर भागता रहा ……!!!!


भगवान सिंह जयाड़ा 
सायद मैं गलत लाइन में आ गया हूँ ,
बस निकल लो चुप चाप भ्रमा गया हूँ ,

इन लाइनो में भी धर्म जाति का पंगा है ,
क्यों बक्त खराब करू,होने वाला दंगा है ,

बस विवेक कहता है ,निकलो यहाँ से ,
वापस चलो वहीँ ,हम आये थे जहा से ,

जो कुछ होना था ,सब तय हो गया है ,
यह लाइनों का ढोंग ,दिखावा रहा गया है ,

लाइनों में लग लग ,युवा अब थक गए है ,
रोजगार के अरमा ,आँशुवो में बह गए है ,



नैनी ग्रोवर 
कतार ही कतार है,
बस से लेकर, राशन की,
राशन से लेकर भाषण की,
भाषण से लेकर सत्ता की,
सत्ता से बुद्धिमत्ता की,
कतार ही कतार है.....

महंगाई से लेकर पेट की,
सूखे पड़े बंजर खेत की,
गरीबो की बदहाली की,
बारह रूपए वाली थाली की,
कतार ही कतार है.....

जी चाहता है नियम ये,
सारे ही छोड़ दूँ,
खुशियों का मुंह आज,
झोपड़ों में मोड़ दूँ,
क्यूँ ना आज ऐसा करूँ,
आज ये कतार तोड़ दूँ....


अलका गुप्ता 

तोड़ दूँ ....जग के ..ये बंधन सारे |
नियम कायदे के ...झूठे से पसारे |
भाग जाऊं दूर कहीं ...एक संसार बसाऊं |
निकल कर विवश इन अवगुंठन से सारे ||

हे मन तू भी कुछ अपने मन का कर जाना |
नया सा सुकून मगर ..इस जग को दे जाना ||

तन यह कर्म क्षेत्र है ! जीवन का ...
हे मन !तू अब तो ..दौड़ लगा ले |
कर पार ..प्रगति की बाधाओं को |
मार उन्हें तू दे ..क्यूँ अब संशय पाले ||

हे मन तू भी कुछ अपने मन का कर जाना |
नया सा सुकून मगर ..इस जग को दे जाना ||

नया सा ...कुछ ..कर जाना |
मन में.. सब के ... बस जाना ||
घोर कालिमा तमस रेखाओं से ..दूर
हरा -भरा सा .....संसार एक बसाना ||

हे मन तू भी कुछ अपने मन का कर जाना |
नया सा सुकून मगर ..इस जग को दे जाना ||



Pushpa Tripathi
----- फिर कतारों में अकेला -----

मै अकेला ----- चल गुजर रहा
फिर कतारों में अकेला, गुम
यह ---- भीड़ है दुनियाँ की हरसत
मै दिशाहीन ----- भ्रम में, गुम
रास्ते न रुकते ------चलते रहे मन जिधर
मै भटकता वक्त के पहिये में, गुम
बाध्य नहीं तुम ----- गर समझो मुझको जितना
कम में भी 'पुष्प ' महकते गुच्छों में , गुम …… !!!!


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~रुके कदम~
लोगो के
रुके कदम देखकर
सोचा
मैं निकल चलूँ आगे
सपने जो संजोए है
आगे निकल कर
शायद
पूरा कर पाऊँ उन्हें
नही मालूम था
ये दुनिया वाले
फिर से खींच लेंगे मुझे
अपने जैसा ही बना कर
फिर से कतार में
खड़ा कर देंगे मुझे


सुनीता शर्मा 
ईश्वर की कल्पना की अदभुत नगरी में ,
दिखते इंसानी कलाकार यहाँ अनेकों रूपों में ,
कुछ तन के गोरे हैं पर कुछ मन के काले ,
व्यस्त रहते मग्न जो आपसी फूट में !

जीवन की क्षणभंगुरता को भुलाकर ,
दौड़ रहे हैं कुछ अनैतिकता अपनाकर ,
भीड़ से अलग दिखने के मोह में ,
खुश होते हैं वो अपना जमीर बेचकर !

आज का राजा कल फिर रंक कोई संदेह नहीं ,
कलुषित समाज का पतन फिर दूर नहीं ,
रंजिशों में जीवन नष्ट करता भ्रमित जो फिरे ,
ईश्वर की महिमा इस जगत में खेल नहीं !


जगदीश पांडेय 
न जानें क्यूँ समय से पहले
यहाँ भाग रहा इंसाँन
जरा कर ले अपनी तू पहचान
जरा कर ले अपनी तू पहचान

भाग्य से जादा वक्त से पहले
कुछ न पा सका इंसान
होता समय बडा बलवान
जरा कर ले अपनी तू पहचान

सुख दुख है जीवन का खेला
मोह माया का है इसमें मेला
फस के इसके बंधन में कोई
बन न सका महान
जरा कर ले अपनी तू पहचान

गोरे काले का भेद न करना
इनके संग है जीना मरना
लेकर काया माटी का क्यूँ
तू बन रहा हैवान
जरा कर ले अपनी तू पहचान
" गोरे काले " का तात्पर्य सुख दुख है


कुसुम शर्मा 
जिंदगी, भागती क्यूँ है
अपने ही वेग मे?
अपने ही तेज मे?
रुक,
ना भाग
तू इस तेज मे
कौन दौड पाता है
तेरी वेग मे ?

ज़िंदगी दिए तुने पल कई
बटोरे कई, बिखेरे कई
जोड़ पाए रिश्ते कई
तोड़ आये रिश्ते कई
छोड़ आये मंजीलें कई
छोड़ आये लम्हे कई

हर वक्त का तनाव,
हांफती-भागती जिंदगी की उलझनों में
उलझे है सब
छोड़ उलझनों को
अब तो जी इस ज़िंदगी को

भाग ना तू अब,
दौड ना अपने वेग से,
तू अब ठहर,
थम अब,
कुछ पल के लिए
तेरे दामन से सजे कुछ पल
जी लूँ अब ...
तेरे दिए पलों को जी लू अब

भागती रही तो फिसल जायेगी ,
फिर चाह कर भी हाथ न आएगी !!

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Wednesday, November 27, 2013

20 नवम्बर 2013 का चित्र और भाव




बालकृष्ण डी ध्यानी 
कल कि मुस्कान में

अल्प अल्प
जलकर उन्मुक्त हुआ वो
पल था जो अंधकार में
अब प्रकाशित हुआ है वो
मन का अंधेरा मन के आकाश में

इने-गिने थे वो बिंब मेरे
जब वो अकेले जले और बुझे थे
साथ मिला जब साथ का उन्हें
आज वो अनेका अनेक जले हैं रहा में

किंचित, थोडा कुछ नही है
वो जो पल मिला था हमे आज में
सब तो वंही था सब वंही हैं अब
जब साथ दिया मैंने और आपने

चन्द पल में जल जाना है
वस्तु सा खुद को नही सजाना है
कुछ थोडा नियत मिला है
व्यर्थ ही उसे ना फिजूल गवाना है

मोम बन पिघल हम गये
कल हम रोशनी बस तेरे नाम में
कल कोई हमे याद करे ना करे
हम मिलेंगे उस कल कि मुस्कान में … ३



जगदीश पांडेय
देखो प्रेम की ज्योति जली है
सखी तुम्हारे मिलनें से
सखी तुम्हारे मिलनें से
प्रेम पंखुडी खिलनें से
आज जमीं पे मेरे पाँव नही
लबों के तुम्हारे हिलनें से
देखो प्रेम की ज्योति जली है
सखी तुम्हारे मिलनें से

छोड न देना तुम साथ प्रिये
बीत न जाये कहीं रात प्रिये
दिल रोशन हुवा तुमसे सखी
आज जुदाई की शाम ढलनें से
देखो प्रेम की ज्योति जली है
सखी तुम्हारे मिलनें से

इस जहाँ को हम पाठ पढाएँ
सब को प्रेम भाव सिखलाएँ
घबरा न जाना सखी कहीं तुम
मुसिबतों के न हिलनें से
देखो प्रेम की ज्योति जली है
सखी तुम्हारे मिलनें से



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
एक लौ बनकर ....

तुम जलो मैं जलू
आओ रोशन दुनिया करे

ये आग तेरे मेरे मन की
आओ जला दे रोशनी बनकर

अँधेरा मन का दूर करे
आओ जल उठे प्रेम बाती बनकर

हौसले विश्वास संग 'प्रतिबिंब'
आओ जल उठे अब एक लौ बनकर



अलका गुप्ता 
आओ ! मिलकर सब ज्योति से ज्योति प्रज्वलित कराएँ |
द्वंद सारे ..अंतर्मन के..समिधा सी वलिवेदी पर चढाएँ ||

भूलकर वैमनष्य भाव सारे ..परस्पर प्रेम ज्योति जलाएँ |
बाँट कर सब ओर उजाला मोम सा बेशक हम पिघल जाएँ ||

दूर धरा से अंधकार ये ..अज्ञान सारा डटकर दूर भगाएँ |
आलोकित कर मानवता को नया सा इतिहास लिख जाएँ ||



नैनी ग्रोवर ----
किसी की राहों से, कभी अन्धेरा मिटा के देखो,
कभी एक लौ से, दूसरी लौ तो जला के देखो..

मिलता है कितना सुकूं, ठिठुरती सर्द रातों में,
हमारे तपते हाथों से, हाथ मिला के तो देखो...

यूँ दूर वहाँ से, क्या पूछते हो हाल हमारा आप,
खुद चले आओ, या हमको बुला के तो देखो....

मिल जायेंगी सारी ही खुशियाँ, ज़माने भर की,
किसी बच्चे को पालने में कभी, झुला के तो देखो../


नैनी ग्रोवर 2
ये लौ जली है प्रीत की,
प्रेम के संग, रीत की,
लगती है मेरे मन के जैसी,
ज्यूँ बाट हैं तकती मीत की ....

संग_संग जागे मेरे सारी रात,
चुप_चुप जले, ना करे कोई बात,
उम्मीदों का धागा जलता जाता,
जैसे धुन हो किसी बिरह के गीत की....

मिटा के स्वयं को भी, अँधेरे से लडती है,
हमारे मन में कल की आस ये गड़ती है,
मिलता है सहारा, जब आँख इसपे पड़ती है,

निशानी लगती है, कल आने वाली जीत की ....


भगवान सिंह जयाड़ा 
एक दूजी लौ से लौ जब जलेगी ,
निश्चित यह एक ज्वाला बनेंगी ,
तब दुगना बढ़ेगा इस का प्रकाश ,
जागेगा मन में पक्का बिश्वास ,
दूर हटेगा नफरत का अन्धकार ,
जागेगा सब के दिलों में प्यार ,
बस प्रीत रुपी लौ बुझने मत दो ,
यूँ जोत से जोत सदा जलने दो ,
फैले जगत में एक ऐसा प्रकाश ,
कभी न बुझे,बने जीवन की आश ,
एक दूजी लौ से लौ जब जलेगी ,
निश्चित यह एक ज्वाला बनेंगी


सुनीता पुष्पराज पान्डेय
दीप जलाया मन मे मैने तुम्हारे प्यार का ,
दीप जला आस्था और विश्रास का ,
कुल दीपक बन दोनो चमके ,
दीप जलाती हुँ भगवन के चरणो मे अरदास का ,
दीप जले मेरे घर आँगन मे फैले उजियारा हर ओर,
दीये जलाउं इतने मिट जाये अधियारा सारे जग का ।


Pushpa Tripathi ____ मन के भीतर लौ जला लो ____

लौ जला लो ----- मन के भीतर
अंधकार और मिटे अज्ञान
प्रज्वल प्रकाश कई किरणों से
क्रमशः .. क्रमशः .. भीतर ज्ञान l

मोम की बाती ....... पिघले तन मन
ज्योति कण कण --- सारा आकाश
ज्ञान ही जीवन ----- ज्ञान ही मोती
है ये जीवन --- सब मोम समान l

अगर मगर की बात न पूछो
गलती अपनी खुद ही जानो
मिल जायेगा सूक्ष्म में बिंदु
जग को 'पुष्प ' तुम --- खोज निकालो l



सूर्यदीप अंकित त्रिपाठी 
दीपहुँ दीप जराओ साधो,
तम जग दूर सिधाओ ....
प्रीतहुँ रीत सु-गीत सुनावो,
पग-पग मीत बिठाओ .....
रे मन तिसना, मन घर बसना,
किस विधि ठौर निकारूँ ,
ये आपन, निज दूजो साधन,
सूत महीन निखारूँ !! "सूर्यदीप"

किरण आर्य 
एक लौ प्रीत की मन में जगी
जिंदगी है तेरे प्रेम से सजी
दिल में प्रेम के दीप है जले
नैनों में इन्द्रधनुषी स्वप्न पले
तुम साथ हो जो मेरे सजना
रूह है संवरे महके मन अंगना
तुम दूर रहो या समीप मेरे
मन रहे रंगा एहसासों से तेरे

किरण आर्य 
अँधेरा मन का जब है डराता मुझे
तब ईष्ट का मन है ध्यान करे
एक लौ विश्वास की मन में जले
जो मन के अंधेरों को है दूर करे
ईष्ट मेरे मन मंदिर में है बसे
लौ जो है जले तम को है हरे
तम जो है अंधियारा करे
वो लुप्त हो मन रोशन करे
एक लौ जो मन ज्योति जले
ईष्ट के मनन से रूह रोशन करे

अर्थात - दीप से दीप प्रज्ज्वल कर इस जग से अन्धकार का नाश किया जा सकता है। मीठी वाणी से, प्रेम भरे सम्बोधन से, त्याग से, हर जगह आपके मित्र बन सकते हैं। लेकिन मन की इस वासना, तृष्णा का मैं क्या करूं जो मेरे मन में अपना घर बना चुकी है, उसे उसके ही घर से किस प्रकार निकालूँ , जो ये समझती है कि ये भी मेरा है और दूसरों के संसाधन भी मेरे ही हैं और उनका संग्रहण एक पतले से धागे (अज्ञान) से बनी पोटली में करती जा रही है. (सूर्यदीप अंकित त्रिपाठी) २५ नवंवर २०१३।

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Wednesday, November 20, 2013

14 नवम्बर 2013 का चित्र और भाव



जगदीश पांडेय 
क्यूँ छेंड दिये बीते वक्त के तार
कि यादें कंपन्न हजार करनें लगे
एक उम्र बीती है भुलानें में तुम्हें
क्यूँ साँसों में मेरे फिर से बजनें लगे

नासमझ थे वो मेरे झंकृत मन से
सुना दो धुन आज वो कहनें लगे
निकला जो सुर बाद जुदाई के आज
मोती आँखो से अश्कों के बहनें लगे
क्यूँ छेंड दिये बीते वक्त के तार
कि यादें कंपन्न हजार करनें लगे

Pushpa Tripathi
 - सुर सुनहरे बन पड़े .......

