Monday, April 29, 2013

प्रतियोगिता चित्र - 26 अप्रैल 2013




26/04/2013 का ये चित्र एक प्रतियोगिता है. शर्त :
मित्र [महिला और पुरुष] इसमें स्वयं को विपरीत वर्ग में रख अपने भाव प्रस्तुत करंगे यानि महिला मित्र पुरुष के भावों को स्थान देंगे और पुरुष मित्र महिला के भावो को स्थान देंगे. 





Rohini Shailendra Negi .. 
काश मैं अपना भी रण-कौशल,
युद्ध-भूमि मे दिखलाता,
और विजयी होकर फिर अपना,
अंग-अंग मैं मुस्काता,
तब मैं नज़रों से कुछ ऐसे,
पल को खोज रहा होता,
मंत्र-मुग्ध हो जाये दिल,
ऐसे रस मे डूबा होता...!

Neelima Sharrma  [ पुरुष रूप में इस चित्र पर श्रेष्ठ भाव ]


एक ज़माना था यारो !
महारानी लक्ष्मी बाई का
मर्द बनकर लड़ गयी थी
पर नारी जैसे लज्जा भी थी

एक ज़माना था यारो
राजे रजवाडो की रानियों का
खूबसूरती/ सादगी कमाल की
शर्म-ओ-हया की लाली भी थी


एक ज़माना था यारो
मेरे गाँव में बसी ग्वालानो का
हाथ में हसिया दुसरे में पल्लू
पर कर्मठता गजब की थी

अब जमाना हैं यारो
सनी लिओन और मल्लिका का
न लज्जा हैं , न शर्म न कर्मठता
बस बेहूदगी बेहयाई बेहिसाब की हैं

कैसे कहदेते हो यारो अब
पुरुष बेइमान हो गये
माँ - बहन की तरह कैसे देखे
किस्सा कहानी भी अजब सी हैं

दीपक अरोड़ा 
हां, नारी हूं, मेरे रूप अनेक
पर दिल है मेरा हिन्दोस्तानी
जहां जरूरत पड़ी तो लडी खूब मर्दानी,
जरूरत पड़ी तो चूल्हे चोके में बिता दी जिंदगानी
जरूरी समझा तो घूंघट में रही छिप कर,
हुई मजबूरी तो उतरना पड़ा जन्मजात रूप लेकर
हां, नारी हूं, मेरे रूप अनेक
पर दिल है मेरा हिन्दोस्तानी...

नैनी ग्रोवर 
जिस राह तू चले नारी,
वह राह समाज की राह बने,
कभी बने, खुशियों की किलकारी,
कभी दुखों में, मेरी हमराह बने ..

तू झांसी की रानी बनके,
लड़ती है जब तूफानों से,
मन गद-गद मेरा हो जाता है,
भर जाता, तेरे एहसानों से,
लड़ते-लड़ते जब त्यागे प्राण,
हर सीने की कराह बने ..

जिस राह तू चले नारी,
वह राह समाज की राह बने ...

बनके ग्रहणी तूने जो प्रेम किया,
उससे जला मेरे वंश का दिया,
तुझे नमन बार-बार करता हूँ,
तूने बन मीरा, प्रेम ज़हर है पिया,
कभी थक जाऊं जो जीवन से मैं,
तू प्यारी सी एक सलाह बने ..

जिस राह तू चले नारी,
वह राह समाज की राह बने ...

मेरे काँधे से मिला कर कांधा,
हर पल साथ तूने दिया है मेरा,
कभी बनी कल्पना, कभी सुनीता,
हुआ और भी प्रेम गहरा मेरा,
कभी भटकूँ जो राहों से मैं,
तू भोली सी परवाह बने..

जिस राह तू चले नारी,
वह राह समाज की राह बने ...

तारों से आगे निकल चाहे,
छू ले सारा ब्रम्हांड तू,
बस भूलना मत इस जग के लिए,
करती रही कितने बलिदान तू,
कहीं ऐसा ना हो नई सभ्यता में,
ये मंदिर सा पावन तन तेरा,
चंद भेदियों की नज़र में,
इक मदभरी आह बने..

जिस राह तू चले नारी,
वह राह समाज की राह बने ...!!


Jagdish Pandey 
हम नारियों का अस्तित्व
कहाँ किसनें कब माना है

कभी समझा पैर की जूती
कभी शोभा सेज की जाना है
पलट के देखो स्वर्णिम पन्ने
इतिहास में भरी कहानी है
नारी ही थी रानी लक्ष्मीबाई
रँण में लडी खूब मर्दानी है
फिर भी -
हम नारियों का अस्तित्व
कहाँ किसनें कब माना है

माथे पे बिंदिया हाँथ में कंगना
सम्हाला हमनें घर और अंगना
हर हाल में बीते जीवन अपना
साथ न छोडा कभी तेरा सजना
फिर भी -
हम नारियों का अस्तित्व
कहाँ किसनें कब माना है

तारों का जहाँ भी अछूता हमसे रहा नही
सुनीता,कल्पना, नाम जग में है छुपा नही
मजबूरी में तन से कपडे कम करना पडा
मन की पीडा को कभी किसी से कहा नही
फिर भी -
हम नारियों का अस्तित्व
कहाँ किसनें कब माना है
कभी समझा पैर की जूती
कभी शोभा सेज की जाना है


बालकृष्ण डी ध्यानी 
नारी हूँ मै

कोमल कली हूँ मै
क्या नाजों से पली हूँ मै
नारी हूँ मै ...........

बेटे की चाहत में
दूर कंही दूर खड़ी हूँ मै
नारी हूँ मै ...........

किसी की माँ
किसी की बेटी, किसी की पत्नी हूँ मै
नारी हूँ मै ...........

तीन रिश्तों में
तीन भागों में बराबर बांटी हूँ मै
नारी हूँ मै ...........

तीन रंगों में हरदम
यूँ ही अकेले सजी हूँ मै
नारी हूँ मै ...........

चारों तरफ हर तरफ
ऐसे ही टूट कर बिखरी हूँ मै
नारी हूँ मै ...........

चूल्हे ने कभी
तो कभी अपनों से जली हूँ मै
नारी हूँ मै ...........

फंदे में झुला दी गयी
अपनों के लिये अपने को भूल गयी
नारी हूँ मै ...........

पूछती हूँ खुद से
क्या नारी होना एक अपराद है
नारी हूँ मै ...........

फिर क्यों ऐसे
समाज के दोहरे मापदंडों मापी हूँ मै
नारी हूँ मै ...........

कोमल कली हूँ मै
क्या नाजों से पली हूँ मै
नारी हूँ मै ...........


भगवान सिंह जयाड़ा 
मुझे अबला मत समझना जग वालों ,
मैंने सबला हो कर जग को दिखाया है ,
बिरांगना लक्ष्मी बाई ने क्या लड़ी लड़ाई,
जिसने अंग्रेज सरकार की नीद उड़ाई ,
धैर्य और शाहस का रूप ,मै जोधा बाई ,
ऐसी कई बीरांगना है ,मुझ में समाई ,
गाँव की कर्मठ और हँसमुख मै ही हूँ ,
दिन रात मेहनत और मजदूरी करती हूँ ,
दुःख और तकलीफें भी सदा झेलती हूँ,
फिर भी सदा जीवन में खुश रहती हूँ ,
मैं प्यार और ममता की मूरत भी हूँ ,
इसी लिए जग में ,मैं माँ कहलाई ,
माँ ,बहिन ,बेटी ,पत्त्नी सब मेरे रूप ,
मै हूँ प्यार और ममता की सुहानी धूप ,
मैंने कंधे से कंधा पुरुषों संग मिलाया ,
हर छेत्र में दुनियाँ से ,लोहा मनवाया ,
रंग मंच आज मेरे बिन सब है अधूरा ,
दुनिया का कोई काम नहीं बिन मेरे पूरा ,
बस मेरे कुछ ऐसे रूपों से मै शरमाती हूँ ,
ऐसी काया से जब जग को भरमाती हूँ ,
बस मुझे इस रूप से आती है लज्जा ,
इस रूप की मिलनी चाहिए मुझे सजा ,
बस लाज और आबरू हो मेरा गहना ,
मुझे जुल्मो सितम अब नहीं है सहना ,
आज दुनिया के सब पुरुषों, मै कहती हूँ ,
अबला नहीं सबला हूँ ,जुल्म क्यों सहती हूँ ,
जब तक नारी का इस जग में नहीं सम्मान ,
तब तक समझो यह सारा, जग है अज्ञान ,


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल   [ महिला रूप में इस चित्र पर श्रेष्ठ भाव ]

~हमें दिखलाना है ~
अबला और सबला का, आओ अब ये खेल ख़त्म करे
लोगों के बहकावे में आकर, न हम खुद को नीलाम करे
हम ही है सावित्री, दुर्गा, सीता व लक्ष्मीबाई, ये याद करे
दिया हमने ही जन्म भगत सुभाष को, इतना ध्यान करे
हम ममता, शक्ति और त्याग की मूरत है, ये विश्वास करे
सामान नही आवाज़ है आओ मिलकर अब ये एलान करे

हर क्षेत्र में लग्न व् मेहनत से हमने लोहा मनवाया है
निभा जिम्मेदारी घर की, राज काज में हाथ बंटाया है
परिवर्तन संग हर परिस्थिति में भावों की बलि चढ़ाई है
जो था कभी असंभव उसमे भी पहचान अपनी बनाई है
पाकर प्रेम पिता व् भाई का, पति को प्रेम सिखलाया है
देकर जीवन साँसों का, माँ का ये रूप हमने ही पाया है

हाँ सच है, केवल नाम, पैसे और शौहरत की खातिर
कुछ लोगो ने आज लाज और शर्म भी बेच खाई है
आज़ादी के नाम पर हमारी सभ्यता से खेल जाते है
खुद को बेचकर येसे लोग हमें बदनाम कर जाते है
तन और मन की नग्नता का खुला प्रसार करते है
सच कहूँ येसे कृत्य हमें कई बार शर्मसार करते है

लज्जा हमारा गहना है, अपमान कोई न अब सहना है
नर और नारी का भेद मिटा, सबके साथ हमें चलना है
है कोई मतभेद हमारे बीच गर मिलकर उसे सुलझाना है
आधार शिला हम परिवार की, फिर से हमें दिखलाना है
कमजोर नहीं, लाचार नही हम, दरिंदो को ये बतलाना है
गंदी नज़र वालो और हैवानो को अब सबक सिखलाना है


Govind Prasad Bahuguna 
मै झांसी से आई लक्ष्मी बाई
लेकिन रानी नहीं हूँ बाई हूँ
अपनी मेहनत का कमाती-खाती हूँ
अबला नहीं हूँ,किसी का क्या खाती हूँ
छू कर तो देखो, मैं वही लक्ष्मीबाई हूँ II
देखो तो मैं कैसी लगती हूँ
अल्ल्हड़ की मुस्कान में मस्त लगती हूँ
हीरोइनें पानी भरती हैं मेरे सामने
देहाती कपडे पहनकर भी देहाती नहीं लगती II
क्या मैं तुमको राजकुमारी नहीं लगती ?
गोरी उजली शांत और संभ्रांत
अपने ही सुख- दुःख में कैद
जैसे फोटो फ्रेम के अन्दर जड़ी कोई अकेली एकांत II
कपडे नहीं, मै तो शरीर ओढती हूँ
शरीर भी एक वस्त्र है क्योंकि यह अब एक अस्त्र है
निर्मम प्रतियोगिता में जीने का,
कुटिलों और शोषकों की बुद्धि ठगने का
लेकिन परोपजीवी,शरीरजीवी, भोगजीवी नहीं
मै श्रमजीवी,आत्मजीवी और बुद्धिजीवी हूँ I I