धुन सुन मन से जो निकली
आवाज बन गई सुर ध्वनि
कितने रंगों में 'पुष्प '
बन गई गीत नई .......
तार तार बज पड़े
खिल उठी आवाजे मेरी
ह्रदय की सजी प्रेम बेला में
प्रियतम सरगम सुर बजे ……
पुकारती यादों का मिलन
साँझ सकारे चल पड़े
हर युग में संगम हो अपना
संगीत मधुरतम बन पड़े …!!!


नैनी ग्रोवर 
शाम ढले, जब मैं बैठूं, खोल दरीचे,
ना जाने कौन दूर से, मन को खींचे,
ह्रदय से निकलती है, किसकी पुकार,

डूब रहा क्षितिज में, सुनहरी सूरज,
गूँज रहे सृष्टि में, बांसुरी के स्वर,
बज रही है पाँव में पायल की झंकार,

ये नीर भरी नदिया, जैसे इठलाती है,
सृष्टि ही संग इसके, गुनगुनाती है,
छा जाती है तब, मेरे मन में भी बहार... !!


बालकृष्ण डी ध्यानी 
सरगम

धुन बनी है वो
गीत तेरे नाम का
स्वर लहरी धूम कि
मन के उस सोच कि
धुन बनी है वो.................................

विस्तार हुआ है वो
दस्तक दी है दिल के द्वार पर
सात सुरों का पैमाना
छलके मन के मीनार पर
धुन बनी है वो.................................

कौंदी थी वो अचानक
सरगम कि उस तार पर
दो शब्द उभरे उभरे मेरे
मापक बन उस सितार पर
धुन बनी है वो.................................

धुन बनी है वो
गीत तेरे नाम का
स्वर लहरी धूम कि
मन के उस सोच कि
धुन बनी है वो.................................


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
....अपना सा संसार----
गूंजते रहे गीत व् संगीत के स्वर
बहती रहे हर सुर से प्रेम बयार
छू ले अंतर्मन को सुरों की झंकार
महकते रहे रिश्तो के बोल मधुर
सौहार्द का संगीत अब जाए निखर
देश भक्ति का भाव बन जाए डगर
'प्रतिबिम्ब' गा रहा जिंदगी का सफ़र
मिला लो सुर, अपना सा होगा संसार


Pushpa Tripathi 
…… पुष्प तराने बन गए ……

न जाने कितने रंगों में
गीत सुहाने बन गए
भोर की मधुर किरणों में
जीवन तराने बन गए l

गुजरा समय यादों के झरोखे
स्वप्न सुनहरे शाम तले
मीठी बातों में सुर लहरी
जीवन घर घर में गूंज रहे l

नाचे है धरती और गगन
'पुष्प ' की बगिया में फूल नए
महकी सांसे घुलती यादें
धुन .... धुन मिल गुन, गीत नए l


सुनीता पुष्पराज पान्डेय 
छेड़ी जो तूने प्रेम की सरगम पिया
गा उठा फिर मेरा बावरा मन पिया
तुम मेरे सुर मै तेरी आवाज पिया
तू मेरी वीणा मै तेरी झंकार पिया
तू मेरी नैया मै तेरी पतवार पिया
तू मेरा जीवन मै तेरा संगीत पिया
तू मेरा माली मै तेरे बागोँ की कोयल पिया


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Thursday, November 14, 2013

7 नवम्बर 2013 का चित्र और भाव




नैनी ग्रोवर 
वो पुरानी कॉपी के खाली पन्ने,
जिसमें बस रखती थी मैं तुम्हारी यादें,
ना जाने कहाँ खो गयीं,

समय जाने कहा बहा ले गया,
वो मोर पंख, वो सूखे हुए गुलाब,
ना जाने कितने सुहाने पल बेहिसाब,
बस एक कोरा कागज़ बो गयीं...
वो यादें ना जाने कहाँ खो गयीं...

वो सुबह के सूरज में तेरा चेहरा,
बंदिशों में भी खिलता चाँद का सेहरा,
डर-डर कर भी मुस्कुराती हुई आँखें,
आज भरी बरसात की तरह रो गयीं....
वो यादें ना जाने कहाँ खो गयीं ....



बालकृष्ण डी ध्यानी 
वो मेरी खुली किताब

वो मेरी खुली किताब
पन्ना पन्ना उसका बिलकुल साफ़
पुरानी है वो मेरी कहानी है वो
उसमे दबे हैं मेरे सारे अहसास

वो मेरी खुली किताब
पन्ना पन्ना उसका बिलकुल साफ़......

गीत है कभी वो कभी गजल है
कविता और कहानी सा उसका स्वभाव
हर अर्क में छपी है वो
छपी है मगर वो कुछ ना लिखी है वो

वो मेरी खुली किताब
पन्ना पन्ना उसका बिलकुल साफ़......

उसमे बिता पल मेरा रूठा है
मेरी साँस का हिस्सा छूटा है
कलम मेरी जिंदगी की बड़ी थी उसमे
चली थी मगर वो पर सब कुछ धुला धुला सा

वो मेरी खुली किताब
पन्ना पन्ना उसका बिलकुल साफ़......

कर रही है वो किसी कफ़न आराम
सुर्ख सूखे पत्तों का वो लेकर साथ
ता उम्र उसने साथ दिया था मेरा
अफ़सोस वो रह गयी बस बिलकुल साफ़

वो मेरी खुली किताब
पन्ना पन्ना उसका बिलकुल साफ़......

वो मेरी खुली किताब
पन्ना पन्ना उसका बिलकुल साफ़
पुरानी है वो मेरी कहानी है वो
उसमे दबे हैं मेरे सारे अहसास



सूर्यदीप अंकित त्रिपाठी 
कुछ पन्ने इस डायरी के खाली रखे हैं ...
शायद कभी तुम लौट कर आओ ...
और कुछ कहो…
तो मैं तुम्हारे लफ़्ज़ों को पिरोकर
एक गीत लिख सकूं .... कुछ कह सकूं ...

ठहर सी गई है ज़िंदगी और
हो गई है इन कोरे कागज़ों सी ...
रूखी, बेज़ान .... बेरंग ..
तुम थे तो कुछ रंग बिखरे थे ...
तुम थे तो कुछ चेहरे भी निखरे थे ...
तुम नहीं .. तो लफ्ज़ नहीं ..
गीत नहीं ...रंग नहीं ....
और मैं ... मैं भी नहीं रहा ....
बदल गया, बिखर गया और रह गया ...
इन कोरे कागज़ों सा



कवि बलदाऊ गोस्वामी
काल के वितान में निरापद
मै खाली किताब हूँ।
लिखने वाले लिखें
पन्नों पर मेरे,
अटूट इतिहास की ऋंखला।

आने वाले तुम्हारे वंशज
समझ सकें युग के
निर्दय तलवार का,
कट्टरता,क्रुरता,अन्याय के
प्रहार की गाथा।
हे आदिकवि के वंशज!
लिख दो
कराह रही धरती की पुकार।
शायद कल जो आये
समझ सके दर्द भरी वेदना।
और तब सृजन करे,
मानव इकाई की मंगलमय व्यापक्ता



भगवान सिंह जयाड़ा 
मेरी जिन्दगी की किताब के
कुछ पन्ने यूं खाली रह गए
कुछ बदली जिन्दगी ऐसे यहाँ
जिन्दगी के हर गम सह गए,

जिन्दगी एक खुली किताब हो
खाली पन्नों का गम ना करो
भर जायेंगे सब बक्त के साथ
मन में यूं सच्चा बिश्वाश भरो ,

संयोज कर रखे है अभी भी
खाली पन्ने इस किताब के
सायद वो हशीन लहमे फिर
मुड़ कर आएं मेरी जिन्दगी के ,

जिन्दगी की किताब के हर पन्ने
स्याह अक्षरों से तब मैं सजा दूंगा
न रहे कोई पन्ना खाली किताब का
जीवन की इबादत इस में लिख दूंगा ,

हर एक इबादत होगी खुशियों भरी
जिंदगी यूँ खुशियों भरी बना दूंगा
जिस को पढ़ कर खुश हों जाएं सभी
मैं हर पन्ने को इस तरह सजा दूंगा,

जिन्दगी की किताब का कोई पन्ना
कभी भी खाली न रह पाये किसी का
हर पन्ने पर लिखीं हो ऐसी इबादत
जिसे पढ़ ,मन खुश हो हर किसी का ,


जगदीश पांडेय
मैँ एक अमिट कहानी हूँ
कह रही खुद की जुबानी हूँ
इतिहास के पन्नों में लिखी
वीरों के लहू की रवानी हूँ

न पढनें वाले न समझनें वाले
न जानें कहाँ सब सो गये
गुमनाम हो गई गरिमा अब
शब्द अपनें में सब खो गये

चाह कर कोई न पढ पायेगा
पापियों के हाँथ न छुवा जायेगा
अच्छा हुवा मिट गई अपनें आप
बचा ली लगनें से एक शाप

अगर मुझे लिखना चाहते हो
अगर मुझे पढना चाहते हो
तो रोक लो खुद को मलिन होनें से
अपनें वंश अपनें देश को कुलिन होनें से

मन से अपनें तुम छल कपट त्याग दो
चमन के संगीत में अमन का राग दो
अन्यथा मुझे तुम यूं रिक्त ही रहनें दो
रिक्तता का अभिशाप अब सहनें दो

मंजूर होगा मुझे यह सुनना अब
मैं बिन लिखा पन्ना हूँ
मैं बिन लिखा पन्ना हूँ
मैं बिन लिखा पन्ना हूँ



सुनीता पुष्पराज पान्डेय 
जब होश संभाला था
तब से हुई तुम संग यारी
कहाँ सबको भाई प्रीत हमारी
जो भाव न समा पा हृदय मे
सब तुम मे उडेल दिये, सखी
तुम थी मेरी ऐसी हमजोली
सब कुछ चुप -चाप सुना,
जब जी चाहा पलटे पन्ने
बीते पल्लो को दोहरा लिया
जब भी रोना आया सखी
आयी तुमसे बाँते चार कही ,



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~तेरे मेरे अहसास ~

लिखने लगता हूँ जब कुछ
हाँ तुम्हारे लिए ही
दिल बहुत कुछ कहना चाहता है
लेकिन शून्य हो जाता मस्तिष्क
रुक जाती है वो उठी कलम
दिल में अहसास रूबरू होने लगते है
हर पल तब खास लगने लगते है
जी उठता है हर पल तुम संग
अब तुम ही कहो कैसे लिखूं
उन पलो से कैसे में
खुद को दूर कर लूं
कैसे कलम अपनी चलाऊँ

देखो न, आज फिर
ये पन्ना खाली रह गया
तेरे मेरे अहसास
आज फिर
इन सफ़ेद पन्नो पर
नही उतर पाए क्योंकि
ये पवित्र है ये सत्य है
लिखना चाहूं भी तो
इन पन्नो पर वे दिख नही सकते


अलका गुप्ता 
अन्तः करण कि आवाज थी ...कहाँ ?
कभी ...आत्मा कि अनसुलझी पुकार ||

नित नए... अवसाद समेटे हुए ....
या कभी....विवादित से हुए वो छार ||

डायरी में रहे क्यूँ शेष ये कोरे पन्ने |
सिकुड़े से कुछ गुंजले पीले से कोर ||

थी... क्या व्यथा ...ऐसी ...जो ..
उभर ना सके थे शब्दों के अभिसार ||

मिल न सके ...क्यूँ ....स्मृतियों के ...
बेचैन से लिखित ...........कोई छोर ||

आज जो रुक गए आकर ..आवक ...
कोरे पन्नो पे पलटते अँगुलियों के पोर ||

उकसा रहा मन विकल कोरे इन पन्नों से |
कोरे रह जाने के अनसुलझे से तार ||

आंदोलित करते रहे पुरानी डायरी के ...
अनलिखे...... ये .....शब्द सार ||

या आवाक है हटात ...व्यर्थ रहा ..
जीवन यूँ ही रहा ....कोरा सा ... सार ||



Pushpa Tripathi 
ये वक्त के गुमनाम खाली पन्ने

जब ---- डायरी भर जाती है … ख्यालों से
तब ----- कुछ पन्ने शेष नहीं रहते
सब ----- बातें मन की उतर आती है पन्नों पे
कब ---- रहता है काबू ये अल्प शब्दों मे
और ----- मन भी बिछ जाती है कागज के टुकड़ों पे l
पर ..........
जब कभी तुम रूठे
टूटे सब बिखरे नजर आये
ये वक्त के हाथों
पन्ने - पन्ने अधूरे नजर आये
सूखी स्याही में कुछ भी नहीं बचा
बस ....... खारे पानी ही पानी नजर आये
ये डायरी भी कमाल की
सब खाली खाली बिखरी
बेजान नजर आये
ओह्ह …… ये वक्त के खाली बेनाज पन्ने
अब -------- तो यह दिल की बात नहीं सुनता l


किरण आर्य
मन की किताब का
हर पन्ना रंगा
तेरे ही एहसासों से
तेरे साथ की खुशबू
महकाए हर पन्ने को
तुझसे अलग जब
देखने बैठी
दिल की किताब को
हर पन्ना उसका रीता
कोरा सा नज़र आया
तेरे ना होने के
एहसास से ही
ये दिल है घबराया
दिल में प्रीत का एहसास
और है गहराया
और दिल को हमने अपने
फिर ये समझाया
तुम दूर सही
फिर भी दिल के पास हो
हमदम मेरे
हर पल में बसे
खुशनुमा से एहसास हो


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Thursday, November 7, 2013

27 अक्टूबर 2013 का चित्र और भाव




नैनी ग्रोवर 
ये सुबह की सुनहरी किरणें,
धरती को सजाती हैं,
कण-कण में उजाला भरती हुईं,
ठंडी पवन संग, लहराती हैं..

अलसाई अँखियाँ नींद भरी,
इसे देख कर मदभरी हो जाती हैं,
पनघट पर सब सखियों की,
हंसी बड़ी ही सुहाती है ...

ले काँधे पे हल निकले,
किसान जब अपने घर से,
संग संग उनके चलती जातीं,
ज्यूँ राह उन्हें दिखातीं हैं...

छोटे-छोटे मासूम बच्चे,
लिए हाथ में बस्ता, तख्ती,
आने वाले भविष्य हमारे,
जब स्कूल को जाते हैं,
हर ह्रदय को पुलकित करतीं,
आस नयी एक बंधाती हैं... !!


सुनीता पुष्पराज पान्डेय 
पेड़ो की ओट से
छन कर आती हुयी भोर की किरणे
लगती है रुपसी ने सोने के गहनो से श्रंगार किया हो ,
चमक के आगे आँखे चकाचौँध सी हो जाती है,
देख कर मन प्रफुलित हो जाता है ,
सुबह की पहली किरण को क्या शब्दो मे बाँधा जा सकता है


कवि बलदाऊ गोस्वामी 
प्रभात फूटा
निशा छटा
दिशाओं की कपोलों पर रवि रशिम
छा गयी;
और पत्तों की झुरमुट से आकर
धरती को उष्णता देने लगी|
मानो एक पुरुष-सा
वह रवि!
जिसकी प्रत्येक रशिमें धरा को
उपजाऊपन बनाती,
अनूअर_____
धरती पर आ रही|
आज मुझे मिल गया
वह प्रकाश,
जिसके प्रकाश में
खेलता-खाता है जग सारा|


बालकृष्ण डी ध्यानी 
वो प्रभात मेरा

चली आ रही है
पूर्व से किरण एक
मन आगन के
अंधकार को करने दूर

प्रकाशित करेगा
वो तन मन अब मेरा
प्रातःकाल का वो सूरज मेरा
अब गड़ेगा वो गहना

शुरू कर दिया है उसने
अब झलक अपना दिखाना
आरंभ में ही अस्र्णोदय जी
अब गाने लगे वो तराना

नाच उठे पक्षी गगन और भोर
चहक ने लगी सृष्टी चाहों ओर
मेरे देश का सबेरा उस दिन आयेगा
एक भी जीव जिस दिन भूख ना सोयेगा

चली आ रही है
पूर्व से किरण एक


ममता जोशी 
ये धरती प्रभु ने कितनी सुन्दर बनायीं
कहीं फूलों को खिलाया ,कहीं इन्द्रधनुष से सजाई,

नदी ,झरने ,पहाड़ जंतु ,वनस्पति अपार,
चाँद की शीतल चांदनी ये सब प्रभु के उपहार.

घने पेड़ो से छन छन कर सुबह जब धूप आती है,
तब इनायत उस प्रभु की मुझ तक पहुँच जाती है ,..


भगवान सिंह जयाड़ा 
स्वर्णिम किरणों के संग आई नई भोर ,
एक मनमोहक लालिमा छाये चहुँ ओर ,

नए दिन की नई उमंग यह संग है लाई ,
नया उत्साह नई ऊर्जा हर प्राणी में आई ,

मंद मंद उष्णता से धरती को महकाए ,
पक्षियों के कलरव से दिशाएं चहकाए ,

अंगड़ाती कलियों के संग भौरे मंडराते ,
मधुर गुंजन से अपने गीत प्यार के गाते,

भोर की किरणें हम को कुछ सिखती हैं ,
नयें दिन में नयें सृजन की राह दिखाती है ,

कुदरत के यह निजाम भी कितने न्यारे ,
कभी न भूलें आना यह सूरज चाँद सितारे , ,

स्वर्णिम किरणों के संग आई नई भोर ,

जगदीश पांडेय 
निकल आई रवि किरणें माँग उषा की
भरनें को
अपनें तेज स्वरूप से देखो तम निशा की
हरनें को
आसमाँ भी पुलकित हो रहा देख अद्भुत
संगम को
वसुंधरा भी शर्म से लाल हुई देख पुलकित
हमदम को
छुप के दरख्त से झाँक रही सूरज की लाली
चली बयार ठंडी झूम रही खेतों की बाली
काश बदल जाये फिजा ये आब-ओ-हवा
हिन्द का दिन और ये रात काली काली


किरण आर्य 
भोर की एक
अलसाई किरण
पेड़ो के झुरमुट
में से झांकती
कह रही सुप्रभात
आया नया सवेरा
लेकर सुनहरा उजास
भर लो दामन में
खुशियाँ
ओस के कण सी
जो है बिखरी
नर्म घास पर
देखो उम्मीद
हो रही है रोशन
जैसे दमकती
सूर्यकिरण ..........

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Saturday, October 26, 2013

17 अक्टूबर का चित्र और भाव




बालकृष्ण डी ध्यानी 
इंद्रधनुष और पहाड़

आसमान में छटा बिखेरते
इंद्रधनुष पहाड़ों से क्या कहते

रंगों की ये बारिश है अब
हरियाली जब तक सबित है अब

नीले रंग को ओढा दिया है
थोड़े समय जो पहले भीग गया है

चमक उठा वो सूरज की रोशनी में
अनंत भी लुप्त है अब उस मस्ती में

बैठ अब मस्तक पे तेरे
सात सुरों से मै लहलहा हूँ जैसे

चित्र उभरकर ऐसा आया
हर एक उसे अब देखने आया

आसमान में छटा बिखेरते
इंद्रधनुष पहाड़ों से क्या कहते


नैनी ग्रोवर 
वो दूर पहाड़ों के पीछे से झांकता
सतरंगी इन्द्रधनुष,
सृष्टि को अति सुन्दर बनाता,
सतरंगी इन्द्र्धस्नुष,

याद आती है इसे देख कर,
किसी अल्हड सी यौवना की चुनरी,
महका जाती है ख्यालों को,
जैसे दूर बजती,कान्हा की बांसुरी,
संग संग गुनगुनाता मुस्कुराता,
सतरंगी इन्द्रधनुष..

देख कर इसे जाग जाती है,
मन में नयी आशा,
समझ में आने लगी इसे देख कर,
प्रेम की नयी भाषा,
आँखों में ठहर कर निहारता,
सतरंगी इन्द्रधनुष....... !!

कवि बलदाऊ 
गोस्वामी वह इन्द्रधनुष,
अंधकार और धुंधलेपन के अंत में
खिलता
सदा दृश्य को होता,
सतरंगी______
खिल उठा है पहाड़ के ऊपर।
धरती और आकाश के बीच
पुल-सा
धनुषाकार,योध्दा कि तरह___
जीवन की रंगीन संदेश समेटे
दूर और अपरिचित किन्तु,
करीब वह इन्द्रधनुष
खिल उठा है पहाड़ के उपर।

परत-दर-परत अपने गर्त में
छुपाया है रहस्य_____
जीवन में बदले रंगों का,चेत और
अचेत का,
व्यक्त और अव्यक्त कल्पनाओं-सी
चलो,
लिखें अब एक कविता
इन्द्रधनुष पर
और इसके गहन रहस्यों को
जरा-जरा सा समझें।


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~ मन का इंद्रधनुष ~
रवि रशिम ने रंगों को नभ पर उकेरा है
रंगों का घूँघट प्रकृति ने यूं ओढ़ लिया है
रत्नजडित आभूषण सा आसमा पर छाया है
सतरंगी इंद्रधनुष नील गगन में उभर आया है

इंद्रधनुष की झंकार प्रियतम को बुला रही
बरखा बूदो संग प्रेम दिल में उतर आया है
आकर्षण दुल्हन सा नयनो में समा लिया है
रंग प्रेम का देखो तन - मन में उतर आया है


कुसुम शर्मा
बरखा आई बरखा आई
साथ अपने इंद्रधनुष भी लाई
आसमान में रंगों का ये कैसा प्रतिबिंब
बाहरी हिस्से में लाल, भीतरी हिस्से में बैंगनी रंग
कभी-कभी इंद्रधनुष के पीछे आते दूसरे रंग
लाल-बैगनी के अलावा नारंगी, पीला, हरा, नीला और इंडिगो।

इन रंगों में राज छुपा है सात अंक का महत्व छुपा है
एक सप्ताह के भी होते सात दिन
सूर्य के रथ के सात है घोड़े
सात दिनों में संसार की रचना जिसकी होती सात परिक्रमा
सात गुण है, सात पाप है,सात उपकार है, सात तंत्र-मंत्र है और सात ही ताल
जीवन की भी सात क्रियाएँ , स्नान के भी सात प्रकार, सात लोक है , सात पदार्थों ,
माता, पिता, गुरु, ईश्वर, सूर्य, अग्नि व अतिथि इन सातो का अभिवादन
जीवो के शरीर में सात धातुओ का है संग
अयोध्या, मथुरा,हरिद्वार, काशी, कांचीपुरम, अवन्तिका ,द्वारिका
सात पवित्रतम पुरियों की संज्ञा
आकाश में सप्तर्षि मण्डल नज़र जो आते
वे सप्तर्षि ब्रह्मा के मानस पुत्र कहलाते
सात जन्म है, सात वचन है,सात ही फेरे
सात स्वर है, सात लोक है, सात ही नदियाँ
सात महाद्वीप है, सात नृत्य है
इंद्रधनुष में भी देखे हमने सात रंग !!



भगवान सिंह जयाड़ा 
बादलों के झुरमुटों से झांकती ,
बारिष की बूंदों से नहलाई सी ,
सूरज की वह स्वर्णिम आभा
चंद किरणों का वह झुरमुट सा ,
धरती की सुन्दर हरियाली पर ,
बिखेरती अपनी निर्मल आभा ,
दूर छितिज में वह इन्द्रधनुष ,
दिखे आँखों को कितना प्यारा ,
प्रकृति ने किया हो जैसे सृंगार ,
सप्त रंगों के संग ओढ़े हुए बहार ,
मन की कल्पना को करे साकार ,
देख कुदरत का यूँ अनोखा आकार,


अलका गुप्ता 
नील गगन हे ! सावधान |
साध ये ..सतरंगी कमान |
आया है... कौन काज ...
अनंग ले ...ये काम वान ||

शाख शजर के डेरा डाल |
मन करे..घायल बेहाल |
हरी हरियाली पाँखों बीच ..
ओढ़े बैठा सतरंगी शाल ||

मौसम ये भीगा-भीगा आया |
काले-काले...बदरा लाया |
वावली हुईं यादें सांवरिया की ..
मन व्याकुल मिलन को भरमाया ||

नई नवेली वधु सी मैं शरमाऊं |
सोंच-सोंच कर..मैं घबराऊं |
कारन जिसके अब तक जली मैं
इस सावन यूँ ही ना मर जाऊं ||


जगदीश पांडेय 
देखो चल दिया ये जहाँ तेरी खातिर छोड
मेरे आखिरी वक्त में ना ऐसे तू मुँह मोड
दीप जला तेरी यादों के गुजारा दिन मैनें
लाया चूडियाँ सतरंगी ख्वाबों को मैं जोड

भूल गई वादियाँ हरी भरी बरखा की बूँदे
किया था वादा लाउंगी इंद्रधनुष मैं तोड
नहीं कोई तेरे सिवा दिया क्यूँ दिल तोड
तेरे चाहनें वालों में मची है अब तो होड

न चुरा तू आँखें अब शरमाना मुझसे छोड
मेरे आखिरी वक्त में ना ऐसे तू मुँह मोड
मेरे आखिरी वक्त में ना ऐसे तू मुँह मोड
मेरे आखिरी वक्त में ना ऐसे तू मुँह मोड


सुनीता शर्मा 
जीवन धरती पर सपने दिखते इन्द्रधनुषी ,
पग पग झमेलो में सपने होते आरुषि ,
बरखा की बूँदो सी सींचती सपनो की धरती ,
सोंधी सोंधी माटी सी खीचती सपनो की विदूषी !