सुनीता शर्मा 
नारी तुम मेरे जीवन संगिनी नही प्राण उर्जा हो ,
तुम्हारे हर अक्ष का मैं सदा ऋणी रहा और रहूँगा,
सीता, सावित्री,अहिल्या ,कुंती ,द्रोपदी,गांधारी या हो कोई व्भ्याचारिणी ,
सब रूपों को पाने का मैंने साहस दुस्साहस किया,
तुमने दया की सम्बल बन सदा मेरा सत्कार किया,
तुम सब रूपों में बनी भारतीय संस्कृति की परिचायक ,
मेरे मरने पर तुम कभी रणचंडी ,कभी सती कहलाई ,
मेरे हर जुल्म को तूने सहर्ष स्वीकार किया ,
मद मैं चूर मैंने तेरा कभी सम्मान कभी अपमान किया ,
मैंने तेरे तीन रूपों को सदा पूजा और पूजता रहूँगा ,
पर आज मै और मेरा अस्तित्व तेरी नजरों में क्यूँ गिर गया ?
अपने अस्तित्व की लडाई में तूने मेरा तिरस्कार किया ,
बसनो को कम करना, मर्यादा की सीमा लाँघना क्यूँ तूने सीख लिया ?
हम हैं महान अपनी सारी संस्कृति गौरवशाली है ,क्यूँ तूने इसे खंडित किया ?
पाश्चात्य संस्कृति को अपनाकर तूने माँ दुर्गा का अपमान किया ,
आज गाली स्वरूप लगती नारी जबसे तूने मदिरा पान किया ,
नग्नता की सीमा लांघकर तूने क्या गौरव शोहरत हासिल किया ,
तेरी इस भूल आज बन गयी अभिशाप हर माँ बहन बेटी पर ,
जैसा बोते वैसी फसल कटे कैसे तू इस मन्त्र को भूल गयी ,
मुझ पर आरोप लगा लगाकर तूने मुझे मजबूर किया ,
आज मुझे दुर्योधन बना गली गली क्यूँ अपमानित कर रही ,
देह श्रृंगार की तेरी पिपासा की मर्यादा तूने ही तो भंग किया ,
आज मैं और मेरा आचरण जाने क्यूँ विभस्त हुआ ,
आ चल बैठ पास मेरे ,अपने अपने मन की बात कहें
संस्कृति की मर्यादा को फिर से नव जीवन दान दें ,
जीवन सुख दुःख की गाडी नहीं चलती एकाकी ,
कुछ मैं बदलूँ ,कुछ तुम सुधरो ,जीवन नवीन करें ,
तुम मेरी धडकन ,तुम ही मेरा जीवन श्रृंगार हो ,
तुमारे लिए अब भी राँझा ,और तुम मेरी हीरी हो ,
राधा रुक्मणी स्वरूपा तुम सदैव मेरी अराध्य हो ,
तुमसे मेरा जीवन ,तुम धरा की अनमोल संगिनी ,
नए इतिहास निर्माण में त्यागकर अपना कलुषित व्यवहार ,
आओ मिलजुलकर भारतीय संस्कृति का नव निर्माण करें !


अलका गुप्ता 

डर गया हूँ मैं....... इस संस्कृति के ह्रास से |
निशदिन तेरी मर्यादा के इस महा विनाश से |
तेजस्वनी सी बन दुर्गा.. लक्ष्मी.. चंडी बन ...
कर उपचार तू ही हर शोषण का आत्मबल तेज से ||

मुझे पता है.......तेरा हर कर्मठ रूप सदा से |
माँ बेटी बहन प्रिया पत्नी आत्मीय रहे सदा से |
हर रूपों में तेरा .......हर अंदाज निराला है .....
इसी रूप में मिलजुल हमने हर रिश्तों को पाला है ||

हाय ! नजर यह कैसी .....लगी पाश्चात्य की |
संस्कार देवी !.....बच ना पाई इस आघात से |
बंधन से लगने लगे... अब जो ....संस्कार भी |
तन भी उघड़ने लगे अब विज्ञापन के बाजार में |

डर लगता है अब इन बहकी-बहकी हवाओं में |
आजा समेटकर सहेज लूँ लाडो तुझे आगोश में |
घूमते हैं भेडिए बाहर हमशक्ल नोचने को घात में |
भौतिकवादी युग है भरोषा भी बिक गया बाजार में ||


किरण आर्य .
हे नारी तू स्नेहमयी त्याग की प्रतिमूर्ति है तू
तुझसे पूरक जीवन तुझ बिन मैं अधूरा ही रहा
धेर्य लज्जा ममता प्रेम से सुसज्जित तू

तुझ बिन जीवन मेरा मझधार में बहती नैया सा
वक़्त बुरा जो आ जाए रणचंडी बन जाए तू
झाँसी की रानी हो या कित्तूर की रानी चेन्नमा

दुष्टों का संहार करने को उद्धत रहती सदैव तू
दुर्गा भी तू सीता भी तू है प्रेम की स्नेहमूर्ति तू
जीजाबाई सी माता बन शिवाजी को बनाये सिंह तू

घर में हो या बाहर करती कर्तव्य का निर्वाह तू
संस्कार और संस्कृति की है हमारे संवाहक तू
अबला कह तेरी ताक़त को नकारता आया ये जमाना
क्यों इसने तेरी ताक़त का सही मोल ना आँका हाय रामा

प्रगति की राह पे चलती निर्भय सजग सशक्त सी तू
आधुनिकता की आंधी हाय क्यों बहा ले गई विवेक तेरा
देह प्रदर्शन सस्ती लोकप्रियता रह गई देह मात्र सी तू
विकृत सी मानसिकता जिसने मन सुंदरता को ना जाना

बना भोग्या हाय तुझे वजूद मेरा कटघरे में किया खड़ा
टूटन तेरे अस्तित्व की तोड़ गई मुझे भी हाय कहीं
तेरी नज़रो का संशय भय से भरा क्यों लगता ना मुझे सही

मैं अलग कहाँ तेरा हिस्सा हूँ वजूद का तेरे किस्सा हूँ
माँ भी तू प्रिय भी तू बहन, सहचरी, सखी, बेटी भी है तू
अपने हिस्से का धेर्य हमें मिलजुलकर ही है फिर पाना
प्रतिद्वंदी नहीं एक दूजे के पूरक बन साथ है निभा जाना

अपने मन आक्रोश संताप को अपना अस्त्र है बनाना
तू बन सबल मैं साथ खड़ा ये वादा तुझसे है सखी मेरा
हे नारी तू स्नेहमयी त्याग की प्रतिमूर्ति है तू
तुझसे पूरक जीवन तुझ बिन मैं अधूरा ही रहा


डॉ. सरोज गुप्ता ......
नारी तुम्हारी सदा जय -जय -जय !
बदले यह रूप तुमने जय जय जय !!

लक्ष्मी बाई जैसी योग्य हो तुम
माँ सीता जैसी आरोग्य हो तुम
लता जैसी सुर सम्राज्ञी हो तुम
कल्पना से भरी हुई उड़ान हो तुम

नारी तुम्हारी सदा जय -जय -जय !
बदले यह रूप तुमने जय -जय -जय !!

इंदिरा गांधी जैसी चट्टान हो तुम
शिवाजी की माँ जीजाबाई हो तुम
तू हंस कर बनी मेरी भी भोग्या
मैंने ही किया तेरे रूप को स्याह -स्याह

नारी तुम्हारी सदा जय -जय -जय !
बदले यह रूप तुमने जय -जय -जय !!

मैं हूँ खड़ा तेरे सामने हाथ जोड़
मुझसे कभी न तू मुंह लेना मोड़
तू हैं ईस्वर का सबसे अनोखा वरदान
जान देकर भी बढ़ाऊंगा तेरा मैं मान !

नारी तुम्हारी सदा जय -जय -जय !
बदले यह रूप तुमने जय -जय -जय !!
12 hours ago · Edited · Unlike · 8


[ प्रतियोगिता समाप्ति के बाद आई रचना ]
Bahukhandi Nautiyal Rameshwari 
सौम्य, पावन हृदया तू ....
पुरुष जीवन का मान सम्मान तू ..
कोमल तन आकाश सही .
कोमल मन सही ..
यम से हर ले प्राण तू।
उज्जवल रूप रंग ..
हाड मॉस का लोथड़ा भर नहीं तू ..
क्यूँ वहशी गिद्ध निगाह गाड़े खड़े ?.
लज्जा रहती है जिन नैनो में ..
उन नैनो मैं तेज़ाब भर तू ...
अब दौर नहीं घूंघट का ..
छोड़ दामन पनघट का ..
नीर बहुत बहा चुकी तू ..
कल्पना का आकाश, राह ताके तेरी ..
उन्मुक्त, स्वछंद उड़ान भर तू ...
बहेलिये खड़े जो, गर राह हो तेरी ..
जो समझे ना तेरी ह्रदय पीर ..
लोह भर ह्रदय, हाथों में उठा शमशीर ..
जीवन रणभूमि मान तू ..
अपनों में, गैरों में ..
दुश्मन को पहचान तू ....


परिणाम  

मित्रो सदस्यों २६ अप्रैल २०१३ की चित्र प्रतियोगिता में दोनों आदरणीय निर्णयाक श्री बहुगुणा जी एवं डॉ सरोज जी ने जो भाव चुने है उन्ही के शब्दों में उनको धन्यवाद देते हुए आपके समक्ष रख रहा हूँ :

Govind Prasad Bahuguna
तस्वीर क्या बोले -प्रतियोगिता परिणाम(केवल महिला प्रतिभागी )
प्रस्तुत प्रतियोगिता में नारी स्वरुप के ४ रंग- रूप दिए गए हैं जिसके अनुसार महिला प्रतिभागियों को पुरुष की भूमिका में स्वयम को रखते हुए अपनी प्रतिक्रिया कविता के माध्यम से अभिव्यक्त करनी थी I मेरी दृष्टि में चित्रों के अनुसार सटीक भाव संयोजन सुश्री नीलिमा शर्मा का रहा यद्यपि अन्य प्रतिभागी भी अपनी अभिव्यक्ति में किसी से कम नहीं हैं परन्तु कवि कर्म में भटकाव तो हो ही जाता है इसलिए उनकी रचनाएं अपनी जगह सराहनीय हैं I

नीलिमा शर्मा [ पुरुस्कृत ]
एक ज़माना था यारो !
महारानी लक्ष्मी बाई का
मर्द बनकर लड़ गयी थी
पर नारी जैसे लज्जा भी थी
एक ज़माना था यारो

निम्नलिखित प्रतिभागियों की कविता पंक्तियाँ मुझे बहुत अच्छी लगी किन्तु उनका सामंजस्य प्रश्नगत चित्रों से कुछ भटक गया था लेकिन इनकी भाव प्रस्तुति मनोहारी और प्रशंसनीय है, इन प्रतिभागियों की प्रविष्टियाँ अपना अलग स्थान रखती हैं, यहाँ जो क्रम दिया गया है उसे श्रेष्टता क्रम न माना जाय, केवल पढने के प्रयोजन से क्रमांक डाला गया है I
सुनीता शर्मा
1 "देह श्रृंगार की तेरी पिपासा की मर्यादा तूने ही तो भंग किया ,
आज मैं और मेरा आचरण जाने क्यूँ विभस्त हुआ ,
आ चल बैठ पास मेरे ,अपने अपने मन की बात कहें
संस्कृति की मर्यादा को फिर से नव जीवन दान दें ,

2 रोहिणी शैलेन्द्र नेगी
काश मैं अपना भी रण-कौशल,
युद्ध-भूमि मे दिखलाता,
और विजयी होकर फिर अपना,
अंग-अंग मैं मुस्काता,
तब मैं नज़रों से कुछ ऐसे,
पल को खोज रहा होता,
मंत्र-मुग्ध हो जाये दिल,
ऐसे रस मे डूबा होता...!
3 नैनी ग्रोवर
जिस राह तू चले नारी,
वह राह समाज की राह बने,
कभी बने, खुशियों की किलकारी,
कभी दुखों में, मेरी हमराह बने ..
4 अलका गुप्ता
डर गया हूँ मैं....... इस संस्कृति के ह्रास से |
निशदिन तेरी मर्यादा के इस महा विनाश से |
5 किरण आर्य
मैं अलग कहाँ तेरा हिस्सा हूँ वजूद का तेरे किस्सा हूँ
माँ भी तू प्रिय भी तू बहन, सहचरी, सखी, बेटी भी है तू
अपने हिस्से का धेर्य हमें मिलजुलकर ही है फिर पाना
प्रतिद्वंदी नहीं एक दूजे के पूरक बन साथ है निभा जाना
6 डॉ सरोज गुप्ता
नारी तुम्हारी सदा जय -जय -जय !
बदले यह रूप तुमने जय जय जय !!
___________________________
डॉ. सरोज गुप्ता
आदरणीय और प्रिय मित्रो !
सब रचनाएं काव्य -कौशल की दृष्टि से कमोबेश बहुत सटीक और सुंदर अहसास के साथ लिखी गयी हैं !सबका प्रयास स्तुत्य है !चित्र और कथ्य को मद्देनजर रखते हुए मन ,वचन से पूर्णता निष्पक्ष होकर प्रति जी की रचना को सर्वश्रेष्ठ घोषित कर रही हूँ ,मुझे विशवास है कि आप मित्रगण भी मेरे निर्णय से सहमत होंगे !भाव -प्रवाह ,विचार -सौष्ठव ,शब्द -सयोंजन ,लयात्मकता और शिल्प की दृष्टि से प्रति जी रचना सब काव्य के गुणों पर सम्पूर्ण खरी उतरती है !
जगदीश पाण्डेय जी को मैं विशेष बधाई देती हूँ जिनकी रचना ने मुझे विशेष लुभाया है !
प्रति जी की रचना की एक खासियत यह भी है कि समस्या जो हमारे सम्मुख मुंह बाए खड़ी है ,उसे दिखाया ही नहीं ,उसका समाधान भी प्रस्तुत करती है ....