हरियाली धरती की लाती खुशियाँ जीवन भर की ,
सात रंगों में सिमटी गाथा पूरे मानवता की ,
सुख दुख में संचित प्रकृति के इन्द्रधनुषी रंग ,
जीने का ढंग सीखाती भरती जीवन में अनोखे रंग !

जीवन प्रेरणा से भरपूर है समझो पूरी सृष्टि ,
उसको समझने हेतू अपनाओ कोमल दृष्टि ,
संगी साथी के बिना भी पेड़ों से सँवरे धरती ,
स्वच्छ वातावरण बनाओ बचाओ अपनी हस्ती !


सुनीता पुष्पराज पान्डेय
इंद्रधनुष........
जब तुम निकलते हो बादलो की ओट से
तुम्हे देख खिल जाता है मेरा मन
छिटके है मेरे जीवन मे ये तुम्हारे रंग
लाल रंग से बनी मै अपने पिया की सुहागन
पीला रंग ले आता है मेरे घर मे बंसत
नीले आसमा को निहारा करती हुँ पहरो
हरी बगीया को देख भूल जाती हुँ खुद को

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Friday, October 11, 2013

25 सितम्बर 2013 का चित्र और भाव


जगदीश पांडेय 
नई उमंग हो नई तरंग हो
तन में हो सदा उर्जा के रंग
मन में एक विश्वास जगेगा
रहेगा जो सदा योग के संग

ध्यान मग्न हो रचना करें
मिल कर नई सृष्टि का हम
जिसे देख कर रह जाये
सृष्टि का रचइता भी दंग
नई उमंग हो नई तरंग हो
तन में हो सदा उर्जा के रंग

.
कहाँ शहर में है अब वो सुख
जो मिलता है अपनें गाँव में
सुबह शाम करते थे ध्यान
नीम की घनेरी छाँव में
पहिया वक्त का चला ऐसा
लड रहा इंसान खुद के संग
बिना ध्यान मन के तार टूटे
और सपनें सारे हो गये भंग
.
नई उमंग हो नई तरंग हो
तन में हो सदा उर्जा के रंग
मन में एक विश्वास जगेगा
रहेगा जो सदा योग के संग


बालकृष्ण डी ध्यानी 
हम सब हैं
मै हूँ
तो तुम हो
साथ फिर हम सब हैं

देखा देना होगा
हम को मिलके
एक दूजे का साथ
मै हूँ

हवा पानी
खिलता ये प्रकाश
चारों मौसम हम आगाज
मै हूँ

निर्भर हम है
एक भी अगर कम है
बिगड़ जायेगी बात
मै हूँ

देखो हम सबको
संतुलन रखना पड़ेगा ध्यान
सृष्टी में तब रहेंगे प्राण
मै हूँ

कहना है मेरी जान
जीवन में पेड़ों को
देना पड़ेगा सन्मान
मै हूँ

एक पेड़ लगाओ
खुद को भी बचाओ
धरा को सजाओ
मै हूँ

मै हूँ
तो तुम हो
साथ फिर हम सब हैं


अलका गुप्ता 
अमोघ अस्त्र सा बाहुपाश में हो |
दृढ़ता एक आत्म संकल्प में हो |
हो प्रयास पर्यावरण संतुलन का...
उत्साह असीम आगाज तन में हो ||

वर प्रकृति संग...वधु हरियाली हो |
मधुर मुग्ध प्रगाढ़.....आलिंगन हो|
सृष्टि सदा सुखमय अविराम अतिशय
अंक लता वट वृक्ष अक्षय अगाध हों ||

मन मानवता से मानव ओतप्रोत हों |
उज्जवल अगाध निधि...प्रेम वेश हो |
सुमधुर गंध सोंधी... माटी की अमोघ
ग्रामवास की सरल गलबाँही परिवेश हो ||

उकता रहा मन विकल बहुत आज है |
सीमेंट के पसरे अकूत ये जंगल राज हैं|
चाहता मन भागना विषम इस आगोश से
ढूंडता कोयल पपिहरे की मधुर आवाज है ||


भगवान सिंह जयाड़ा 
उगते सूरज की निर्मल काया ,
यह कुदरत की अनोखी माया ,

किरणों में समेटे अनोखा तेज ,
लगे जैसे यह ऊर्जा की हो सेज ,

आवो कुछ पल कुदरत से जुड़ें ,
आपा धापापी से कुछ पल मुड़ें,

आवो कर लें सुबह कुछ योगा ,
तन मन इस से निर्मल होगा ,

ऊर्जा का होगा तब नया संचार,
मिटेंगें तन मन के सब बिकार ,

मन को अनोखी शान्ति मिलेगी,
शरीर,आत्मा सदा निर्मल रहेगी,

उगते सूरज की निर्मल काया ,
यह कुदरत की अनोखी माया ,


Pushpa Tripathi 
----- आओ साध ले -----

चलो साध ले
अपने हरित को
तन मन समर्पण सरस साथ है
सुन्दर भू पर
लाल सुनहरी
मिटटी कण कण प्रकृति साथ है
चलो साध ले
पग पग जीवन
वृक्ष हमारे जीवन दाता .........l l १ l l

भूमि अपनी,
मात सी छाया
नीला अंबर
छत्र है साया
हरिताभ रंगों को
आओ .... लुटाए
अपने आँगन ... निगम उजाले
आओ साध ले
अपने परिवेश में
धरती .... धरा ... वसुंधरा हमारी ...... l l २ l l


किरण आर्य 
साधक का मन
अमरबेल सा
हरीतिमा लिए
उजास की और
अग्रसर निरंतर
मन के गहन
अन्धकार में
आस के दीप
जलाता उस
ईष्ट को ढूंढता
अंतर्मन में
जिसे ढूंढें है
जहाँ सारा
अनंत विस्तार में
और वो बैठ
मुस्कुराये है
अंतस में
इस भाव को
समझे केवल
साधक का मन
कस्तूरी की
महक से विचलित
पागल मन भटके
इत उत पर
जीवन भर
साधक मन है जाने
प्रभु बसे ह्रदय में ही
मिथ्या सी है भटकन
प्रभु तो बसे अंतर्मन


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Saturday, September 21, 2013

16 सितम्बर 2013 का चित्र और भाव



जगदीश पांडेय 
आसमाँ झुक जायेगा और धरती झूम उठेगी
फिजाओं में हर जगह बहारों की धूम रहेगी
कब आयेगा वो पल सजेगा मेरा घर अगना
डर है बहक न जाउँ खनके जब तेरा कँगना

मुझे बुलातें हैं जैसे झुमके ये तेरे कानों के
हर वक्त सजतें हैं ख्वाब मेरे अरमानों के
यकीं है होश खो दोगी आओगी जब घर मेरे
ख्वाबों से सजाये है हर कोनें मैनें मकान के


किरण आर्य 
खनकती सी चूड़ियों में
बसा है सजना के लिए
प्यार मेरा
लाल हरी सतरंगी
सी चूड़ियाँ
खनकती जब हाथों में
तो अहसास हो जाते
मुखर से
मन के सभी भाव
अहसास और बुलाते
सजना को पास
कहते मन की हर बात
सिंदूरी सी आभा
बिखर जाती
मुखड़े पर उस क्षण
कहते है सुहाग की
निशानी इन्हें
मेरे लिए तो ये कहानी
तेरी और मेरी
जो रची हीना में झुमकों में
और खनकती
सतरंगी चूड़ियों में


बालकृष्ण डी ध्यानी 
चूड़ियां

चूड़ियां वो खनकाती है
उसकी ये अदा मुझको लुभाती है

प्रियसी वो स्वामिनी है
गीत वो चूड़ियां से ही वो लगाती है

रंग बेरंगी चूड़ियां उसकी
लेती अब वो सनम संग अटखेलियां

इंद्रधनुष उस कलाई सी वो
सुहागान की उन अंगडाई सी वो

साजन की मेहँदी रंग लाती
चूड़ियां अब उसकी सहेली बन जाती

छन-छन करती जाती है वो
मन तन में अब बिखर जाती है वो

मन भय पिया का अब वो चूड़ियां
चूड़ियां जब खनकाये अब वो चूड़ियां

चूड़ियां ही चूड़ियां अब छाई है
देखो प्रेम ऋतू फिर से अब आई है

चूड़ियां वो खनकाती है
उसकी ये अदा मुझको लुभाती है


भगवान सिंह जयाड़ा 
देखो झुमकों वाली ,रंग बिरंगी चूड़ी प्यारी ,
जब पहनती इनको ,हमारे देश की नारी ,

आदि काल से पहने इसे भारत की नारी ,
झलकती तब चूड़ियों से सभ्यता हमारी ,

बक्त के साथ बदली है इन की कलाकारी ,
नारी सृंगार में सदा इन की भूमिका न्यारी,

अनगिनत रूप रंग ,लगती कितनी प्यारी ,
पहनें माँ ,बहिन ,बेटी और पत्तनियाँ सारी ,

देखो झुमकों वाली ,रंग बिरंगी चूड़ी प्यारी ,
जब पहनती इनको ,हमारे देश की नारी ,


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
... प्रेम बतियाँ ....
खनक रहे कानो में झुमके, खनक रही हाथो की चूडियाँ
प्रेम राग छेड़े खनक इनकी, दिल करने लगे अठखेलियाँ
रंग कितने भी, मन को भाती बस इनकी प्यारी सी बतियाँ
हल्की सी खनक भी प्रेम भाव को देती संगीत सी ऊँचाईयाँ
आँखे खुली हो या बंद 'प्रतिबिंब', बढ़ रही प्रेम की खुमारियाँ
उतर आये प्रेम का सैलाब दिलो में, छू ले तन की गहराईयाँ


अलका गुप्ता 
साँझ ढले जब ..मैं आऊँ प्रिये !..
श्रृंगार तुम अनुपम कर लेना ||

इस अधीर मन अनुरागी को मेरे तुम ..
सिंदूर सा...भाल में अपने... भर लेना ||

माथे पे बिंदिया सी चमके प्रीत मेरी ..
जग को तुम सारे...यही दिखला देना ||

निकल ना जाएँ शब्द कहीं प्रीत के..
नथ का पहरा होंठों पे तुम बिठा देना ||

कानों में कुण्डल... अलकों के घुँघर ...
गालों को ढकले नजर ना कोई लगा देना ||

बालों में महके आमन्त्रण सा ..गजरा ...
तुम वेणी में अपनी ...सजा लेना ||

कर दे दीवाना जो .....मुझे प्रिये !...
चूड़ियाँ कांच की तुम खनका देना ||

पाँवों में बिछुआ बोले ...
झाँझर खन-खन झंनका देना ||

तन-मन में जगा दे राग अनुराग के ...
वस्त्र अवगुंठन से तन को सजा लेना ||

लावण्य तुम्हारा प्रिय वधु सा दमके ...
मुझे तुम वर अपना बना लेना ||

मेंहदी में हाथों की छिपा के ...
नाम मेरा तुम ...सजा लेना ||

बंधन जो बंध जाएंगे तन-मन के ..
गीत सृजन के गुगुनाएंगे फिर मिलके ||

स्वप्न यह अरमान है प्रिय ! मेरा ...
सहर्ष...खुशी से तुम... अपना लेना ||

करेंगे श्रृंगार मिल दोनों ही जग का ...
परिणय यह संस्कार ...सजा देना ||


सुनीता पुष्पराज पान्डेय 
जो खनका के कर दूँ इशारा
मेरी चूडिँयो की खनक पे दौड़े चले आये मोरे साजना ,
बड़े दिनो बाद आज सखी ने याद दिलायी
उन प्यारी लाल रेशमी चूडिँयो जिन्हे देख
मेरे चूड़ी भरे हाथो मे बाँधा था काला धागा,
याद आया भाभी का प्यार और मेरी चूड़ियाँ


नैनी ग्रोवर 
ये रंगबिरंगी चूड़ियाँ,
खनखन करती, मन में हलचल मचा जातीं,
यही कहना था ना तुम्हारा,,
फिर क्या हुआ ?

मेरे चूड़ियों भरे हाथों को थामें,
तुम पहरों बैठे रहते थे,
कल और चूड़ियाँ ले आना,
रोज़ यही कहते थे,
क्यूँ अब मेरी कलाइयों को,
ये चमकती दमकती चूड़ियाँ नहीं सुहाती हैं,
ये क्या हुआ ?

तुम्हारा गैरों का हो जाना,
मेरा जीवनपथ पर तन्हा हो जाना,
मेरा तुम्हारे साथ बीता हरपल याद करना,
और तुम्हारा सब कुछ बिसरा जाना,
पहनने की कोशिश करूँ जब चूड़ियाँ ,
ये तो जैसे मेरे सीने में टूट जाती हैं,
ये क्यूँ हुआ ?........

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Thursday, September 12, 2013

30 अगस्त 2013 का चित्र और भाव




जगदीश पांडेय 
बहुत सुना है मैनें भी इस धरा के बारे में
उत्सुकता है जाननें को वसुंधरा के बारे में
अनगिनत कलियों नें यहाँ श्रृंगार किया है
मँहकू इस चमन में इच्छा अपार किया है

सारी वेदनाएँ सहकर भी गर
औरों को खुश कर पाऊँ मैं
पतझड के मौसम में भी
सारी खुशी पा जाऊँ मैं
इन इच्छाओं को मैने अख्तियार किया है
मँहकू इस चमन में इच्छा अपार किया है

वसंत की हरियाली में
झूमूँ हर एक डाली में
छा जाऊँ मैं सब के दिलों में
उनकी हर खुशियाली में
इंसानों नें सदा ही यहाँ अत्याचार किया है
मँहकू इस चमन में इच्छा अपार किया है

बस एक इच्छा मन में सदा मैं रखता हूँ
दुवा अपनें बागवाँन से यही मैं करता हूँ
शोभा न बढाना मेरी मंदिर के मूरत से
धन्य हो मेरा जीवन शहीद की सूरत से
जय हिन्द , जय भारत , वंदे मातरम्


सुनीता पुष्पराज पान्डेय 
इस दुनियाँ से अनजान थी तू अब तक ,
पर अब हर रोज गढ़ने होगे नित नये आयाम ,
हर जगह होगी इक नयी चुनौती,
तूझे करनी होगी यूं ही जद्धो जहद,
जीतनी होगी हर मोर्चे पर हर लड़ाई ,
वरना तूझे धक्का दे आगे निकल जायेँगे लोग


सुनीता पुष्पराज पान्डेय
आँखे खोलो देखो प्यारी दुनियाँ
तुम्हारे इंतजार मे पलके बिछाये है
सतरंगी रंग चारो ओर तुम्हारे बिखरे पड़े है
सूरज की लालिमा फैल रही है
चिड़ियो का कलरव गुँज रहा है
भौरो की गुनगुनाहट  फिजा मे फैल रही
प्यारी तितली आतुर है करने को स्वागत तुम्हारे



Pushpa Tripathi 
- अंकुरित हम .....

बिटिया ने माँ से पूछा
माँ .. ये पेड़ क्या होते है
उसपर लगे फल क्या होते है
पत्तियां शाखों पर लदी क्यूँ है
जड़ तने से जुदा क्यूँ है
सारे सवालों का जवाब सुनाती
माँ ने हंसकर कहा
बेटी सुन ..
सीधी सी बात
अंकुर में ही फल छिपा है
फल देता मीठा आभास
शाखों से ही पत्तियाँ आबाद
जड़ तने से दूर है
इसीलिए जीते उगते है
हम भी तो अंकुर समान
जीवन बनता पेड़ समान
कई अभिनय झरते पत्ती
अनुभव हमारा बढ़ती शाखा
मानव कर्म .. मानवता धर्म यही है फल
ह्रदय मूल ---- जड़ में छिपा है
इसीलिए तो --- हम भी उत्तम सर्वोत्तम है l


बालकृष्ण डी ध्यानी 
अंकुर

हरी भरी धरा पर
अंकुरित होकर अंकुर हर्षा
अनजान शहर देख कर
मन में कुछ नया पनपा

कोमल शरीर था
कोमल वो अहसास
फूटा इस धरा से उसका
वो पहला पहला प्यार

उठाया उसने सर
कुछ यूँ वो मोड़कर
साकार हुआ सृष्टी का
स्वप्न बस छुकर

हरी भरी धरा पर
अंकुरित होकर अंकुर हर्षा
अनजान शहर देख कर
मन में कुछ नया पनपा



भगवान सिंह जयाड़ा 
धरती के आँचल में एक नया बीज अंकुरित हुवा ,
खूब फले फूले यह ,करते है हम सब इसकी दुवा ,

नन्हें कोमल पत्तों ने ,ली कुछ इस तरह अंगड़ाई ,
देख हरी हरी धरती को ,मन ही मन मुस्कराई ,

सोचे मन में ,मैं भी कब अपनी हरियाली बिखेरूं ,
डाली डाली पे अपनी ,कब देखूं पंछी और पखेरूं ,

बस अच्छी तरह प्रबरिश करना मेरी, हे इन्शान ,
मैं फलूँगा फूलूंगा यहाँ ,सदा खुश होंगें भगवान,

अपनी ममता की छांव में ,सदा तुम को रखूंगा ,
खुद तपती धुप और बारिश ,सदा सहता रहूँगा ,

धरती के आँचल में एक नया बीज अंकुरित हुवा ,
खूब फले फूले यह ,करते है हम सब इसकी दुवा ,


अलका गुप्ता .
नन्हा बीज था एक ...
गर्भ में धरती के बोया |
सो रहा था वो ...
अँधेरी दुनिया में खोया |
किरणों ने सूरज की ...
जाकर उसे हिलाया|
अकुला कर पहले...
वह कुछ झुंझलाया |
वर्षा जल ओस की बूंदों ने...
जाकर जब उसे नहलाया |
आँख खोल धीरे से ...
वह मिटटी से ऊपर आया |
अंगड़ाइयों में उसकी एक ...
अंकुरण तब अकुलाया |
नन्हा सा कोमल वह ...
पौधा एक नजर आया |
पवन ने हौले से तब ...
सहला कर उसको समझाया |
हे नन्हें पौधे ! तुम ...
मत बिलकुल भी घबराना |
थामके मिटटी को अपनी ...
ऊपर ही तुम बढ़ते जाना |
बढाकर शाखों को अपनी तुम ...
जीवन क्लांत पथिक का बनजाना |
निस्वार्थ सृष्टि की सेवा में ...
जीवन अपना अर्पित कर जाना |
हाँ कर ...नन्हा पौधा ...
तब मुसकाया |
बढकर धरती को सारी...
उसने हरा भरा खूब सजाया|
जीवन से अपने बढ़कर ...
सबके जीवन को महकाया ||


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
अंकुरित होने का इंतजार
उस दिन से होता है जिस दिन बोया गया
जीवन रुपी बीज
धरती से पाकर अपार प्रेम स्फुटित हो गया
प्रेम लालन पोषण
प्रकृति की हर चीज को चाहिए विकास हेतू
मानव और पेड़ पौधे  
धरती पर ये जीवन यापन के बन जाते सेतू
इस प्राणी जगत में
जीवन हो कोई भी उसे मान भगवान् की देन
प्रकृति का कर सरंक्षण
प्राणी तुझे मिलेगा जीवन में फिर सुख और चैन


किरण आर्य 
अंकुरित होता
एक बीज धरती से या
कोख़ में लेता आकार
यहीं है सृजन
करे सपने साकार
बनता पौध और
देखभाल संग
लेता रूप तरु का
लड़खड़ाते कदमो से
चलकर होता एक दिन
पैरो पे अपने वो खड़ा
उमंगें लेती अंगडाई
जैसे सावन रुत हो आई
खिलते प्रेम पुष्प
आता यौवन पे निखार
इसी तरह होता जीवन
उसका गुजर
कभी धूप तो कभी छाँव तले
और इसी तरह
धरती से उपजा वो
बीज पले बीज पले..........


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Friday, August 23, 2013

17 अगस्त 2013 का चित्र और भाव




बालकृष्ण डी ध्यानी 
हम दोनों

अलग अलग हैं
हम दोनों
पर कुछ तो बात है
जो एक साथ हैं
अलग अलग हैं
हम दोनों

जैसे दिन है
ये रात है
दोनों में
कुछ ख़ास है
पर कुछ तो बात है
अलग अलग हैं
हम दोनों

रह भी ना पाते दूर
ना रह पाते पास
चुम्बक सा साथ
दुःख सुख साथ है
पर कुछ तो बात है
अलग अलग हैं
हम दोनों

दो किनारे है हम
एक दूजे के सहारे है हम
बहते जाते हैं साथ साथ
लगते कितने प्यारे हैं
पर कुछ तो बात है
अलग अलग हैं
हम दोनों


जगदीश पांडेय
जिंदगी को बेंच कुछ पल चुरा लाया था मैं
एक तेरे सिवा कुछ भी तो न पाया था मैं

तुम ही तो कहती थी हर घडी ये मुझसे
जिंदगी थी तू मेरी एक तेरा साया था मैं
तेरी पलकों में बसा था मैं ख्वाब बन के
आती थी खयालों में दुल्हन सी सज के
तन्हाँ रातों को कभी सुला न पाया था मैं
जिंदगी थी धूप तेरी तो एक छाया था मैं
एक तेरे सिवा कुछ भी तो न पाया था मैं

आज मेरी मंजिल से क्यों तुम बहक गये
तुम्हारे बहकनें से आज आँसू छलक गये
जा रही थी जिंदगी जब मुह मोड कर
तोड कर सारे रिश्ते मौत से जोड कर
गुमसुम सी खडी थी तुम भी उस वक्त
फिर न आनें को गया जब मैं छोड कर
मुश्किल से उस वक्त सम्हँल पाया था मैं
एक तेरे सिवा कुछ भी तो न पाया था मै


Jayvardhan Kandpal 
आज हूँ तुम्हारे साथ, रूठकर क्या पाओगे.
नजर के सामने हूँ,फेरकर नजर क्या पाओगे.

बहुत छोटी है जिंदगी अपने हिस्से की
इस जिन्दगी से इस कदर खेलकर क्या पाओगे.

नहीं है आस्मां पर हुकूमत, जमीं का बाशिंदा हूँ,
मेरे जज्बातों को हवा में उछालकर क्या पाओगे.

फूलों की चाह है, काँटों का भी डर नहीं मगर
गुलशन प्यार का तितर बितर कर क्या पाओगे.

मजबूरियां ना बयां करो मुझसे मजबूरी में,
इस तरह मेरे कलेजे को निकाल कर क्या पाओगे.


भगवान सिंह जयाड़ा 
यूँ खपा हो कर मुझ से,तुम कुछ न पावोगे ,
बेबजह की बातों से,दिल अपना जलावोगे ,

गलत फहमियाँ ,क्यूँ इस तरह पालते हो ,
क्यों खुद के साथ मेंरा भी दिल जलाते हो ,

कब तक घुट घुट कर ,ए जिंदगी जियेंगे,
बेबजह मन मुटाव अब यूँ कब तक सहेंगे,

आवो बहुत हो गयी अब ,मन की बेरुखियाँ ,
आपस में मिल बांटे ,जिंदगी की खुशियां ,

जिंदगी दो दिन की है ,इसे ख़ुशी से जी लो ,
नफ़रत के गुस्से को ,पानी समझ के पीलो ,

यूँ खपा हो कर मुझ से तुम कुछ न पावोगे ,
बेबजह की बातों से दिल अपना जलावोगे ,


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
क्यों?
प्यार क्यों ये रुसवा हो गया
चले थे साथ आज क्यों दूर हो गए
बात से ही बात बनती थी अपनी
उन लम्हों से आज क्यों दूर हो गए
खामोशियों की भीड़ है यहाँ
बातो के सिलसिले आज क्यों टूट गए
चलते थे थाम कर हाथ जहाँ
हाथो के ये बंधन आज क्यों छूट गए
दिलो में बगिया सी संवरती थी
हर फूल आज क्यों पतझड़ से झड गए
वादा था साथ ख़्वाब सजाने का
भूल कर वादा, ख़्वाब आज क्यों टूट गए


अलका गुप्ता 
तुम जो बदल गए हो |
हर समां बदल गया है |
आँखों को जब तुम्हारी ..
हम पर नहीं ऐतवार ..
आइना हम क्यूँ देखें |
दिल कैसे सहेगा बेचारा ..?
सब कुछ तो वही है ..शहर में |
साया थे हम ..इक-दूजे का |
तुम ही बदल गए हो |
बदलने से तुम्हारे ..
बदला ये जहाँ... सारा ||
गर..नहीं....तो लौटा दे !!!
वह हमारा ...प्यार.. !
वह उल्लास कहाँ है ?
वह हास ..मधुमास कहाँ है ?
स्पर्शों का मादक ...
वह ..अहसास कहाँ है ?
मिलने को हमसे ...दिल तुम्हारा |
बेताब ..बेकरार..कहाँ है ?
सब कुछ है...शहर में ..वही
मगर...वह ..!!
मौसम-ए- बहार कहाँ है |
तुम जो बदल गए हो ?
जिन्दगी की राह में ..!
आसान अब वह कहाँ हैं ..?
गुम हो गई हैं मंजिलें !!
जलाए थे हमने तो ..
हर तरफ ..दिए ..मुहब्बतों के |
तुम जो बदल गए हो |
वह मेरा यार कहाँ है ?
यूँ ही हम ..रह गए हैं राहों में ..
दिल ये ..जलाते हुए ..
यादों की शेष अंगारों में |
राख अरमानों की ..समेटे हुए |
तू जो बदल गए हो ..|
हर समां बदल गया है |
साया हर ...कोई ..हमसे
जुदा -जुदा हो गया ||


किरण आर्य 
तुमने कहा प्यार मुझे तुमसे
मैं भीग उठी मीठे अहसासों में
सपने रुपहले लगी बुनने
कदम आसमां लगे छूने
नयनों में लहराने लगे
लाल रक्तिम डोरे
प्रेम की पीग बढ़ाती मैं
विचरने लगी चांदनी से
नहाई रातों में
भोर की पहली किरण सी
चमकने लगी देह
प्रेम तुम्हारा ओढ़ने बिछाने लगी मैं
जीवन हो गया सुवासित
होने लगा उससे प्यार
फिर यथार्थ का कठोर धरातल
कैक्टस सी जमीं
लहुलुहान होते सपने
पर सुकूं तू हाथ थामे था खडा
वक़्त के निर्मम थपेड़े
उनकी मार देह और आत्मा पर
निशां छोडती अमिट से
मरहम सा सपर्श तेरा
रूह को देता था क़रार
फिर एक दिन तुमने कहा
मुक्ति दे दो मुझे
नहीं मिला सकता
कदम से कदम
नहीं बन सकता अब
हमकदम हमसफ़र तेरा
मुश्किल थे वो पल
दुरूह से मेरे लिए
तुम्हारे दूर जाने की सोच ही
दहला देती थी हृदय को
मैंने देखी बेचैनी
तुम्हारी आँखों में
तड़पती मछली सी कसक
और उसी क्षण मुठ्ठी से
फिसलती रेत सा
कर दिया था आज़ाद तुम्हे
तुम दूर होते गए
और फिर हो ओझल
निगाहों से मेरी
आज जब याद करती तुम्हे
एक परछाई सी नज़र आती है बस
हाँ अहसास जीवंत से है अब
साथ मेरे जिन्होंने जीना सिखाया मुझे .........