प्रतिबिम्ब बडथ्वाल [ पुरुस्कृत ]
अबला और सबला का, आओ अब ये खेल ख़त्म करे
लोगों के बहकावे में आकर, न हम खुद को नीलाम करे
एक बार फिर प्रति जी को बधाई देती हूँ !



सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Thursday, April 25, 2013

25 अप्रैल 2013 का चित्रों और भाव




जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु 
"मैं भी उडूं"

पंख लगाकर उड़ने की,
पागल पंछी की तरह,
चाहत मन में ऐसी है,
निहारूं देश अपना,
उड़कर अनंत आकाश से,
देखूं धरती कैसी है।


मीनू मनस्वी ना जाने क्यों
'
ना जाने क्यों
आज ......
इन उड़ते पक्षियों
को देखकर
मन में आया
कि काश .........
उड़ चलूँ
मैं भी
स्वछन्द आकाश में
डोलती फिरूं
अनवरत
इन खगवृन्द
की तरह ..........
ना कोई रोके
ना कोई टोके
बस -------------
अठखेलियाँ
करती फिरूं
बादलों संग .....
'मनस्वी '.
छोड़ दूँ
ये ज़मीं
ये धरा
जहाँ उग आये हैं
दानव नागफनी की तरह


Rohini Shailendra Negi 
साँझ की बेला न ढल जाये,
रात कहीं फिर न घिर आए,
थक कर हारा समय का पंछी
चला है वापस ओढ़ के पंखी,
ढूंडे अपना स्वप्न बसेरा,
होगा कल फिर नया सवेरा...!


Jagdish Pandey 
आस जगी है आज मन में मेरे
मैं भी उड जाऊँ नील गगन में
तज के सारे निज स्वार्थ अपनें
नही जलना अब द्वेष अगन में
.
अकेले साहस न कर पाउँ शायद
संग में सब को ले चलना होगा
उडान हो चाहे जितनी भी लंबी
हर पल साथ हमें रहना होगा

.
औरों की भी है हमें रखना सोच
नही रहना केवल अपनें मगन में
आस जगी है आज मन में मेरे
मैं भी उड जाऊँ नील गगन में


बालकृष्ण डी ध्यानी 
मन उड़ चला

उड़ चला उड़ चला
मन उड़ चला
हवाओं की ओर
अनजाने दिशाओं की ओर
उड़ चला उड़ चला
मन उड़ चला .............

साथ साथी मेरा
ले अपनों का सहरा
पंख पर बसेरा मेरा
उड़ चला उड़ चला
मन उड़ चला .............

मीलों की उड़ाना
रास्ता अनजान है
कंहा सवेरा कंहा शाम है
उड़ चला उड़ चला
मन उड़ चला .............

उड़ चला उड़ चला
मन उड़ चला
हवाओं की ओर
अनजाने दिशाओं की ओर
उड़ चला उड़ चला
मन उड़ चला .............

भगवान सिंह जयाड़ा 
हम पक्षी है मन मौजी चाहत के ,
नहीं बंदिश हम पर यहाँ कोई ,
हम उड़े स्वछंद नील गगन में ,
हम को यहाँ रोक सके ना कोई

हम को सब दिशावों का है ज्ञान ,
कहां जाना है ,सब कुछ है ध्यान,
हम एकता का ,सब को पढाये पाठ,
अपने मन में सब यह, बाँध लो गाँठ ,
एकता की शक्ति तुम सब पहचानो ,
गन्तब्य को हमारी तरह तुम जानो ,
हम पक्षी है मन मौजी चाहत के ,
नहीं बंदिश हम पर यहाँ कोई ,



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ....
~नसीहत~
जीवन ये मिला अनमोल है
प्रकृति से हमारा मेल जोल है
प्यार के कहते हम बोल है
भाव से बनाए हमने घोल है

उड़ना हमारी फितरत है
मंजिल हमारी किस्मत है
एकता हमारी जरुरत है
मिलकर चले नसीहत है



सुनीता शर्मा 
विस्तृत नभ पर एक दूजे के हमनवा
उड़ते पंख पसार अपनी मतवाली टोली
हमारे हौसलों की उड़ानकी देखो खुशहाली
न भेद न मद और न कोई मतभेद
नयी उमंग लिए उड़ते संग संग
दुनिया की अजब ढंग देख हो रहे दंग
काश ये मूर्ख मानव हमसे जीना सीखे
नभ के खतरों से हम कैसे पाते छुटकारा
एक मूल मन्त्र अपना अनेकता में एकता
पुण्य पथ पर हर जीवन का मुल्य अनमोल
बिना इस दौलत के मानवीय ज्ञान बेमोल !


Bahukhandi Nautiyal Rameshwari 
नील उन्मुक्त गगन ..
पंख कोमल सही ..
ऊँची अपनी उड़ान ..
हौसलों पर अपनी हमें ..
तनिक ना अभिमान ...
हाँ ..मद हैं हम ..
क्यूँ ना हो? इंसान !
हमें अपनों की पहचान ....
अपनी धुन हमारी अपना२ साज़ ..
एक कौड़ी खर्च ना हो।।
जो छु आये गिरिराज़ ..
अपनी एकता पर ..
हर खग करे नाज़ .....


किरण आर्य 
उड़ान पंखों की हौसलों की
हाँ अनंत गगन राह कठिन
उड़ते जाना है सतत कर्म
मन के हौसले कब है हारे
मन में आस के दीपक
हाँ हमने आज जला डाले
कोई सीमा धर्म आये ना आड़े
सारा जहां है लगे है अपना
स्वछंद उड़े पंछी हम प्यारे
ईष्या घृणा ना मन में पाले
हम पंछी प्रेम के मतवाले
प्रेम का संदेश है देते जाते
गाकर प्रेम तराने हम
प्रेम का पाठ है जहां को पढ़ाते




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23 अप्रैल 2013 का चित्र और भाव




Govind Prasad Bahuguna 
क्यों नाच उठा ये मन मयूर
कम्पित उच्छवासें ले रही हिलोर
प्रतीक्षा है उनके आने की
मनसिज के मुस्काने की
भाव भंगिमा में बांधू उनको
अर्पित कर दूं साँसें उनको
वरदान नहीं है मेरी इच्छा
संग चलूँ मैं, मेरी पृच्छा


Jagdish Pandey 
कदम हैं मेरे थिरक रहे
मन भी कुछ है बहक रहा
कुछ करो हे जग के स्वामी
अंत:करण अब तडप रहा
.
तेरा गुंबद जितना उँचा है
मैं भाव से उतना नीचा हूँ
अंबर की इस छाया में ही
चमन छोटा सा सींचा हूँ
.
कर जोरे माँगू यही करतार
न उजडे किसी का घरबार
नृत्य करत यही विनती है
करो अब हरा भरा संसार


नैनी ग्रोवर 
आज झूम रही धरती, झूम रहा आकाश,
संग-संग मेरे नाच रहा, प्रेम का विश्वास..
हे हरी, विनती में करूँ दोनों हाथ जोड़ के,
संसार को दीजिये श्रधा और सबुरी की सौगात ...!!


बालकृष्ण डी ध्यानी 
नाच उठा

नाच उठा तन मन
अंगविक्षेप सजा आज है
नाचमंडली ना साज है
मयूर इनके बिना भी नाचे आज है

मंदिर के घंटे की तान है
साथ खड़ा नीला आसमान है
नाच-रंग की मधुर मुस्कान है
नृत्य ही प्रभु की साधना का सच्चा स्थान है

कोयल की बोली है जंहा
जंहा गाती बुल बुल सुरताल है
इस दौड़-धूप हुल्लड़ के बीच ही
बसा मेरा प्यार हिन्दुस्थान है

घुंघुरू की वो लड़ी
गजरे संग केशों में जड़ी
शिव आरधना का मान है
नृत्य का यंहा अलग ही मकाम है

सरगम पर थिरकते पैर
सात सुरों का वो मिलाप है
संगीत और नृत्य ही
जीवन की सही पहचान है

नाच उठा तन मन
अंगविक्षेप सजा आज है
नाचमंडली ना साज है
मयूर इनके बिना भी नाचे आज है


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
भक्ति अपने मन में लिए, शक्ति लिए तन में
पैर खुद ब खुद थिरक रहे, प्रभु तेरे आँगन में
वंदना तेरी करते, प्रफुल्लित होता मन ये
तेरी शरण में आते ही, देखो नाच रहा मन ये
इंसानियत दिल में उपजे, प्रेम आभूषण बने
बने प्रकृति प्रेमी ले तेरा नाम, येसे इन्सान बने


अलका गुप्ता 
मैं महिमा मंडित देवी,अबला कहलाऊं |
मैं ना कुपित हो...यूँ ही तांडव कर पाऊं |
मैं श्रृंगार प्रकृति का तुम हो आधार मेरा ...
हित में औरों के रत मैं औरत ही रह पाऊं ||

भाव भंगिमा हर मुद्रा में..मैं पारंगत हो जाऊं |
राग रच मधुर प्रकृति से ...नृत्य मैं बन जाऊं |
पांवों में घुंघुरुओं के इन झंकार सरस हो जाए ...
मन मन्दिर में मानव हे !संस्कृति खूब सजाऊं ||


Bahukhandi Nautiyal Rameshwari 
रह चरणों में देवता के ...
रही में प्रेम प्यासी ..
कभी महसूस करूँ बंधन ..
कभी घट घट वासी ..
कोई कहे जोगनी, कोई देवदासी ..

वही बसेरा मेरा ...
मंदिर शिवालों में ..
मदमस्त नृत्य करना चाहूँ ..
गोपियों ग्वालों में ..
पग बंधे घुँघरू मेरे ..
क़ैद रस्मों रिवाजों में ..
असंभव निकासी ..

अर्पित आजीवन ..
देव चरणों की दासी ..
ब्याहता देवों की ..
वर्जिता जीवन मेरा ..
देव स्पर्श को प्यासी



डॉ. सरोज गुप्ता
नाच एक पूजा
....................
मेरा तन रहा नाच ,
नाच मेरे मन नाच !
मेरा तन एक नाच ,
नाच मेरे मन नाच !!

मेरे मन में मन्दिर,
मेरा तन है मन्दिर !
नाच तो है एक पूजा ,
पूजा ही एक नाच !!

नाच मेरे मन नाच !
मेरा तन एक नाच !!

बाजे घंटियों की टंकार ,
मिल पायल की झंकार !
मेरे रोम रोम में साकार ,
तेरे रूप ने लिया आकार !!

नाच मेरे मन नाच !
मेरा तन एक नाच !!

मन्दिर का यह रोम -रोम ,
मेरे नाच का बना व्योम !
मेरी तपस्या का यह नृत्य ,
तेरी अनुकम्पा का है कृत्य !!

नाच मेरे मन नाच !
मेरा तन एक नाच !!