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Thursday, August 15, 2013

13 अगस्त 2013 का चित्र और भाव

15 अगस्त पर प्रेषित 


बालकृष्ण डी ध्यानी 
अखंड भारत का सपना

अखंड भारत का
सपना संजोये बैठा है ये दिल
फिर हिन्द का परचम लेके
बैठा है ये दिल
अखंड भारत का
सपना संजोये बैठा है ये दिल.....

भारत माँ की टूटी भुजाओं को
जोड़्कर फिर देख रहा दिल
भगवा का सुंदर रंग साथ लेकर
फिर खेल रहा है दिल
अखंड भारत का
सपना संजोये बैठा है ये दिल …

खंडो खंडो में बांटा है आज
उसे एक खंड में जोड़कर देख रहा है दिल
एकाकार सिंह रूप में बिठाकर
खुले मन में विचर रहा है दिल
अखंड भारत का
सपना संजोये बैठा है ये दिल …

तीन रंगों में अब रंग जाने को
बैठा है ये दिल
अपनो को अब संग लाने को
बैठा है ये दिल
अखंड भारत का
सपना संजोये बैठा है ये दिल …


सुनीता पुष्पराज पान्डेय 
अपने देश को अंखड भारत बनाने की हमने ठानी है
एक ही लक्ष्य अब हो हमारा
जिये हम देश की खातिर मर जाये इस देश की खातिर ,
जब तक है जान हमारी
हम देश की आन के लिये अपनी जान लड़ायेगे ,
इस अखंड भारत के सपने को हम पूरा कर दिखलायेँगे


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
खंड होता देख रहा हूँ
अखंड भारत का सपना
अंग्रेजो की निति पर चल रहे
देश को टुकड़े कर नए देश बना रहे
जो थे अपने अब पड़ोसी हो गए
पड़ोसी जब तब आँख दिखाते है
हम फिर भी पड़ोसी धर्म निभाते है

देश जो बचा वो भारत का हिस्सा है
जो हुआ अब तक, समझो किस्सा है
कोई हम पर अंगुली उठाये न पाए
तिरंगे का सम्मान झुकने न पाए
आओ सब देश हित में एक हो जाए
जाति - धर्म न इसमें रोड़ा बन पाए
बंगाल से गुजरात तक
कश्मीर से कन्याकुमारी तक
अखंड भारत का भाव संचार हो
तन मन में भारत के प्रति प्यार हो
एक आवाज फिर बुलंद हो
वन्दे मातरम् वन्दे मातरम्


Pushpa Tripathi 
- मेरा भारत -

भारत मेरा .. प्यारा भारत है
देश को जोड़ती विभिन्नता की मिसाल है
सिन्धु यहाँ का जोड़ता प्रदेश
एक ही भारत .. मेरा अभिमान है
सभ्यता कई हमें सिखाती
जन जन भूमि पर ध्वज फहराती
रग रग एकता दीप जले
स्वर्ण प्रकाश चालित व्योम रहे
भारत मेरा प्यारा भारत
सदियों सदियों अखंड रहे
जय हिन्द .... जय हिन्द .... जय हिन्द ..!!!


जगदीश पांडेय 
कैसे कहूँ आज मेरा भारत अखंड है
जहाँ भी जाए नजर दिखता खंड है
था कभी नारा जय जवान जय किसान
अब तो बेइमानी भ्रष्टाचारी प्रचंड है
दम तोड रहा है कानून यहाँ
संसद की चार दिवारी में
कोई बना है धृतराष्ट्र यहाँ
तो दुस्सासन व्याभिचारी में


Bahukhandi Nautiyal Rameshwari 
कैसे।।।
ह्रदय चीत्कार दबा मैं। .
झूठी जय जयकार करूँ। .
सहमी हूँ। .
देख भविष्य। ।
कैसे माँ की लाज़ ढकूं। .
दिन का चैन। .
महंगाई खा गयी। .
रातों का। ।
धर्म छीने सुकून।
कन्या शूल बन चुकीं जहाँ । .
कैसे उस आँगन पाँव धरुं।
कैसे झूठी जय जयकार करूँ। ।

कैसे देखूँ। .
चीथड़ों मैं माँ। .
टुकड़े कलेजे के। .
दामन से। .
अपना२ कतरन काट रहे। .
धर्म, भाषा, जाति से। .
माँ तेरा। .
कलेजा बाँट रहे।
बेटी हूँ। .
माँ तेरी। ।
तेरा मेरा साथ रहे। .

अँधा कानून जाने सब। .
जब गूंगा होने लगे। ।
देश में गद्दारों की। .
तूती गरजने लगे जब। .
समझो तिरंगा रंग। .
बदलने लगा है अब। .
कैसे फिर तेरे। ।
दामन में माँ। .
नव तिरंगा रंगूँ।
कैसे झूठी जय जयकार करूँ। ।


अलका गुप्ता 
-देश के कायरों से --

देश हो ...... खण्ड-खण्ड !
अखिल विश्व चाहें रो पड़े !
विलग हों .......जन-जन !
कौम की ....... आड़ में !
संभाल लो ......अस्त्र को !
रक्त से ......भाई के रंगो !
मार दो .... मानवता को !
सिर ना फिर .. उठा सके !
तोड़ दो सहृदय हाथ-पाँव ..
साह्यतार्थ ..जो मचल उठें !
सूनी हों ....... माँग भी...
माँ विकल.....सिसक उठें !
मींच लो !...... मींच लो !
कायरों !..निज आँख को !
नमन करो .....उद्दण्ड हो !
आज के ..आतंकवाद को !
भूल जाओ !...अतीत के...
देश-हित ...रक्त-दान को !
सोचना मत...भविष्य को !
देखना .... चुपचाप सब ...
देश में ! ............ चाहें ...
बेकसूर ...... मारकाट हो !



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Monday, August 12, 2013

7 अगस्त 2013 का चित्र और भाव



बालकृष्ण डी ध्यानी 
देश खड़ा बस रह जाता है

बनकर तमाशा अपने खुद का
राहे दिल ये संसद का मजाक उड़ते हैं
देश खड़ा बस रह जाता है

लहूलुहान हुई देश की सीमायें मेरी
वोटों की दीवारों का मकबरा सजाते हैं
देश खड़ा बस रह जाता है

रहते हैं हर वक्त जवाँ सरहदों पर जवान
गोलियों को वो अपने सीने में खाते हैं
देश खड़ा बस रह जाता है

अलविदा कर हिन्दुस्थान को जब
वो अपने वतन पर धराशायी हो जाते हैं
देश खड़ा बस रह जाता है

दिल रोता है बस कुछ देर ये आंसूं
कुछ देर बाद वो भी शांत हो जाते हैं
देश खड़ा बस रह जाता है

सफेद पोश खाकी का बुरा हाल इतना
सहादत पर उनकी बस एक तमगा पहनाते हैं
देश खड़ा बस रह जाता है


भगवान सिंह जयाड़ा 
समझ नहीं रहा पाक अगर हमारी भाषा ,
तो क्या कर सकते है हम पाक से आशा ,

कुर्बानी कब तक हम अपने जवानो की देंगे ,
बदला जरूर हम इस का ,अब ले कर रहेंगे ,

उस की भाषा में ही अब जबाब देना होगा ,
कब तक भारत ,चैन की नीद अब सोगा ,

मुहँ तोड़ जबाब अब पाक को देना होगा,
यही अब भारत के हित में यूँ उत्तम होगा ,

देख सरकार का रुख ,दिल सबका रोता है ,
क्यों यह बार बार ,पाक की जुर्रत सहता है ,

एक बार तो आर पार की होनी चाहिए जंग ,
कब तक होते रहेंगे पाक से इस तरह तंग ,

यह हर बार हम से दोस्ती की बात करता है ,
और पीठ के पीछे से ,हम पर छुरा घोपता है,

समझ नहीं रहा पाक अगर हमारी भाषा ,
तो क्या कर सकते है हम पाक से आशा ,



जगदीश पांडेय 
संसद की चार दिवारों में देखो
हो रहा है देश निलाम हमारा
खो गई गरिमा अशोक स्तंभ की
जो अब तक था पहचान हमारा

राष्ट्रीय पर्व के अवसर पर
ढोंग अब यहाँ सब रचाते हैं
तिरंगा देश की शान है केवल
एक दिन सब शोर मचाते हैं

कहाँ समझ पाये ये सफेदपोश्त
जो बदनामी का रंग लगाते हैं
अपना खून खून है और
औरों का पानी बतातें हैं

क्या फर्क इन्हें सरहद पर
जवान न्योछावर हो जाये
माँ भारती की आखों के
सपनें चाहे खो जाये

अब न होने पाये लाल हलाल
न हो माँ को अब कोई मलाल
क्यूँ नही समझते देश के रक्षक
लाल की माँ कर रही है सवाल

गरिमा देश की तुम पहचानों
अपनें आप को अब तुम जानों
शहीदों की चिताओं पर अब
न होनें पाये अब कोई बवाल.
लेकिन
देख बेटों की ये शहादत
माँ का कलेजा फट पडा
दिल के टुकडे हुवे हजार
और बोल ये निकल पडा

तुम्हें ढूँढे मेरी निगाहें
जानें कहाँ हो तुम
अब तो लौट आओ
चाहे जहाँ हो तुम
.
जय हिंद , जय भारत , वंदे मातरम्


Bahukhandi Nautiyal Rameshwari 
सब बिसरा वो बैठा सीमाओं पर..
गर दुश्मन भरे बारूद
प्रहरी तू अंगार भर, निगाहों पर। .

तिरंगे की रखने आन बान। .
हर बार न्यौछावर तेरे प्राण।
शीत, लू, ऋतुओं का तुझ पर असर नहीं। .
स्वेत वस्त्र धारी, बस जिह्वा चला रहे।
बाँट चुके ये देश भीतर, गुलामी में कसर नहीं। ।

हर शहादत पर इनकी शाब्दिक लीपापोती। .
कब तक शहादत, नापाक इरादों को रहेगी धोती। ।
ढहने को है शीश माँ का।
ये बैठे संसद कफ़न का पट नाप रहे..
नित हिन्दू मुस्लिम का मंत्र जाप रहे। ।
बेटे, आज जाति, धर्म, भाषा पर ज़मीन नाप रहे। .

कब तक माँ भारती सीने पर तेरा लहू सहे। .
कभी सीमाओं पर इनका भी लहू बहे। .

आज तिरंगा यही कहता नजर आता है। .
दफ़न कर दो मुझे भी, हर शहादत पर।
इससे पहले मेरे रंग मिटने लगे।
बंटवारे में फिर से माँ के..
अंग अंग कटने लगे…

नूतन डिमरी गैरोला
ओ मेघ
कितना बरसोगे
इस रात की स्याही में तड़ित
कितना चमकोगे
गरजना है तो कराल सा गरज
जा कर सीमा पार दुश्मन की छाती पे बरस
आवाम है आजाद
पर नेश्तानाबूत आजादी है
युद्द न होना है भली बात पर
पर बिन युद्ध
निरीह सैनिकों के लहू की
ये कैसी बर्बादी है|
मार दिए जाते है कपट से
गर्दने उतार ली जाती हैं झपट से
और संसद में आवाम की भलाई के लिए
एक मत न्यायसंगत नहीं होता है पारित
जूतम जूता और कुर्सी के लिए
खुनी युद्ध होता है ...
मूक रहे अशोक चिन्ह के
चार सिंह
चार दिशाओं में
हमेशा रहे इक दूजे से असहमत .........
क़ानून ने तो पहले ही
बाँध ली थी आँखों पर काली पट्टी
पर अब बापू जी के तीन बन्दर
बघिर, गूंगे ही नहीं अंधे हो चले हैं ...
अब रात घनी काली हो चली है
उम्मीदों की पोटली अब
भेदभाव की आंधी में बिखर चुकी है
माँ का कलेजा रो रो कर छलनी हो चुका है
तिरंगा अब शान नही
बेकसूरों की शहादत का
बस कफ़न हो चुका है ....
ए मेघ तू तुझसे है अनुनय विनय
अब तू ले संग तड़ित
कर विकराल गर्जन
सरहद पार जा कर
दुश्मन पर
बज्र का आघात कर
उनकी छाती पर बरस............


Pushpa Tripathi -
 राजकीय सलामी ...

नहीं बोलते सोचते कुछ
संसद सदन निद्रा में चूर
कुछ कुछ ढफली राग मचाते
बाहर से ही शान दिखलाते
बिछ रही लाशें कितनी
सरहद पर चाहे जितनी
सर कट जाते गोलियों की मार
शहीद सैनिकों की दशा हर बार
टूटती चूड़ियाँ विलाप जो करती
वर्दी से झर झर लहू ही बहता
आंखों का पानी गाढ़ा होकर
अंतिम संस्कार की पेटी उठाता
देह अमर बन 'अमर शहीद '
राजकीय सलामी हम भी देते ...!!!


अलका गुप्ता 
शहीदों की चिताओं पर...
लगेंगे हर वरस मेले |
बदल दो तारीख में ...
आज की ...
उनके ये अल्फाज ||

शहादत पे शहीदों की...
उठेंगे सियासत के झमेले |
तड़पती है हर आत्मा...
सियासी ..इन जंजीरों में |
सुनी जाती नहीं ...
चीखें मजलूम...!!!
इन संसदों में ||

गर्व है देश को सारे ...
अपने उन वीरों पर
वह थे वीर सपूत ...!
झेले हैं जिन्होंने ...
डटके दुश्मन के ...
हर कायर वार ||

समेटे है ...
गर्व से ...
देखो ...!!!
तिरंगा भी ...
कफन में...
अपने ...
ये लाल !!!

डूबा है दर्द में...
ललकारता ...!
बच्चे-बच्चे का ..
स्वभिमान |
हर आँख मायूस है |
आयेगा कब ...?
सियासत में ...
यही उबाल ||

समझ में आयेगा...
कब आखिर ?
इतनी सस्ती सी नहीं...
ये जान !
ये सरजमीं ....!!!
ये सरहदें हमारी !!!


Pushpa Tripathi 
कट गए बाजू
जो आधार था
पुत्र .. पति .. भाई
जो कुछ सहारा था
सरहद पर मिटने वाले
शाहदत भारत शूर
वतन के खातीर
वह लाल प्यारा था .......



किरण आर्य 
शहीद वो जो देश पर न्योछावर
सर्वस्व अपना कर चले
क्यों बहाए दिल आँसू
तू उनके लिए

वीरगति बलिदान उनका
हो रहा जाया यहाँ
लाश पर उनकी राजनेता
राजनीती है कर रहे

संसंद में बिछी चौसर
शकुनि चाल चल रहे
अशोक स्तंभ और तिरंगा
है स्तब्ध से खड़े
शोर्य गाथा थे जो कहते
आज बेबस है बड़े

देश की रक्षा को तत्पर
जवान खूं से तिलक कर रहे
नेता यहाँ पर देश के मेरे
आश्वासनों की बैसाखियों
पर टिके है चल रहे

देश गरिमा अपनी
आज देखो खो रहा
हाय देखो बेबस सा
खून के आंसू है रो रहा


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
हम
गणतंत्र का करते मान
संसद का करते सम्मान
लेकिन
सस्ता शहीद का बलिदान
नेता देते उट पटांग बयान
हमारी
आन पर हमारी शत्रु हमला करते
सरकारी नेता कुछ कहने से बचते
आखिर
कब तक हम यह सब सहते रहेंगे
कर शांति वार्ता जख्म खाते रहेंगे
अब
हमें देश हित सर्वोपरि रखना होगा
शत्रु को जबाब मुंह तोड़ देना होगा!!

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Tuesday, August 6, 2013

2 अगस्त 2013 का चित्र और भाव




बालकृष्ण डी ध्यानी 
एक पग तो बडाना

हाथी और गेंद
देखो जिंदगी खेले कैसे कैसे खेल
इंसान और जानवर का है ये मेल

खड़ा है हाथी
अपना संतुलन संभाल कर
कितने घरो का वो चुल्हा जलाकर

पकती है उस से किसी घर की रोटी
भूख बिना मेहनत भी है रोती
चलो बच्चों बजा वो ताली

मेहनत से ना हार जाना
उस लगन को तुम ना भूल जाना
देख खड़ा हाथी गेंद पर ,तुम बच्चों आज कुछ सीख जाना

हार नही होती है
असफलता जीत की सीड़ी है
तुम बच्चों एक पग तो बडाना

हाथी और गेंद
देखो जिंदगी खेले कैसे कैसे खेल
इंसान और जानवर का है ये मेल


अलका गुप्ता
इंसान और जानवर का जो मेल हुआ |
अनोखा फिर .. सर्कस का खेल हुआ ||

ये दुनिया तो वैसे भी रोमांच की है |
जीते जो हौसलों से उसकी विजय है ||

इंसान ने भी क्या-क्या गुर बनाए |
हुनर से अपने जानवर भी नचाए ||

हाथी बन्दर कभी .. तोता-मैना नचाए |
खेलें बाल से कभी चढा बेलेंस दिखाए ||

पेट पापी को...बनाना न कातिल कभी |
सीमाएँ मनोरंजन की हों न हिंसक कभी ||


जगदीश पांडेय 
मूक जानवर हाँथी ताकत लिये विशाल
अजब दिखाता खेल करता ये कमाल
पढा विज्ञान में दाब हवा का बेमिशाल
वही प्रयोग कर हाँथी मचा रहा बवाल
किया प्रयोग किनारे समंदर के अपार
लिया ऐपरेटस् के लिये इसनें फुटबाल
अपना सारा बल फुटबाल पे है लगाया
मेहनत हुई बेकार और कुछ न कर पाया
सोचा समझा तब इस निष्कर्ष पर ये आया
अनगिनत हाँथियों का बल हवा में समाया
इंसान ही नही कर सकता केवल विज्ञान में कमाल
जानवर भी करते प्रयोग अपनें तरीके से बेमिशाल


भगवान सिंह जयाड़ा 
देख मेरा यह करतब ,
लोग बजाते है ताली ,
दिल से मेरे पूछो ज़रा ,
मैं इंसान को देता गाली ,
क्यों मुझे कैद किया है ,
मै जंगल का हूँ प्राणी ,
मेरी ब्यथा सुनों ज़रा ,
नित बहे आँखों से पाणी,
कभी बनाया मुझे अप्पू ,
कभी सर्कस में नचाया ,
कभी पिजड़े बंद कर के ,
बहुत मुझको है संताया ,
मजबूरी में मैं करू ये सब
हर पल लगे हंटर की डर,
बरना मैं जंगल का प्राणी ,
रहता था इन से बेखबर ,
देख मेरा यह करतब ,
लोग बजाते है ताली ,
दिल से मेरे पूछो ज़रा ,
मैं इंसान को देता गाली,




किरण आर्य 
गेंद और हाथी

जीवन है एक खेल अजब सा
हाथी घूमे गेंद पर जैसे
घूमे मानुष दिन रैन भटकता

निन्यानवे का फेर है भारी
आकर्षण चुम्बकीय है गज़ब का

दो पैरो पे खड़ा ये हाथी
मानव बैसाखियों पे है घिसटता

बेबस है जैसे ये हाथी
आक्रोशित मानव है सिसकता

कठपुतली बन नाच रहा ये
आम जन बेबस है दहकता

हाथी और मानव का जीवन
है एक जैसी राह खड़ा
एक बेबस एक बेबसी की
राह पे अग्रसर पैर पटकता


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
जीवन में सुख दुःख
बनाते है संतुलन
लेकिन,
कोई छोटा, कोई बड़ा
कोई ज्ञानी, कोई अज्ञानी
कोई ताकतवर, कोई कमजोर
कोई जीता, कोई हारा
कोई दोषी, कोई निर्दोष
कोई जोश में, कोई खोए होश
कोई प्रेमी, कोई दुश्मन
कोई जाना, कोई अनजान
कोई हैवान, कोई इन्सान

काश संतुलन हो कुछ येसा
दुःख कम और सुख हो ज्यादा
हो बड़ी
अच्छाई, सच्चाई  और इंसानियत
छोटी हो
बुराई, झूठ और हैवानियत
बढ़ते रहे
दान, धर्म, कर्म और ईमानदारी
घटते रहे
पाप, अपराध, अपवाद और अहंकारी


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Thursday, August 1, 2013

31 जुलाई 2013 का चित्र और भाव



Pushpa Tripathi 
उड़ रही बनके गुब्बारा

रंगीन सपना दुनिया मेरी
ये ख़ुशी मेरी अपनी है
गुब्बारों संग उड़ चली मै
यह साकार कामयाबी मेरी है ....

सुन्दर सुनहरी पंख लगी है
मन इच्छाओं की डोली सजी है
चल पडूँगी साथ ही तेरे
यह उज्जवल सफ़र अब मेरा है l


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल  
~मैं उड़ चली ~
कल तक
सोचती थी
उडू आसमा में
लम्बी हो
जिन्दगी की डगर
आज पा लिया
रंगीन सपनो का
हकीकत भरा आसमा

अपवाद से
कर लिया किनारा
बदल कर सोच
खुद पर किया भरोसा
मिले अपने
थाम कर उनका हाथ
लो मैं उड़ चली
लेकर नए ख़्वाब
ढूँढने और जबाब ....


सुनीता पुष्पराज पान्डेय 
मै नील गगन मे उड़ जाऊ
इक ऐसा जहाँ मिले
जी भर साँसो को भर पाऊ
इक ऐसा संसार मिले
जहाँ मै सिर्फ शो पीस नही
इक इंसान समझी जाऊ
सहज हो जीवन मेरा
मै स्वछंद हो कर नही
मेरे अपनो के साथ जीना चाहूँ


बालकृष्ण डी ध्यानी 
वो उड़ान मेरी

नीले अंबर छुने की छलांग मेरी
उन सपनों को पाने की
वो उड़ान मेरी ...................

रंग बेरंगी गुब्बारों संग
हवा के इन मौज़ों संग है
वो उड़ान मेरी ……………….

मेरा मन वो.... देखो उड़ा चला
सात आसमान वो छुने चला
वो उड़ान मेरी ……………….

सीधा जीना है वो उड़ान मेरी
इन पंखों से है परवाज मेरी
वो उड़ान मेरी ……………….

ना करों मै किसी का इंतजार
वो आसमान देख रहा है मेरी राह
वो उड़ान मेरी ……………….

अब बदलेगा वो इतिहास पुरना
गीत गाऊँगी मै नया है आज जमाना
वो उड़ान मेरी ……………….

नीले अंबर छुने की छलांग मेरी
उन सपनों को पाने की
वो उड़ान मेरी ……………….


जगदीश पांडेय 
गुब्बारा होता उड जाता रे
छूनें को मैं ये आसमाँ
रंग बिरंगी दुनियाँ ये
मुठ्ठी में समाँ जाता रे
गुब्बारा होता उड जाता रे
गुब्बारे जैसा मैं फुल पाता
भर लेता दुख सब का
जीवन में सबके खुशियों का
नया सबेरा ले आता रे
गुब्बारा होता उड जाता रे


भगवान सिंह जयाड़ा 
दिल करता है आज नभ को छू लूं ,
खुशी के यह पल जी भर के जी लूं ,

ख्वाइशों की चाहत आज हुई है पूरी,
नहीं कोइ चाह अब यहाँ मेरी अधूरी,

गुब्बारों की तरह उडूं आसमान में ,
आज सब कुछ मेरा इस जहांन में,

दिल झूमें खुशी से ऐसा आज मेरा,
देख घटा को नाचे जैसे मन मयूरा ,

कामयाबी की बनूं मैं ऐसी मिशाल ,
जिसे देखे दुनियाँ सारी,यह बिशाल,

सपने सब के हों इस जहां में साकार,
तभी बदलेगा ,मानवता का आकार,

दिल करता है आज नभ को छू लूं ,
खुशी के यह पल जी भर के जी लूं ,



अलका गुप्ता 

गुब्बारे वाला ....बाबा आता है |
रंग-बिरंगे गुब्बारे वह लाता है ||

इन गुब्बारों की महिमा न्यारी |
कितनी मोहक...छवि है प्यारी ||

सपनों में भी गुब्बारे उमंग जगाएँ |
उड़ कर ये चितचोर..मन भरमाएँ ||

पापा उड़ने वाले गुब्बारे तुम लाना !
जन्म-दिन पर मेरे उन्हें ही सजाना ||

जश्न सारे दिन .....हम खूब मनाएँ |
केक काट..गुब्बारों संग ही उड़ जाएँ ||

निर्द्वन्द आकाश की ओर बढ़ते जाएँ |
संग बादलों के ...हम खूब बतियाएँ ||

सारा जीवन हम ... यूँ ही मुस्काएँ |
नई उमगं-नई सोंच ... हम अपनाएँ ||


डॉ. सरोज गुप्ता 
चल उड़ जा

हमारी आजादी के गुब्बारे चल उड़ जा !
गिन ला दूर गगन के तारे चल उड़ जा !!