सुनीता शर्मा 
भारत की इस पावन धरा पर
मंदिरों में रोज होते कीर्तन भजन
नृत्य करती थी हर बाला होकर मग्न
मीरा , द्रोपदी और राधा की आस्था
हो रही अब हर रोज छिन्न भिन्न
कृष्ण जी की लीला से अनभिज्ञ
कर रही अब भोले नटराजन न्रत्य
अपने अस्तित्व को मिटता देख
हो गया हर बाला का आज व्याकुल मन



किरण आर्य 

शिव के प्रेम समर्पण में
पार्वती मन कोशिकी है करे

थिरकन से पैरों की भगवन
मन की हर भंगिमा है सज़े

आज ईष्ट मेरे तेरे चरणों में
ह्रदय अनुरागी मोरा राग रचे

अनुकंपा पर तोरी देव मोरे
तन मन मेरा थिरकने लगे

साधनारत तेरे द्वार पर
नृत्य में मोरा हर भाव सज़े



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Monday, April 22, 2013

21 अप्रैल 2013 का चित्र और भाव


(इस चित्र की पुनरावृति की है बस यह देखने के लिए या महसूस करने के लिए कि सोच में परिवर्तन लाया जा सकता है या आ सकता है )


Neelima Sharrma 
हौले हौले कदमो से चलती
मैं नन्ही चिड़िया
तेरे घोंसले की

उड़ना हैं मुझे
छूना हैं अनंत
आकाश की ऊँचाई को

मेरे नन्हे पंखो में
परवाज नही
हौसला हैं बुलंदी का

भयभीत हैं अंदरूनी कोन
आकाश भरा हुआ हैं
बड़े पंखो वाले पक्षियों से

सफ़ेद बगुले ही अक्सर
शिकार करते हैं
मूक रहकर

माँ मैं नन्ही चिरैया
कैसे ऊँचा उड़ पाऊंगी
इन भयंकर पक्षियों में

मैं कैसे पहचानू ?
यह उड़ा न के साथी
या दरिन्दे मेरी जात के

आसमा से कहो
थोडा ऊँचा हो जाये
मुझे उड़ना हैं अन्तरिक्ष तलक


बालकृष्ण डी ध्यानी 
उड़ता रहा मन
कभी पंछी बन
पंखों का ले सहारा
हवाओं ने उसे पुकारा

अब उड़ चला वो मन
उस दूर नील गगन
होकर वो अपने से मगन
उड़ा वो अपनो के संग

चिंता को तज कर
चल तू उस ओर चल
ना छुये कोई दर्द कभी
आ मेरे संग चल

उड़ता रहा मन
कभी पंछी बन
पंखों का ले सहारा
हवाओं ने उसे पुकारा


नैनी ग्रोवर 
किसी हरे-भरे गाँव में,
नीले गगन की छाँव में,
किसी घने पेड़ की डाल पे,
इक अपना घर बनायेंगे..

चुन-चुन कर लायेंगे तिनके,
अरमान करेंगे पूरे इस मनके,
कुछ तुम लाना कुछ हम लायेंगे,
प्यारा सा घर सजायेंगे..

मत थक ऐ साथी, हार मत,
माना के पंख हुए हैं पस्त,
नज़र आती नहीं मंजिल भले,
कोई राह तो पा ही जायेंगे ....!!



कवि बलदाऊ गोस्वामी 
पंछीयाँ,
मीठे तान सुनाकर,
सबके मन को भा कर,
उड रहीं पंछीयाँ।
नीले गगन में,
शान्त वायु मण्डल में,
पंख पसार,
उड रहीं पंछीयाँ।
मंदिर पर,मस्जिद पर,
गुरुद्वारा पर,चर्च पर,
बैठती,फिर उडती फिर बैठती और फिर उडती........
भेद-भाव त्याग कर,
खुले आकाश में,

उड रहीं पंछीयाँ।
उडने की,
चलने की,
चुगने की,
विचार करने की,
गति पाने से,
पंख पसार कर,
उड रहीं पंछीयाँ।
पवन के सग,
कवि की दिल मुग्ध कर,
उड रहीं पंछीयाँ।


किरण आर्य
दो मन अहसासों की उड़ान
आकाश में विचरते
एक दूजे संग .......

ना हो कम प्रीत का चलन
रूह से जुड़े अंतर्मन
एक दूजे संग .......

मुझमे रम बन धड़कन
वजूद पाए मन
एक दूजे संग ...........

ना हो अहम् बने जीवन
प्रीत का पंछी
एक दूजे संग ...........



अलका गुप्ता 
मैं हूँ .....मय का प्याला |
अहं है मद मस्त निराला |
डगर- मगर भटक रहा ...
विषय वासना दग्ध ज्वाला ||

उड़ता रहा चाहतों की उड़ाने पंछी बना |
मैं मन हूँ चंचल स्वार्थ का दावानल बना |
दौड़ता रहा मैं .....मृग-मरीचिका में ......
आशाओं का ...........कस्तूरी -मृग बना ||



सुनीता शर्मा 
प्रेम के हम सन्देश वाहक
धरती माँ के उन्मुक्त पंछी
अपनी विश्वाश की पूँजी
लेकर उड़ते नगर नगर
प्रेम औ विश्वाश की महिमा गाते
सुख दुःख में हमजोली बन जाते
गगन में थामे अहसासों की डोर
मानवीय विभस्ता से बेखबर
प्रेम के तिनको को जोड़कर
बुनते आशा औ विश्वाश का नीड
जिसमें समाएगा विश्व पीड
विशाल गगन सा विशाल अपना मन
रहेंगे एक दूजे के संग सदैव मगन


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल  
~अस्तित्व~
हाँ आज भी जारी है
अस्तित्व की लड़ाई
धरती पर भी और
आसमान में भी
हर कोई अपना वर्चस्व
बनाये रखना चाहता है
क्या मैं और क्या तू
कहीं कुछ भी हो
लड़ते हम कर
तू - तू, मैं - मैं


डॉ. सरोज गुप्ता 
आ चल अब उड़ जाएँ दोनों ,
अब ये देश हुआ है बेगाना !

अब कहाँ रहा वो मेरे नाम का चबेना,
जो बुला-बुला खिलाती थी अम्मा सुजेना !
देख-देख रीझती थी अपने घर -अंगना ,
अच्छा लगता था जैसे राधा का बरसाना !

आ चल अब उड़ जाएँ दोनों .
अब ये देश हुआ है बेगाना !

बसायेंगे कहीं दूर अपना आशियाना ,
गायेंगे हम मिल प्रेम का सुरीला तराना !
करेंगे ऐसा यत्न जो सबको मिले अन्न ,
आयेंगे-आयेंगे यहीं तेरा रहा अगर संग न !

आ चल अब उड़ जाएँ दोनों ,
अब ये देश हुआ है बेगाना !

अब बंद करो न अपनी यह चोंच ,
सीने पर लगती है मेरे भारी मोच !
देख नहीं सकता तेरे जिस्म पर खरोंच,
गिद्द् खा न जाए तुझे कही नोंच !

आ चल अब उड़ जाएँ दोनों ,
अब ये देश हुआ है बेगाना !


अरुणा सक्सेना 
नभ नहीं बिलकुल धरती जैसा बहुत जगह है मेरे भाई
क्यों हम खड़े हैं दुश्मन बन कर क्यों लड़ने की नौबत आई
धरती पर तो भीड़ बहुत है रंग भेद और धर्म बहुत हैं
भाषा भी कभी उन्हें लड़ाए बात ज़रा हो वो भिड जाए
खाओ कसम हम नहीं लड़ेंगे मिल कर सब दुःख -सुख सहेंगे
गले मिले और बांटे प्यार सबको देंगे ये उपहार .........


Bahukhandi Nautiyal Rameshwari 
आ ..
सुरमई बादलों को ..
चोंच से अपनी चीरते हैं ..
आ, तरसते कंठ सींचते हैं ..
अथाह नीर गर्भ रखे ..
जाने क्यूँ, किस और दौड़ते हैं ?
जाने किस पर ये खीजते हैं ..

आ ..
संग नृत्य करें ..
कोमल पंख फैलाएं ..
नीलाभ नभ में ..
अपूर्व दृश्य रचायें ..
इस स्वार्थी लोक से दूर ..
अपना नव त्रिदिव सजायें ..

आ ..
उड़ चले ..
उस दिशा की ओर ..
जिस ओर स्नेह दरिया बहे ...
ना स्वार्थी मानुष हो जहाँ ..
ना रक्त का दरिया बहे ..
आ ..क्षितिज तक उड़ान भर आयें ..
धरती आकाश मिले कैसे वहां ?
प्रेम का वो सबक पढ़ आयें ..



Jagdish Pandey 
उड चले प्रिये हम नील गगन में
धरा नही ये हमारे काबिल है ,
वहशी दरिंदे और शिकारी यहाँ
इंसानों की खाल में शामिल हैं ।

नित होते हैं अब शिकार यहाँ
पापियों का व्याभिचार जहाँ
कहाँ चुनें अब हम दानापानी
वातावरण भी यहाँ धुमिल है
उड चले प्रिये हम नील गगन में
धरा नही ये हमारे काबिल है

घबरा न जाना तुम मेरी प्रिये
सदा ही तुम देना साथ प्रिये,
प्रेम हमारा अमर रहेगा यहाँ
नही भाव जरा भी कुटिल है
उड चले प्रिये हम नील गगन में
धरा नही ये हमारे काबिल है ,




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Saturday, April 20, 2013

18 अप्रैल 2013 का चित्र और भाव




नैनी ग्रोवर 
याद होगा तुम्हें,
अपना हरा भरा आँगन,
जहाँ हम पहरों पहर,
बैठे करते थे बातें,
जाने कितने दिन बीते,
जाने कितनी रातें,
अब वहां बहार नहीं आती,
कोई डाली नहीं मुस्कुराती,
ख़ामोशी का बसेरा हैं वहां,
तन्हाई का कारवां है रवां,
मैं खामोश खड़ी,
देखती हूँ, खिड़की से,
आते जाते मौसमों को,
जो अब मुझे नहीं लुभाते,
क्यूंकि वो तुम्हारी तरह,
कॉफ़ी पीते-पीते,
मेरी किसी बात पर,
ठहाका नहीं लगाते ...!!


बालकृष्ण डी ध्यानी 
फसाना मेरा वो तेरा

कभी हम मिले थे यंहा
दो पल इस मेज पर दोनों बैठे थे
बैठे बैठे अपने सपने सजे थे यंहा
अब भी वो मेज है वंही खड़ी पड़ी
हम तुम दोनों चले गये कंहा
कभी हम मिले थे यंहा ...................

बात वंही वो छुटी वो अधूरी
हुयी थी जो तेरे मेरे दरमियाँ कभी
सूखे दरकत की तरंह गिरी है वो
सूखे पत्तों साथ अब भी पड़ी है वंहा
हम तुम दोनों चले गये कंहा
कभी हम मिले थे यंहा ...................

हवा का जोर अब भी बरकरार है
अब भी उनको हमारा इंतजार है
बिछड़े पल अब भी धड़कते हैं वंहा
दो दिल अब भी रोज मिलते हैं वंहा
हम तुम दोनों चले गये कंहा
कभी हम मिले थे यंहा ...................

यादों का वो आशियाँना मेरा तेरा
टूटे जुड़ते आशिकों का ठिकाना मेरा तेरा
दो पल दिल को बहलना मेरा वो तेरा
अब भी याद है उन्हें वो फसाना मेरा वो तेरा
हम तुम दोनों चले गये कंहा
कभी हम मिले थे यंहा ...................

कभी हम मिले थे यंहा
दो पल इस मेज पर दोनों बैठे थे
बैठे बैठे अपने सपने सजे थे यंहा
अब भी वो मेज है वंही खड़ी पड़ी
हम तुम दोनों चले गये कंहा
कभी हम मिले थे यंहा



भगवान सिंह जयाड़ा 
यह वीरान खामोश पड़ी बगिया ,
अभी भी इन्तजार कर रही है ,
कभी जो घंटों बैठा करते थे यहाँ ,
शुख दुःख की बातें करते थे यहाँ ,
कहाँ गुम हो गए वे सब लोग ,
जो टहला करते थे पहले यहाँ ,
मैं जीर्ण हालत मे भी जिन्दा हूँ ,
बस पेड़ के टूटे पत्तों से ढका हूँ ,
सोचता हूँ कभी तो आयेगा कोई ,
इस लिए इस हाल में भी टिका हूँ ,
मेरे इस हाल पर अब तरस खावो ,
कहाँ गुम गए तुम ,अब लौट आवो ,
बाट जोहता हूँ आज भी रात दिन ,
कभी तो आयेगा फिर वह दिन ,
बगिया यह जब फिर महकेगी ,
भूली बिसरी बहारे फिर लौटेंगी
यह वीरान खामोश पड़ी बगिया ,
अभी भी इन्तजार कर रही है ,
कभी जो घंटों बैठा करते थे यहाँ ,
शुख दुःख की बातें करते थे यहाँ ,



Neelima Sharrma 
पार्क के उस कोने में
कभी वीरान सी
कभी गुलशन सी
मैं सुनहरी बेन्च

कितने सुख- दुःख
साँझा हुए
मेरे बुजुर्गो के

कितने बादल बरसे
नैनो से
बेवफाई में

कितने सपने बुने
मंजिल पाने के
नए की जुस्तजू में

कितने प्रेमालाप की
साक्षी बनी
यह झुरमुट

कितने रोये
मुझे गले लगाकर
कितने हँसे
मेरे सामने गले लगकर

मैं ठूँठ सा बेंच
अडिग हूँ यहाँ
हर मौसम में

आने वालो के
हर सुख -दुःख
आशा - निराशा
का साक्षी बन ने के लिय

अपने लिय सब जिए
काश
कोई मेरी तरह
नित कहानी सा जिए



अलका गुप्ता 

उदास रही मंजिल...कोई तो आएगा |
हिम्मत करेगा या कदम भी बढ़ाएगा |
क्यूँ वीरानियाँ बेवजह करती हैं तंग ..
इन्तजार है, जरुर कोई तो मुस्कराएगा ||
****
यूँ ना खिलखिलाओ बेशाख्ता...
कि बहारें अभी उदास हैं ||
कैसी है बेकली ये बेबसी ...
मेरा महबूब क्यूँ नहीं पास है ||


अरुणा सक्सेना 
हवा के झोको ने झकझोर दिया है
डाल से पात का नाता तोड़ दिया है
मेरा भी नाता कुछ ऐसा ही था तुमसे
साक्षी बना ये बेंच आज भी सूना पडा है कब से ....
बसंत आयेगा तो नए कोंपल खिल जायेंगे
शायद टूटे दिल भी कोई नया तराना गायेंगे



सूर्यदीप अंकित त्रिपाठी 
घर के आँगन का बगीचा है देखो मुरझाया ...
ऐसा लगता है बरसों से घर वो नहीं आयें !!
अब नहीं दिखता है सागर सा, उनकी आँखों में,
ऐसा लगता है कि बरसों से वो नहीं रोये !!
बातें दुनियां की कही और सुनी थी जिनसे,
जाने किस बात पे होकर वो खफ़ा नहीं आये !!
उन दरख्तों को सहारा नहीं मिला कबसे,
टूट के बिखरे हैं दौनों, संभल नहीं पाए !!