हमारे स्वप्न हुए आज सब के सब पूरे !
खुशियाँ बाँट सारे जहाँ में चल उड़ जा !!

झूठी वाह -वाही का नशा चंद मिनटों का !
दवाब में न आ जाना हवा के चल उड़ जा !!

हम दीवाने फक्कड़ पांच रूपये की हैं हस्ती !
आवारा बादलों से कर ले मस्ती चल उड़ जा !!

रंग-रूप सबका ढल जाएगा एक न एक दिन !
तू है साक्षी रंग भरे जीवन का चल उड़ जा !!

दुर्जन बिठा न दे प्रेम पर कहीं पहरे घनेरे !
तू पैगाम लेकर प्रेमी- हंसो का चल उड़ जा !!

मित्र-वेष में दुश्मन निकाले तलवार म्यान से !
तू संदेश -वाहक बन जा मैत्री का चल उड़ जा !!



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Tuesday, July 30, 2013

27 जुलाई 2013 का चित्र और भाव



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
~मेरे दोस्त - मेरे दुश्मन~
मित्र बन कर पीठ पर वार करते है
देकर फूल कांटे राह में बिछा देते है
बात अपनी लेकिन दूसरो से करते है
बन दोस्त दुशमनी का व्यापार करते है
मुंह में राम - राम बगल में छुरी रखते है
कल बीता बदल गया, हम आज में रहते है
जीत कर विश्वास मित्रो को अलग करते है
जानते है लेकिन भरोसे पर ही एतबार करते है
संभल जाना 'प्रतिबिंब', ये अब बनी रिवायत है
देता जख्म जमाना, जमाना ही करता शिकायत है


भगवान सिंह जयाड़ा 
बना के दोस्त ,पीठ पर बार न करना कभी ,
दे कर फूल दोस्ती का,कांटे न बिछाना कभी,

ऐतवार करते है तुम पर,धोखा न देना कभी ,
दोस्ती को दुश्मनी में न, ऐसे बदलना कभी ,

दोस्ती की तो,दिल दोस्त का न तोड़ना कभी ,
सुख दुःख में दोस्त से ,मुख ना मोड़ना कभी ,

अगर दोस्ती में ऐसा मुकाम, गर आये कभी ,
दिल पर हाथ रख ,एक बार सोच लेना सभी ,

बना के दोस्त ,पीठ पर बार न करना कभी ,
दे कर फूल दोस्ती का,कांटे न बिछाना कभी ,



बालकृष्ण डी ध्यानी
बेवफा दोस्त

दोस्त ने किया ऐसा काम
दोस्ती को किया बदनाम

देता रहा मै दुहाई
दोस्त, साथी मेरे भाई

गुल दोस्ती का मुरझा सा गया
पीठ पर दोस्ती का खंजर भोंका गया

अजनबी बना रहा वो सहचर
अगवा हुआ मै दोस्त हर मौड़ पर

सारांश दोस्ती का इतना हुआ
धोखा ही दोस्ती पर जख्म हुआ

जज्ब अब दोस्ती का सिमटा जाता है
हर कोई अब अनजाना नजर आता है

भेदिया, जासूस वो लंगोटिया यार निकला
बेवफाई का वो तो सौदागर निकला

दोस्त ने किया ऐसा काम
दोस्ती को किया बदनाम

देता रहा मै दुहाई
दोस्त, साथी मेरे भाई


डॉ. सरोज गुप्ता 
दोस्त !
याद है वो दिन
जब तुमने दिए थे
गुलाब के फूल
मुझे चुभे थे तब भी
बहुत शूल ,
तुम्हारे सहलाने से
हो गयी थी मैं कूल
समझ गई थी
दोस्ती का मूल-
प्यार ......प्यार !

दोस्त !
तुम हो क्या वो ही
चला आज खंजर
खून्नम-खून किया
देखो प्यार का मंजर
कर रहे दोस्ती की जमीं
बंजर .......बंजर !

दोस्त !
सामने से ली होती जान
यह जमीं यह आसमाँ
होकर तुझ पर मेहरबान
करते फूलों की वर्षा !
सुदामा और कृष्ण के किस्से
दोहराए जाते आज पुन:
एक मुट्ठी चावल जो दिए थे
उस पर कर देती अपनी जान
कुर्बान ........कुर्बान !

दोस्त !
तुम्हारे कहने से पहले
झाँक रही हूँ मैं भी
अपने ही गिरेबान
तुझे कहकर शैतान
मैं बन रही हूँ भगवान !
ताली एक हाथ से कभी
नहीं बजा करती ,
मैं रखूंगी तेरे ताप को सम्भाल
जब तक बर्फ सा तेरा मन
नहीं हो जाता -
पानी .........पानी !!


K Shankar Soumya .
धोखा प्यार फरेब के, अपने-अपने रंग।
आज सभी किरदार में, मिलते हैं ये संग।।
मिलते हैं ये संग, हुआ अचरज है भारी।
सत्य लगे अब झूठ, बनावट दिखती प्यारी।।
कहते हैं कवि 'सौम्य', मिला उसको ही मौका।
जिसने पल-पल छला, दिया अपनों को धोखा।।


नैनी ग्रोवर
मैंने दिए थे फूल तुझे, तू वार मेरी पीठ पे करता रहा,
मैंने पल-पल दिया साथ तेरा, तू चालें दुश्मन सी गड़ता रहा..

हैराँ हूँ मैं, हैराँ है दिल मेरा, ये तू ही है या और कोई,
मैंने दी दोस्ती की खुशबु तुझको, तू ज़हर बन के बिखरता रहा..

मैं बुनती गई दिन रात, प्यार के धागों से हमारी दुनियाँ, ,
ना जाने कब और क्यूँ, ये विश्वास का रिश्ता उधड़ता रहा ..!!


अलका गुप्ता 
बढ़ चले कदम यूँ ही वीरानों की तरफ |
खो रही थीं राहें अंधेरों में ....हर तरफ ||

डराते रहे साए से हादसों के फलसफे ...
बेबस सी खौफ में डूबी रही इक तडफ ||

बरगलाते हैं स्याह ये ...शैतानी आगाज़ |
मचाते रहे कत्ले आम बेरहम हर तरफ ||

बचा कर... इंसानियत को ...ऐ खुदा !
दिखा दे किरन..आस की.. हर तरफ ||

आवाद कर... 'अलका ' ... इक हौसला |
चेहरा.. अमन का ..मुस्करा दे हर तरफ ||

जगदीश पांडेय 
किया दोस्ती को तुमनें हलाल
फिर भी है क्यूँ मन में मलाल
मिली ये शोहरत कैसे तुम्हे
ता उम्र खुद से करोगे सवाल
हर मोड पे है दोस्ती निभाया हमने
जिसे आज तक न समझ पाया तुमनें
किया वही तुमनें जो कहा है सब नें
ये कैसी सजा आज दिया है रब नें

Chander Mohan Singla 
सोचता हूँ खोल लूं ,मैं भी तमंचों की दुकान ,
फूल मेरे शहर में बिकते नहीं हैं अब जनाब |
सुर्ख रंग अब फूल का लोगों को भाता ही नहीं ,
खून के रंगों से ही अब खेलते नित होलियाँ |
किस कदर था प्यार भाइयों में दीवारें थी कहां ,
तू है हिन्दू ,ये इसाई, वो है सिख ,मै मुसल्मा ||


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Friday, July 26, 2013

25 जुलाई 2013 का चित्र और भाव




Janak M Desai .
हाँ, एहसास है अब, यह जीवन भी एक यंत्र है ,
तालमेल से चलता है तो लगता है एक तंत्र है ;
आधुनिक से जर्जरित होकर चला भी जाएगा ,
जाने से पह्ले जीना कैसे, वो जैसे एक मंत्र है |

Pushpa Tripathi 
- एक था टेलिग्राम .....

था एक टेलिग्राम कोई
वह बातूनी सा यंत्र है
संदेश आखर भर
त्वरित खबर भर
मानव अविष्कारी मंत्र है l

छोटी बातों में
नयाब असर है
इक जादू सा ढंग है
ब्रटिश जमाना था
एक खजाना था
तार तुरंत का अंत है l

जमाना बदला
ढंग सब बदले
रंग नए प्रचलित हुए
मोबाईल ने ले ली
जगह है बदली
हाथों हाथों में तंत्र है l


Chander Mohan Singla 
तार तार हो गयी तार ,
सुख -दुःख वो बतलाती थी |
मन घबराता देख तार को,
पर खुशियाँ दे जाती थी ||


अलका गुप्ता 
बीत गया ... वह लम्हा हूँ |
कभी ख़ुशी ... कभी गम हूँ |
मैं तार था .. बेतार कभी ..
आज ऐतहासिक संचार हूँ ||


जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
तार....

आता है वो जाता है,
जहां है उसका धाम,
आया था और चला गया,
तार कहो या टेलीग्राम...

मोबाईल ही बन गया,
कैसे उसका काल,
जब किसी का मन करे,
पूछो परिजनों का हाल.....

लाता था डाकिया जब,
घबराता था मन,
हो गया अल्विदा आज,
हृदय से उसे नमन....


भगवान सिंह जयाड़ा
तार हो गया अब बेतार ,
यादो में रहेगा बेसुमार ,

लाता था कभी खुशिया,
कभी दुख दर्द की खबर,

नयाँ दौर नई तकनीकी ,
क्यों पल का इन्तजार,

इस लिए अलबिदा अब ,
आज तार का इन्तजार,

फिर भी इतिहास कहेगा ,
तार था कभी एक आधार ,

अपनों के दुःख दर्द में जब,
जानने हम रहते थे बेकरार,

तार हो गया अब बेतार ,
यादो में रहेगा बेसुमार ,


किरण आर्य 
टेलीग्राम है आया
आया आज एक तार

सुनते ही दिल लगता था
बल्लियों उछलने हज़ार

कभी लाता था खुशियाँ अपार
कभी सुनाता दुख का समाचार

आह वो तार अब हुआ है बेतार
बीते ज़माने सा वो साधन संचार

लील गई उसे विकास की बहार
पहना दिया उसे फूलो का हार

मोबाइल इंटरनेट का है बाज़ार
मिनटों में पहुचे हर समाचार

पर भूल ना पायेंगे तुम्हे ए तार
तुम्ही तो थे पहले साधन संचार


बालकृष्ण डी ध्यानी 
टेलीग्राम

बस आज तक
जो था कल तक
उस १६० साल की सेवा को
मेरा सलाम

अंतिम तार
राहुल के नाम
यू.पी.ये. के दिन
अब रह गये चार

तू भी ना सह पाया
अपनों का ये साथ
अकेला ही पड़ा रहा
तू कितने साल

याद जब आयेगा
खुशी और गम में तू
कभी हंसायेगा
कभी रुलायेगा

अलविदा ..अलविदा
वो टेलीग्राम
आखीर तूने भी
साथ छोड़ दिया आज


जगदीश पांडेय 
गुजर गया वो हसीन लम्हा
जब तार आया करता था
कभी लाते संग गम के आँसू
कभी मुस्कान समाया करता था

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~सलाम टेलीग्राम~

सेम्यूल मोर्श की सोच ने विश्व को दी थी ये नई सौगात
दूर संचार में हुई क्रांति, जब टेलीग्राम का हुआ अविष्कार
२४ मई १८४४ को पहला टेलीग्राम वासिंगटन से बाल्टीमोर
संक्षिप्त में हर खबर पहुँचाने का फिर देश में हुआ विस्तार

छुट्टी आना हो, नौकरी मिलना हो या फिर हो कोई भी अवसर
टेलीग्राम से ही मिलता था तुरंत ही खुशी गम का हर समाचार
१६३ साल की संस्कृति को अब सदा के लिए लग गया विराम
इतिहास हुए अब मशीन की वो टूक-टूक-ट्रा, तारबाबू और तारघर

नई तकनीक का आना और फिर उसका यूं हमें विदा कहना
समझा गया हमें, जिन्दगी और रिश्तो का भी हाल यही होगा
चला गया उसे जाना था 'प्रतिबिंब', नई सोच को स्थान दे गया
अब म्यूजियम की शान बनेगा, टेलीग्राम तू हमें सदा याद रहेगा



नैनी ग्रोवर 
क्या ज़माना था,
बड़ जाती थी धड़कन दिल की,
जब आता था तार,

इक्कठा हो जाता था,
सारा मौहल्ला, जब आता था तार,
अरे क्या हुआ,क्या हुआ,
गूंजती थीं आवाज़े,
लगते थे सभी अपने,
जब आता था तार,

अब तो किसी को,
किसी से मतलब ही नहीं,
हर किसी की जेब में,
दो दो मोबाइल पड़े रहते हैं,
अपने ही अपनों से बात करने को,
तरसते रहते हैं,

अब हो गए बेमानी रिश्ते,
खो गए वो संस्कार,
अब नज़र ना आयेगा,
देख बदलती दुनियाँ ने,
रुखसत कर दिया है तार__!! 


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