किरण आर्य 
अहसासों की बेंच पर
बैठे मैं और तुम
एकटक निहारते
नयनभिराम छवि तेरी
आतुर नयनो में बसी ....

मूक से अहसास
बयाँ करते मन भाव
नयन कर रहे बात
हाथों में थाम तेरा हाथ....

सजों लेना चाहती
रूह में हर पल को
कस्तूरी सा मन महके
तुम्हारा प्यार और साथ....

तीव्र होती हर धड़कन
और लालिमा चहरे की
अनकही को समझते तुम
बना रहे इस पल को खास ...

हाँ थम गया जीवन जैसे
और इन चंद लम्हों में ही
पा लिया मैंने जीवन सारा
अहसासों के इस आगन में
रहते तुम सदा मेरे पास .....

दूरियां नहीं बाधा दरमियाँ
जब मन है चाहता
आ बैठती तुम संग
अहसासों की इस बेंच पर .....

जी लेती इक उम्र
तुम्हारे होने के भाव के साथ
जहाँ होते केवल मैं और तुम
इकटक निहारते एक दूजे को



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~फुरसत मिले तो आना~

क्या याद है
तुम्हारे आने से
जहाँ
फूल मुस्कराते थे
पक्षी चहचहाते थे
एक खुशबू
महसूस होती थी
सारा समां बदल जाता था
अपना सा लगता था

इसी जगह बैठ कर
तुम और मैं
सपनो को सजोते थे
और उन्हीं
सपनो में खो जाते थे
भाव पवित्र रूप से
एक दूजे में
संचार करते थे
मिलन और बिछोह
के कई पल
यही तो जिए थे

आज ये बैंच केवल
निशानी बन कर रहा गया है
अब यहाँ केवल
यादे ठहरा करती है
कभी
फुरसत मिले तो आना
यादो को फिर सजो लेंगे



सुनीता शर्मा 
मैं बाग़ का नीरीव बैंच
कालान्तर का समय साक्ष्य
सुख दुःख की कहानी का परिचायक
यथार्थ की अनगिनत तस्वीरे
कदमों की आहट से
मुस्कुराता हूँ कि
मेरा साथी मानव
अपने साथी मानव
के साथ बाँटता
अपने खुशनुमा पल
अपने दुखी जीवन की व्यथा
बच्चों के खेल
दुश्मनी के बोल
सभी का मैं समय साक्ष्य
बाट निहारता प्रतिपल
इस उजड़े चमन में
कभी यहाँ पर वसंत बहार
कभी उदासीन पतझड़
जीवन के उतार चढाव
की अनगिनत गाथाएं
अपने में समेटे
मैं नीरीव
अपनी किस्मत पर
हँसता
कभी रोता
कभी क्रुद्ध होता
विधाता पर
कि मेरे हिस्से
केवल यादें क्यूँ
मुझे तो तलाश जीवन की
जिसमें जीवन तरंग बहे
निरंतर अनवरत
मेरा एकाकीपन
की करुण दास्ताँ
सुनेगा फिर कोई
आएगा कोई
पथिक अपनी थकान मिटाने
मेरे पास
वक्त की चाल
सुलझाने का प्रयास
में मेरी आस
कि मैं निरीव नही
मेरा विश्वाश
प्रकृति की गोद में
मेरा अस्तित्व
जीवंत है
जीवंत रहेगा
कालान्तर तक
अनवरत
उमीदों का घरौंदा
बसाने में सक्षम
मैं मात्र बैंच नही
मैं हूँ समय साक्ष्य !



उषा रतूड़ी शर्मा 
पार्क की ये सूनी बेंच जैसे
अपने पास बुला रही हो हमे
दिन भर की थकान से जैसे
थोडा सुस्ताने को कह रही हो हमसे
प्रकृति के नर्म बिछोने पर जैसे
थोडा अलसाने को कह रही हो हमे
पेड़ों की छाओं तले प्यार के जैसे
कुछ पल जीने को कह रही हो हमे
प्रियतम की गोद में सर रख आंखे मूंद जैसे
एक जिंदगी जीने को कह रही हो हमे



Bahukhandi Nautiyal Rameshwari 
समझो ना ..
वीरानियाँ छाई हैं ..
गिरे पीले पात हैं, मगर !..
सन्नाटे में कहीं ना कहीं ..
यादों की बारात है ...
छूने एहसास मेरे ..
तेरी यादें आई हैं ...
धुंधली हवाओं ने
यादें धुंधली करायी हैं ..
पर यहीं कहीं, लुक्का छुपी ..
खेल रही तेरी परछाई हैं ..

कभी गूंजती थी स्वरलहरी ..
आज यहाँ वीराना है .
निसदिन ख़ामोशियों का आना जाना है ..

आज पड़ी धरातल ..
काठ के ठूंठ की तरह, उम्मीद हमारी..
पर आज भी ..
ये मेज हमें बुलाता ..
सूखे झड़ चुके पातों से..
खुद का सौन्दर्य बढाता ....
धीमे से पुकारता ..
ए राही जब गुजरना इन राहो से ..
थोडा ले सहारा मेरा सुस्ता लेना ..
भूल चुके जो लम्हें बीते संग मेरे ..
उनकी थाह लेना ..
पा सुकून, फिर अपनी राह लेना ..
ये आज भी तुम्हारे प्रेम की महक ..
संजोये रखता है ...
ये बैठा एकांत वीराने में ..
आज भी दामन अपना खाली रखता है ...



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Wednesday, April 17, 2013

15 अप्रैल 2013 का चित्र और भाव






ममता जोशी 
काश में पर्वत होती ,
अविचलित,अखंड ,आकर्षक,
आसमान को छूते पर्वत,
और
आसमान से सितारे चुराकर
चुपके से
धीरे धीरे प्यार से बिखरा देती
प्यासी धरती पर


बालकृष्ण डी ध्यानी 
चुपचाप खड़े पहाड़ों में

पर्वतों पे बिछी है
दो पल बर्फ का डेरा है
खुला आसमान नीलमी वो
नीला रंग बेखेरा है
पर्वतों पे बिछी है
दो पल बर्फ का डेरा है .........................

मन मेरे आज वो
नीला रंग गहरा है
घर की यादों में
राह ताक रहा पहाड़ मेरा है
दूर हूँ उससे जैसे वो मेरे बर्फ का घेर है
दो पल बर्फ का डेरा है .........................

चुपचाप खड़े पहाड़ों में
पला मेरे यादों का बसेरा है
घोंसला वो टूटा मेरा
कभी बसा वंहा परिवार मेरा है
आँखों से बहती है बस गंगा धारा है
दो पल बर्फ का डेरा है .........................

निशब्द सा खड़ा पर्वत वो
कितने प्रश्नों को पेरा है
नीला नीला आसमान मेरा
बचपन बुढपा बस वंहा छुटा है
जवानी ने सैर सपाटे के लिये छोड़ा है
दो पल बर्फ का डेरा है .........................

पर्वतों पे बिछी है
दो पल बर्फ का डेरा है
खुला आसमान नीलमी वो
नीला रंग बेखेरा है
पर्वतों पे बिछी है
दो पल बर्फ का डेरा है


नैनी ग्रोवर
ये बर्फीले पर्वत प्यारे-प्यारे,
मुझे पास बुलाने को करते इशारे,
मन पंख लगा कर उड़ चला,
वाह वाह, तेरी सृष्टि के नज़ारे..

दूर तलक फैला ये नीला आकाश,
जहाँ भी देखूं, पंछीयों की परवाज़,
ये दूध सी, सफ़ेद_सफ़ेद हुई धरती,
तकते-तकते मेरे ये नैना नहीं हारे ...

आओ यहाँ इक सुन्दर घर बना लें,
सपने जो अधूरे थे, उनको सजालें,
बोयें यहाँ हम बीज इंसानियत के,
यूँ ही बस ताउम्र, संग इनके गुजारें...!!


भगवान सिंह जयाड़ा 
पर्वत और शांत समुन्दर लगता कितना प्यारा ,
कुदरत की लीला का है ,यह अदभुत नजारा ,
चाँदनी रात में बिखेर रहा है अपनी धवल काया ,
धुन्दला सा प्रतिबिम्ब ,पुरे निधि पर है छाया ,
बस एक टक से निहारती रहती ,आँखे इन को ,
देता एक अदभुत सी शान्ति ,सब के मन को ,


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~ पहाड़ हो जाए ~

पर्वत हमारा मान
है हमारा अभिमान .
दिन और रात
तूफानों को झेलकर
देश की रखता आन बान
होकर अडिग खड़ा,
देखो बढ़ा रहा शान

हर चोटी पर्वत की
उंच नीच का
ये भेद मिटा रही.
हो कैसा भी कद
कंधा न सही
हाथ ही सही
थामे खड़े है
दे रहे है
प्रेम का सन्देश
एकता का सन्देश
ताकत का सन्देश
सुरक्षा का सन्देश

आओं हम सब
तन मन से
पहाड़ हो जाए


किरण आर्य 
हिम से आच्छादित
ये शिखर
जो अचल खड़े
धेर्य से परिपूर्ण
शांत गंभीर से
सूरज की
पहली किरण के
पढ़ते ही
हर कण हिम का
चमक उठता है
मोती के मानिंद
और सौन्दर्य
इन शिखरों का
मन को मोह लेता
सजग प्रहरी से
खड़े ये निरंतर
अडिग बिना झुके
हाँ ये पर्वत शिखर
हिम से आच्छादित
अचल खड़े


अलका गुप्ता 
आह ! सांध्य की यह अनुपम बेला है |
सौन्दर्य यह अद्भुत अम्बर भी नीला है
छाई गगन पर लालिमा मंगल की ...
विश्मित हुआ मन दृश्य अलवेला है ||

श्वेत पर्वत शिखर दमके ज्यों नील मणि से |
साम्राज्य हिम का निस्तब्ध निःशब्द नील से |
अद्भुत सौन्दर्य युक्त प्रकृति की अनुपम लीला है |
अम्बर छाया या धवल नील धरातल श्याम से ||

डर गया है या दंग है मन अविचल इस रंग से |
तोल ना दे मानव मायावी लोलूप वद्ध हर मोल से |
ऐसा कुछ होने ना दे हे ! कृपा निधान तू वचन दे |
रौंद ना दे क़दमों तले....प्रदूषित अग्नि ज्वाल से ||


सुनीता शर्मा 
चाँदी सी दमक लिए
अगम्य पथ
मन में शीतलता लिए
युगों से अनवरत
तेरा आकर्षण लिए
युगों से मानव
अपनी खुशियों लिए
युगों से बटोही
मोक्ष प्राप्ति के लिए
युगांतर तलाश रहा !...


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Sunday, April 14, 2013

10 अप्रैल 2013 का चित्र और भाव




सुनीता शर्मा 
समुद्र शाश्वत सत्य
जिस पर बढ़ते सबके पग
रेत पर अंकित चिन्ह
खो जायेंगे लहरों संग
सदियों से चल रहा
सदियों तक चलता रहेगा
जीवन म्रत्यु का यही क्रम
सिकन्दर हो या गजनी
समुद्र के थे बटोही
दुनिया पर शिकश्त करने वाले
इसी रेत पर गए थे मिल
जीवन में करें ऐसा कर्म
मानवता के पदचिन्ह
धो न सके कभी कोई लहर
समुद्र है स्वर्ग का मार्ग
रेत कर्मो का धरातल
म्रत्यु को प्राप्त होने से पूर्व
छोड़ जाओ पीछे अपने निशाँ
वक़्त की हर आँधी के बवंडर में
उदघोषित होता रहे तुमारा सम्मान !


नूतन डिमरी गैरोला 
जिंदगी की तपन को
अपनाया कुछ इस कदर मैंने
जैसे नंगे पाँव
भरी दोपहर में
रेत के घोरों में
छाले उठ आये थे
पोरों पोरों में|
बदते चले कदम मेरे
कभी मुड़े नहीं
कभी रुके नहीं|
किसी मृगतृष्णा का प्यासा न था
इसलिए सूरज ने तपिश छोड़ दी है
हवाओं ने सहलाया है मुझे
सागर ने भी रुख मोड लिया है
लहरे मेरे स्वागत के लिए
बढ रही है ...
क़दमों में शीतलता की बारिश होगी
रूह बुझा लेगी प्यास ...
यही तो जिंदगी है मेरी
यहीं तो मंजिल है मेरी
मैं अनवरत सागर की ओर


नैनी ग्रोवर 
सागर के उसी तट पर,
हाथों में हाथ थामे,
हम चलते थे नगें पावँ,
दूर तलक,
लहरों को महसूस करते,
हमारे एहसास,
बालों को उड़ाती,
वह ठंडी ठंडी भीगी हवा,
ना जाने कितनी शामों को,
अपने दिल में दबाए,
वो मंज़र यही ठहरे हैं,
और मैं खड़ी हूँ,
बिलकुल अकेली, तनहा,
बस देख रही हूँ,
तेरे क़दमों के निशाँ,
जो जा रहे हैं दूर बहुत दूर,
कभी ना आने के लिए ...!!


सूर्यदीप अंकित त्रिपाठी 
रेत के समंदर में डूबी जिंदगी ....
जो आखरी साँस भी नहीं ले सकती ....
सिर्फ छटपटाहट के ही निशां रह जाते हैं ....
अनदेखे, दबे कुचले, भीतर ही भीतर ..
और रह जाते हैं क़दमों के,
उभरे हुए निशां, जद्दोजहद के,
धकेली गीली मिटटी पर…।
कितना श्रम किया उसने,
सागर की ओर जाने का,
और पास ही खड़ा सागर,
न जाने क्यूँ नहीं कोई सुराख कर पाता,
रेत की छाती पर,
शायद उसे भी अपने सोख लिए जाने का डर है ...
दो कदम बढ़ाता है….
चार कदम पीछे लौट जाता है… बेबस ....



किरण आर्य 
मैं और तुम
हाथ थामे एक दूजे का
चलते अहसासों की
नर्म रेत पर
प्रेम की पद्चाप और
चिन्ह रूह पर हुए अंकित
जाने कब हौले से
मन जो हुआ करता था मेरा
जाने कब फिसल
पहलु से मेरे हो गया तुम्हारा
खोकर अस्तित्व अपना
तुझमे पा लिया जीवन मैंने
हाँ सागर की लहरों से तुम
आते और भिगो जाते तन मन
और रह जाते रूह पर मेरे
तुम्हारे अहसास स्पर्श के



डॉ. सरोज गुप्ता 
निशानियाँ
~~~~~~~
अनुकरणीय हों निशानियाँ !
झूमेंगे सैलानी सुन हमारी कहानियाँ !!

ये नर्म गर्म बालू की तपती हुई रेत,
दुःख रहे हैं छाले अब तू मरहम न लपेट !
वक्त साक्षी है देख प्रेम की अनोखी भेट,
नसीहतों की पुडिया मिलेगी इनके हेत !!

अनुकरणीय हों निशानियाँ !
झूमेंगे सैलानी सुन हमारी कहानियाँ !!

मेरे सनम तुम्हारे ये पैरों के निशाँ ,
देखो बढ़ा रहे हैं इस धरती का मान !
चिन्हित कर रहे तुम्हारा स्वाभिमान ,
घाव छुपाकर कैसे जिए सीना तान !!

अनुकरणीय हों निशानियाँ !
झूमेंगे सैलानी सुन हमारी कहानियाँ !!

सागर की लहरें आ रही करने गलबाईयां,
आगोश में भर करने दूर तेरी तन्हाईयाँ !
घमंड न कर,गिना न मुझे तू मजबूरियां ,
आ!एक हों तो भी रहेंगी हमारी निशानियाँ !

अनुकरणीय हों निशानियाँ !
झूमेंगे सैलानी सुन हमारी कहानियाँ !
हीर -रांझा,शीरी -फरियाद की कहानी ,
चीख-चीख के सुनायेंगे अपनी जुबानी !!

अनुकरणीय हों निशानियाँ !
झूमेंगे सैलानी सुन हमारी कहानियाँ !!


अलका गुप्ता 
बढ़ चले कदम उसी ओर अनायास |
गीले थे रेत से मन के हर आभास |
लेकर आएँगी लहरें खुशियों का साथ ...
जगाती थी मन में बस इक यही आस ||


बालकृष्ण डी ध्यानी 
बस चला था वो

बस चला था वो किनारे किनारे
बस चला था वो
अकेले थे वो पग बस रेत में धसे
बस चला था वो

सागर की लहर लहराये लहराये
तट पर अपने वो कदम बढ़ाये
मन और तन ले संग अपने वो
बस चला था वो

हवाओं का शोर कभी वंहा
कभी तन्हाई का वो शांत सफर
बोझल मन के अंकित पग वो
बस चला था वो

विचारों को कभी आयाम देखा
संकोचित संकेत का भी परिणाम देखा
ओझल,उदय सूर्य किरण के कभी साथ वो
बस चला था वो

नई दिशा की थी क्या रहा वो
या कल्पनाओं की बस करता बात वो
परछाई साथ साथ बस फिरा आज वो
बस चला था वो

बस चला था वो किनारे किनारे
बस चला था वो
अकेले थे वो पग बस रेत में धसे
बस चला था वो


भगवान सिंह जयाड़ा 
साहिल पर यह कदम निशान ,
कभी यहा मेरे कदमों से बने थे ,
हम भी गुजरे थे इन राहों पर ,
यह हम को ऐसाश दिलाते है ,
क्या बक्त था वो कभी जब हम ,
जुजरे थे इन राहों पर अकेले ,
कदमों के निशाँ यही बया करते है ,
कारवां के खातिर बने थे यह निशाँ ,
मगर अकेले इस साहिल पर रह गए ,
साहिल पर यह कदम निशान ,
कभी यहा मेरे कदमों से बने थे ,


Bahukhandi Nautiyal Rameshwari 
शांत हो चुकी हैं लहरें सभी .
यहां वो वक़्त भी आया था कभी ..
हताश प्रेमियों को ..
अपनी तपन से सहलाया था ..
सागर ने कभी ..
समाना चाहा गर्भ में इसके जब…
संग चलने को पदचिन्ह आबाद रहे ..
वापसी के पदचिन्ह हुए गुम


अलका गुप्ता
क्या हुआ पदचिन्ह जो मिटे न अब तक |
इन्तजार है आएगा कोई जरुर अब तक |
ये लो वक्त की लहरें भी थम सी गई हैं...
कोई तो दौड़ाए इन्हें मचल कर तब तक ||



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~मैं तुम में ~
देखो मेरे क़दमों के निशां
तुम्हारी ओर चले आ रहे है
सब कुछ पीछे छोड़कर,
अपने अस्तित्व को त्याग
आज तुम से मिलने आए है
मिलन की आस लिए
तुम में विलीन होने को
तुम में समा जाने को
कल ये निशां हो न हो
लेकिन तुम्हारा साथ
सदा के लिए होगा
एक सुखद
प्रेम अनुभूति संग
मैं तुम में
तुम मुझ में ....


अलका गुप्ता 
[प्रतिबिंब जी  द्वारा लिखी  उपर्युक्त पंक्तियों की प्रेरणा के फलस्वरूप मेरी कुछ पंक्तियां ]

माना ! है प्रीत की तुम्हारे कोई इन्तेहा नहीं |
आतुर भी लौटने के निशा कोई कदमों के नहीं |
आत्मा को इन्तजार तुम्हारा भी कम नहीं...
पर यूँ मिटाकर तेरा अस्तित्व...हरगिज नहीं ||

चाहा था टूट कर......मैंने भी तुझे कम नहीं |
माना ! प्यार के बिना जीना इतना आशां नहीं |
गर सच्चा है आत्मा से आत्मा का ये रिश्ता ...
ये मिलन ईश्वर की बंदिशें तोड़कर हरगिज नहीं ||

फक्र है प्रीत पर अपनी वो इतना बुजदिल नहीं |
मुझे अस्तित्व प्यारा है तेरी मौत हरगिज नहीं |
हम करेंगे इंतजार यूँ ही...जनम जन्मान्तर तक |
हम हैं प्यार के पुजारी !कोई बागी हरगिज नहीं ||


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Tuesday, April 9, 2013

08 अप्रैल 2013 का चित्र और भाव





बालकृष्ण डी ध्यानी 
मेरा भारत

पूर्व पश्चिम उत्तर दखन
पुण्यभूमी भारत माँ की महान है

हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई
सर्व धर्म यंहा सद भाव है

सबसे बड़ा लोकतंत्र है ये
एकता ही हमारी पहचान है

भगत सुखदेव राजगुरु क्रांतीकारी
बलिदानों का ये भारत महान है

एक लाठी गांधी की एक दांडी अंहिसा की
चलती अब भी वो भारत के साथ साथ है

एक तरफ हिमला खड़ा
दूजी तरफ हिंद माहासागर फैला विशाल है

प्रांत प्रांत में बोली बदली
भारत रास्ट्र की रास्ट्र भाषा हिंदी ही पहचान है

भारत संस्क्रती का है ये मेला
सुख -दुःख का है ये सांझ सवेरा

अब भी चमक जाती है ये आंखें मेरी
माँ तेरे आंचल में है ये तीन रंग का बसेरा

पूर्व पश्चिम उत्तर दखन
पुण्यभूमी भारत माँ की महान है

हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई
सर्व धर्म यंहा सद भाव है


अलका गुप्ता ...................
यह भारत खंड है अति विशाल जहाँ |
बड़ा है मानव से मानवता संस्कार यहाँ ||

यह है आर्य भूमि !...यह है तपो भूमि |
है उत्तुंग हिमालय की.......शान यहाँ ||

गंगा जमुना नदियों सी तहजीब यहाँ |
है विश्व से आवादी...अति विशाल यहाँ ||

है राम -कृष्ण -बुद्ध ....जैसे देवों की धरती |
वीरों की भूमि भी...वह अति पूजनीय यहाँ ||

फूली-फली है मिलकर....जो तहजीब यहाँ |
खंडित करने की हर कोशिश नाकाम यहाँ ||

ऋषियों-मुनियों का देश है.....यहाँ |
पीर फकीरों का .....परिवेश यहाँ ||

पूजनीय हैं संस्कार...धर्म विभिन्न यहाँ |
माना चढा है....कुछ पश्चिम का मद यहाँ ||

विभिन्नता में एकता की तहजीव पुरानी है |
जाग्रति मिल कर फिर सबको ही लानी है ||

विलक्षण नर-नारी का.... समूह धाम यहाँ |
अद्बुत भव्य कलाओं का उद्गम-उद्दगार यहाँ ||

है खेत-खलियान-किसानों का देश यहाँ |
आज भी विलक्षण प्रतिभाएं बसती हैं यहाँ ||

प्रतिभा की है आज भी विलक्षण धार यहाँ |
विश्व में है आगे रहने की विकट हुंकार यहाँ ||



भगवान सिंह जयाड़ा 
यह था पूरा हमारा बृहद भारत अखंड ,
लेकिन अब हो गया यह सब खंड खंड ,
नेपाल,भूटान कटा, कटा अफगानिस्तान ,
लंका,तिब्बत ,ब्रम्मा कटा ,कटा पाकिस्तान ,
करे प्रतिज्ञां सब, अब न यह खंड होने पाए ,
प्राण जाए पर, अखंडता पर आंच न आये ,
भारत माता के गौरब की रक्षा हमें करनी है ,
क्यों कि भारत माता हम सब की जननी है ,

बलदाऊ गोस्वामी 
सब देशों से बना महान।
यह है सुन्दर हिन्दुस्तान।।
उत्तर देखो पर्वत राज,दझिण सागर हिन्द विराज।
पुरब सुन्दर वन सिर ताज,पश्चिम अरबी सागर राज।।
कहीं-कहीं नदीया कही पहाड।
वन में लेते सिंह दहाड।।
चाँदी सोने की थान यहाँ पर,लोहे की औजार जहाँ पर।
लाखों खानें बना यहाँ पर,नेकों किस्म के वृझ यहाँ पर।।
किस्म-किस्म के अन्न यहाँ पर।
मिलते ये सब और कहाँ पर।।
कहीं-कहीं शहरों की है भरमार।
गवंई दिखते वे सुमार।।
यहाँ बसे हैं कृषक सरदार।
अन्न उगाते अपरम्पार।।
होता शहरों में व्यापार।
केवल गवंई ही आधार।।
गौ माता का वास यहाँ पर।
रहती केवल घांस के बल पर।।
ताजा वायु का झोंका लेकर।
कहरी कूप के जल को पीकर।।
पुष्ट होता यह शरीर।
कभी न होता जीवन धीर।।
कहीं-कही बगीया होता यहाँ पर।
कुकती कोयल बैठ डाल पर।।
शहरी पाकर रहते दंग।
शीतल हवा का मन्द सुगन्ध।।
होता पंछीयों की यह कार।
गुन-गुन भौरों की गुन्जार।।
रहते खुशी यहाँ के लोग।
कभी न होता यहाँ कोई रोग।।
छोटे-छोटे झोपडियों में,रहते यहाँ के इंसान।
बापु तक को भाया मन में,गवंई जीवन हिन्दुस्तान।।


सूर्यदीप अंकित त्रिपाठी 
उत्तर का हिमालय है वंदित,
है दक्षिण तीरथ रामेश्वर !!
करता पूरब जय महा काली,
और पश्छिम बसे है ब्रह्मेश्वर !!
कहीं हरित दुशाला माँ ओढ़े,
कहीं चरण पखारे है सागर !!
कहीं गोद सी कोमल मरू-भूमि,
कहीं पालक-पोषक सरि-सागर !!


नैनी ग्रोवर 
ऐ भारत माँ तेरे आँचल में, सृष्टि के सारे रंग बिखरे,
लगती है तू, दुल्हन सी, सर पे हिमालय का मुकुट धरे..
ममता तेरी गंगा-जमुना, हर प्राणी का पोषण है करें,
माटी तेरी है तिलक मेरा, मेरी मांग में इसके रंग भरे .. !!


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
~मेरा भारत ~
धर्म - कर्म, एकता, प्रेम, आदर - सत्कार
मेरे भारत की शक्ति के ये थे मूल विचार
संस्कृति और संस्कार थी जिसकी धरोहर
दिखता नही हमें आज इनका कोई आधार

अखंड भारत था मेरे इस देश का नाम
आज मानचित्र पर ही ये बस दिखता है
अब तक खंड किये इसके कितने हमने
यह देख दिल आज भी रोता व् तड़पता है

धर्म - जाति से आज भी हम बाँट रहे
राजनीति का गन्दा खेल हम खेल रहे
राज्य व् राज्य में भेद साफ़ दिखा रहे
अपने लोगो को एक दूजे से दूर कर रहे

मेरा भारत आज सोने की चिड़िया बन सकता है
मेरा भारत आज भी विश्व गुरु बन सकता है
अमीरी - गरीबी का भेद हटा हम सब पा सकते है
स्वार्थ छोड़, देश की सोच हम ये गौरव पा सकते है



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Sunday, April 7, 2013

05 अप्रैल 2013 का चित्र और भाव





बालकृष्ण डी ध्यानी 
आज का चित्र

आज का चित्र देखकर
उसने मुझे मजबूर किया
जो दूर थे अब तक
उनको अब दिल के पास किया

बैठे है सब गोलाकार सभी
पैर अपने अपने पसरे
क्या कहते हैं वो हमसे
मेरी सोच को सोच में डाले

पुकार रही है
उनके पैरों की गोलाई
क्या है वो चित्र
जिसमे में संकेत छुपा

जो तुम्हरे और हमारे
मन के भीतर उभरे
एक एक आवाज आये दिल से
कह रहे हो जैसे वो सारे

हम भी तो हैं
इस धरती के लाला
हम भी हैं तुम्हरे
आओ साथ मिलकर

विश्व को पर्यावरण से सजायें
उनकी सोच से नत हुआ मै
चलो साथ साथ अब चलें
हम मिलकर अब सारे

आज का चित्र देखकर
उसने मुझे मजबूर किया
जो दूर थे अब तक
उनको अब दिल के पास किया


Govind Prasad Bahuguna 
नंग धडंग और मस्त मलंग
मिलकर खेलें खेल यह संग I
हिलोर हंसी की छबि सुन्दरता की
अद्भुत तरंग ह्रदय निर्मलता की I I

अलका गुप्ता 
आओ साथियों !मिलकर खेलें खेल |
बनाएं तरह-तरह के ...अद्भुत मेल |
हसें खिलखिलाएं ये मानव शृंखलाएं ..
हाथ-पाँव कभी सिर से मिलाएं मेल ||


भगवान सिंह जयाड़ा 
दिखा रहे हैं यह मिल के दुनिया को ,
हमारी भी सुध लो दुनिया के लोगों ,
यह जो घेरा बनाया है हमने पांवों से ,
बस इतना सा अन्न से तुम भर दो ,
वाह री दुनिया तेरे अजीबो गरीब रंग ,
भूख और प्यास क्यों यहाँ इन्शान संग ,
भूख और प्यास से बिलखते यहाँ इन्शान ,
यह कैसा इंशाफ है, पालनहार भगवान् ,
करो दया इन पर भी हे दया निधान ,
यह सब भी तो है तुम्हारी ही संतान ,
जीवन दिया है तो,सब को रोटी देना ,
तुम से अर्ज है , इन की भी सुध लेना,
मुठ्ठी भर अनाज से कुछ न जाएगा ,
इन भूखे इन्शानों को खान मिल जाएगा ,


आनंद कुनियाल 
आओ अभी तो पावों में फूल खिलाएं..
----------------------------------------
आओ अभी तो पावों में फूल खिलायें
ये बेफिक्री का आलम ये अनमोल पल-छिन
कोमल पैर सलोनी काया निश्छल हर मन
मुस्कुराती आँखें सौंधी माटी से सना तन
बंधुत्त्व से बंधा ये प्यारा अल्हड़ बचपन
देखते देखते न जाने कहाँ दुबक जाएं
कल की क्या खबर क्या रंग दिखाए
भटकते पैरों में होगी बिवाईयाँ
छल से लबलबाता कठोर मन
बदरंग आँखों में हडपने की लालसा
अपनी हवस में रंगा आदमखोर तन
जड़ता और विनाश पर अड़ा हर जन
कल की क्या खबर क्या रंग दिखाए
आओ अभी तो पावों में फूल खिलाएं


नैनी ग्रोवर 
मिल जुल कर संग बैठें, खेल नया हम खेले,
हमारी अपनी सल्तनत है, हमारे अपने मेले..

हम धरती की संताने हैं, माटी ही हमको भाए
हमको प्यारे, काले बादल, और अम्बर के साए,
नहीं पसंद शहरों के हमको, वो ऊँचे-ऊँचे झमेले..

हमारी अपनी सल्तनत है, हमारे अपने मेले....

जंगल हमारी रोज़ी-रोटी, जंगल है हमारा विधाता,
क्यूँ छीन रहा इंसान आज का, समझ में नहीं आता,
क्या इनको नहीं पता इसका, यह कुदरत के हैं ठेले..

हमारी अपनी सल्तनत है, हमारे अपने मेले....!!


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
हौसले और प्रेम भाव संग
बचपन बीता अपना खेल में
मिलकर सीखा धरती है गोल
जो पल बीते थे वो अनमोल

रंग रूप का भेद नहीं था
छोटे बड़े का खेल नहीं था
मिलते हाथ संग पैर भी थे
दिल से सब अपने लगते थे

बड़े हुए तो जीने की सोचने लगा
जिन्दगी की दौड़ में शामिल हो गया
बचपन का खेल अब हर कोई भूल गया
प्रेम भी अब स्वार्थ में देखो बदल गया



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Thursday, April 4, 2013

03 अप्रैल 2013 का चित्र और भाव





बालकृष्ण डी ध्यानी 
अ अ अ अ आ ...................आ
ना ना ना ना ......................माँ

ताल तंबूरा ले हाथ
बैठक में बैठे माँ बेसुरा छेड़े आलाप

सात सरगम की तान टूटी
कान इन्द्री मेरी अब ये कंहा भटकी

क्या कर रही हो माँ हाथों को तान
रुदान कर रही हो माँ क्यों आंखें भींचे आज

आंखें खोलो थोड़ी माँ
थोड़ा कर लो गान रियाज से अब आराम

ले लो लोलीपॉप माँ चूसो ऐसे प्रेम से
गले में अपने भर लो मिठास

छुंन-छुना की आवाज सुनो
जागो माँ सुन लो अब मेरी पुकार

गेंद पड़ी बगल में माँ
खेलने जाना है आंगन में घर के बाहर

दिवाली की छुट्टी पड़ी है
यूँ ना माँ मेरी छुट्टी अब तुम करो बेकार

अ अ अ अ आ ...................आ
ना ना ना ना ......................माँ

किरण आर्य 
हाथ में अपना तानपुरा थाम
माँ ने छेड़ी मधुर एक तान
पप्पू के खड़े हो गए कान
माँ क्या मिटा रही है थकान ??.........

अपनी ढपली अपना है राग
सुर है बिगड़ा बेसुरा है साज़
माँ के सुर पंचम हुए जाते
गिरी घर पर सुरों की गाज ............

पप्पू का जियरा घबराए
टॉफ़ी दे झुनझुना बजाए
कैसे रुके माँ का प्रलाप
पप्पू की ये समझ ना आए .........

माँ की धुन है विकट बड़ी
आंखें मूंदे कर रही आलाप
दुविधा पप्पू की अवाक खड़ी
सोच पप्पू की करती विलाप ..........

माँ ना छेड़ो ये बेसुरा सा राग
हो ना जाए पड़ोसियों को खाज़
व्यर्थ का है ये बिगड़ा प्रलाप
छोडो अब जिद छोड़ो ये साज़


किरण आर्य 
भोर भई टूटी पप्पू की निंद्रा
माँ कर रही सरस्वती साधना

माँ ने छेड़ा विकट आलाप
तानपुरे का भी अलग है राग

पप्पू की मति कर रही संताप
माँ क्यों कर रही घोर विलाप

टॉफी झुनझुना ले माँ छोड़ो ये राग
फ़ैल रही पड़ोसियों के गुस्से की आग

सा रे गा मा पा दिखत है रूठे
सुर दीखते आश्वासनों से झूठे

सुन लो माँ तुम मेरी अरदास
रख लो जरा पप्पू की लाज़


भगवान सिंह जयाड़ा 
मम्मी जब गाये मेघ मल्लहार ,
भूल जाती तब मुन्ने का दुलार ,
मुन्ना हक्का बक्का रह गया ,
मम्मी को यह क्या हो गया ,
अभी तो यह मुस्करा रही थी,
मुझे भी साथ खिला रही थी ,
मम्मी को टौफ़ी खिलाता हूँ ,
उन को अब ज़रा हंसाता हूँ ,
मम्मी लो यह टौफ़ी खावो ,
और प्लीज अब चुप हो जावो ,
बरना मैं भी रोना शुरू कर दूंगा ,
तुम्हारे मेघमल्हार में साथ दूंगा ,


नैनी ग्रोवर
सुबह सवेरे राग भैरवी गाते हैं माता,
यूँ गला फाड़-फाड़ नहीं चिल्लाते हैं माता..

आये पड़ोसी इकठ्ठे होकर, पिताजी को पीट रहे,
मार रहे हैं कम, मगर ज्यादा घसीट रहे,
ढूधवाले ने भी दे दिया, उनको एक तमाचा..

यूँ गला फाड़-फाड़ नहीं चिल्लाते हैं माता..

भाग गए परिंदे पेड़ों से, कान अपने दबाये,
सारे गधे करें ढेंचू-ढेंचू, रहे तेरे सुर में सुर मिलाये,
कैसे खेलूं इन खिलौना से, सारा घर हिलता जाता ..

यूँ गला फाड़-फाड़ नहीं चिल्लाते हैं माता.....!!


आनंद कुनियाल 
चुन्नु की शरारतों से तंग आकर
मम्मी ने भी अपना स्वांग दिखाया है
उठा तम्बूरा आठवें सुर में छेड़ा
न जाने कौनसा राग दोहराया है
मम्मी का देख ये अबला रूप
चुन्नू बेचारा भी चकराया है
दिखा अपनी टॉफीयां और लॉलीपॉप
करे बेचारा हर जतन लुभाने को
पापा के आने पर खैर नहीं
लगा रूठी मम्मी को मनाने को
मम्मी अब मन भी जाओ, माँ हो
क्या बच्चे की जान लेकर रहोगी..


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ...... 
~ माँ अब चुप हो जाओ ~

माँ ये कौन सा सुर लगाया है
पापा पड़ौसी सब सिहर उठे है
माँ कौन सी हुई गलती हमसे
जो तुमने ये बेसुरे सुर लगाये है

ये तम्बूरा और तुम्हारे सुर
अब बर्दास्त नहीं कर पाता
ये टॉफी झुन्झाना सब ले लो
लेकिन माँ अब चुप हो जाओ

पापा ने तो कान में रुई डाली है
लेकिन पेट मेरा अभी भी खाली है
मेरे लिए अब कुछ नाशता बना दो
माँ अब रियाज़ अपना बंद कर दो

पड़ौसी मुझे आँखे दिखाते है
माँ को चुप करवाओ कहते है
बच्चे आस पास आते डरते है
माँ मुझ पर कुछ तो रहम करो

शरारत न अब मैं कोई करूँगा
कहोगी तुम जो वो सब करूँगा
ये टॉफी झुन्झाना सब ले लो
लेकिन माँ अब चुप हो जाओ


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Tuesday, April 2, 2013

02 अप्रैल 2013 का चित्र और भाव





दीपक अरोड़ा 
रफ्ता-रफ्ता मोमबत्ती की तरह,
पिघलता चला गया मैं।
धीमे-धीमे उसके प्यार में,
यूं सुलगता चला गया मैं...


Jayvardhan Kandpal 
इक तेरा सफर पर चलते जाना.
इक मोमबत्ती का जलते जाना.
इक का मंजिल पाके रौशन होना,
इक का मंजिल पाके बुझते जाना.


Suman Thapliyal 
रोज नए रंग बदलती है ज़िन्दगी
गम और ख़ुशी के बीच में ढलती है ज़िन्दगी
साँसों की महफ़िलों में रोशनी के लिए
यूँ मोम के मानिंद पिघलती है ज़िन्दगी .


Govind Prasad Bahuguna 
जलना और पिघलना दो विरोधी भाव हैं
दुर्जन जलता है और सज्जन पिघलता है
अपनों के ऐश्वर्य से दुर्जन का जलना
दूसरों के दुःख से सज्जन का पिघलना
जीवन की विसंगति साथ साथ चलती है
जैसे अँधेरे में मोमबती जलती है


बलदाऊ गोस्वामी 
अंधकार में जलती दीपक,फूलवारी में महकती फूल।
मानष को इशारा करती,इनके गुणों को मत भूल।।
मधुमक्खीयां जिसको नि:स्वार्थ किए तैयार,कहलाया मधुखोया।
इस धरा पर मोम बनकर,सारे जग में प्रकाश फैलाया।।
आओ सीखे हम कुछ नया,प्रकाश फैला है जहाँ।
गोस्वामी दीपक की तरह जले हम,अंधकार फैला है वहाँ।।


किरण आर्य 
मोमबत्ती की लौ सी सुलगती जिंदगी
कतरा कतरा मोम सी पिघलती जिंदगी
सत्कर्मो की राह है जब चलती जिंदगी
खुद जलकर रोशन जहां करती है जिंदगी

अंधेरों में ग़म के रोशन सी है जिंदगी
आंख के कोरो से बहती नदियाँ सी जिंदगी
कभी सेहरा की वीरानी भी है जिंदगी
कभी कलकल बहती नदियाँ भी है जिंदगी

मोमबत्ती की लौ सी सुलगती जिंदगी
कतरा कतरा मोम सी पिघलती जिंदगी
सत्कर्मो की राह है जब चलती जिंदगी
खुद जलकर रोशन जहां करती है जिंदगी

लौ पर पतंगे सी कुर्बान होती विकल जिंदगी
सत्कर्मो की जो राह चले सार्थक वहीँ जिंदगी
मोम के मानिंद पिघल जहां जो रोशन करे
सही मायने में जीने के लायक है वहीँ जिंदगी

मोमबत्ती की लौ सी सुलगती जिंदगी
कतरा कतरा मोम सी पिघलती जिंदगी
सत्कर्मो की राह है जब चलती जिंदगी
खुद जलकर रोशन जहां करती है जिंदगी


अलका गुप्ता 
शमा ! तू क्यूँ जल रही
आज अकेली ?
मूक आंसू बहाती,
तन जलाती ,
क्यूँ बुझाती पहेली ?
तेरे वो दीवाने ..
परवाने कहाँ हैं ?
क्यूँ ढल रही तू ?
अभी वो तो जवां हैं ।
इसे ! परवाने की ...
या तेरी ही -
बेबफाई समझूँ !
या इश्क में तेरा जलना ,
उसकी रुसवाई समझूँ !!


भगवान सिंह जयाड़ा 
मिटाने दुनियाँ के तम को ,
मैं हर पल जलती रहती हूँ ,
जला कर जोत प्रकाश की ,
खुद सदा पिघलती रहती हूँ ,
परवाना है सच्चा साथी मेरा ,
जो आखिर तक साथ देता है ,
मेरे बजूद के आखिरी बक्त तक ,
खुद जल कर भष्म हो जाता है ,
समा परवाने की दास्ताँ यह ,
दोस्ती की सीख हमें सिखाता ,
खुद जलें तो कोई बात नहीं ,
दूसरों को तो प्रकाश दिखाता ,


बालकृष्ण डी ध्यानी 
प्रेम प्रतीक्षा

साथ मेरे वो कब से
ज्योत प्रेम प्रतीक्षा की
जलती और वो बुझती रही

लपटों के दुःख सुख में
हवा के जोर रुख को
अकेले अकेले वो सहती रही

रात निगोड़ी मेरे साथ
मध्यम मध्यम सी जलती रही
यांदों लकीरों को संग-संग वो खींचती रही

अपने आप से वो
ऐ कहती रही और सुनती रही
मोम है की वो पिघलती रही

चाँद और अँधेरा
का मन में ऐसा पहरा लगा
वो रोशनी बन मन जलती रही

साथ मेरे वो कब से
ज्योत प्रेम प्रतीक्षा की
जलती और वो बुझती रही


डॉ. सरोज गुप्ता 
मैं जलूं तू खुश हो जाए

भरा दुनिया में तम है
मिटा भीतर में तम है !

जलकर राख हो जाऊं
रोशन तू,क्या इसमें गम है !

पिघले सत्ता जले मोमबत्ती
बुझेगी नहीं बहुत इसमें दम है !

दिवाली पर जल रही सदियों से
पिघलेंगे राम उम्मीद इसमें कम है !

जलकर बंधन निभाये एक धागा
क्या मानवता की लौ में दम है !


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~मोम और धागा ~
हमारे प्रेम का
कोई सानी नही
अपने लिए हम
एक दूजे में
समाये रहते है
लेकिन
दूसरे को रोशन
करने की खातिर
एक जलता है
एक पिघलता है
दर्द सहकर भी
दूसरो के अँधेरे
हर लेते है
यही तो
हमारे प्यार ने
हमें सिखाया है
दूसरो के लिए
जीना ही
असली जीना है


नैनी ग्रोवर 
जला के दिल, रौशनी जहाँ को दी मैंने,
ताउम्र, जल जल के यूँही ही गवाँ दी मैंने ..

आज कहते हो ज़रुरत नहीं, मेरी तुमको,
राह चमकीली अंधेरों में, तुम्हें यहाँ दी मैंने ... !!


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Monday, April 1, 2013

31 मार्च 2013 का चित्र और भाव




नैनी ग्रोवर 
हर राह तेरे दर पे जाए, इंसान क्यूँ ये समझ ना पाए,
नाम तेरे हज़ारों हैं, चाहे जिस नाम से तुझको बुलाए..

उलझा रहा खुद को, मजहब के नाम पे धोखा खा रहा,
बेहतर है सबसे पहले, इंसान खुद को इंसान कहलाए...!!


Govind Prasad Bahuguna 
आस्था के प्रतीकों में खो गई आस्था
"आस्थावानों" को नहीं इससे कोई वास्ता
सौहार्द की ओर जो ले जाए,
वही हमारा हो  एक रास्ता

केदार जोशी एक भारतीय 
धर्म की राह में हम अंधे हो गए ,
धर्म की परिभाषा ही धर्मं को समझाने लग गए ..
मानव का असली धर्म है एकता, प्यार, भाई चारा ,
पर हम जातीवाद , धर्मवाद और वाद ही वाद में उलझते चले गए

अरुणा सक्सेना 
हवा और पानी हमको एक से मिलते हैं
फूल भी बगीचे के सबके लिए ही खिलते हैं
खून का रंग देखते हैं लाल नज़र आता है
धर्म के नाम पर लड़ना क्यों मानव को भाता है
राह भले ही हैं अलग मंजिल मगर एक है
भूल झगडा मिले गले जो वो ही बन्दा नेक है


बालकृष्ण डी ध्यानी 
नास्तिक हूँ मै
आस्था की भीड़ से दूर खड़ा
देख रहा हूँ छल,आडम्बर भरा
वो माया का खेल में

नास्तिक हूँ मै
आज देखों इनको एक मै
लगते सदीयों से एक में
बांटे बांटे अनेक वे

नास्तिक हूँ मै
धर्म जाती के भेद छिपे
रंग वर्ण के माप दंड पर सेज सजे
माटी माटी में ये भेद उपजे

नास्तिक हूँ मै
मुझे फक्र है मुझ पर
मेरा भार ना अब किस पर
खुद उठाये फिर रहा हूँ

नास्तिक हूँ मै
नत ना हुआ मै अब तक
मै सबल हूँ अपने पथ पर
इन ढकोसलों बचकर

नास्तिक हूँ मै
आस्था की भीड़ से दूर खड़ा
देख रहा हूँ छल,आडम्बर भरा
वो माया का खेल में


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
कहीं अल्लाह कहीं भगवान
इंसान ने दिए इन्हें ये नाम
मन से करते है सब पूजा
फिर क्यों समझे इसे दूजा

किसी के कहने पर नही
खुद पढ़ समझ लेना इसे
आस विश्वास की ये कड़ी
सदाचार के प्रतीक है सब

धर्म कर्म के ये है निशान
बनाते है जो अच्छा इंसान
भाव अलग एक है मंजिल
तू अलग क्यों समझे इंसान


किरण आर्य 
कर्म कांडो की यहाँ भरमार
इनके आगे हर दिल बेजार
ईश्वर ख़ुदा जीसस वाहे गुरु
धर्मांध हो ना बेजार सा मरुँ
धर्म सिखलाता है भाई चारा
क्यों हिलमिल रहना ना गंवारा
निशानों में क्यों ढूंढें है वजूद
रहे इंसान बन तो मिल जाए वजूद
हिन्दू सिख इसाई या मुस्लिम
सब है इंसा उसके ही है सब बन्दे
समझो इस बात का मर्म समय रहते
वर्ना वक़्त के फिसलने के बाद
हाथ मलने के सिवा कुछ ना हाथ है आता
इंसान करनी पे अपनी आसूं बेबसी के बहाता


ममता जोशी 
मैने हिन्दू के घर जनम लिया तो हिन्दू हो गयी ,
मुसलमान के घर लेती तो मुसलमान हो जाती,
आज रामायण है तब हाथ में कुरान आ जाती,
मंदिर के घंटो की जगह मुझे अजान की आवाज़ भाती ,
जो धर्म सिखाता है इंसान वही बन जाता है ,
आत्मा तो वही है बस नाम बदल जाता है

कौशल उप्रेती 
मैं राम नहीं कहता
रहमान नहीं कहता
गलियों के भेद को
मैं इमान नहीं कहता
कोई लिख रहा प्रभु है
कोई रट रहा खुदा है
एक दूसरे से होड़
पूजा या अजान नहीं रहता


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