Thursday, April 4, 2013

03 अप्रैल 2013 का चित्र और भाव





बालकृष्ण डी ध्यानी 
अ अ अ अ आ ...................आ
ना ना ना ना ......................माँ

ताल तंबूरा ले हाथ
बैठक में बैठे माँ बेसुरा छेड़े आलाप

सात सरगम की तान टूटी
कान इन्द्री मेरी अब ये कंहा भटकी

क्या कर रही हो माँ हाथों को तान
रुदान कर रही हो माँ क्यों आंखें भींचे आज

आंखें खोलो थोड़ी माँ
थोड़ा कर लो गान रियाज से अब आराम

ले लो लोलीपॉप माँ चूसो ऐसे प्रेम से
गले में अपने भर लो मिठास

छुंन-छुना की आवाज सुनो
जागो माँ सुन लो अब मेरी पुकार

गेंद पड़ी बगल में माँ
खेलने जाना है आंगन में घर के बाहर

दिवाली की छुट्टी पड़ी है
यूँ ना माँ मेरी छुट्टी अब तुम करो बेकार

अ अ अ अ आ ...................आ
ना ना ना ना ......................माँ

किरण आर्य 
हाथ में अपना तानपुरा थाम
माँ ने छेड़ी मधुर एक तान
पप्पू के खड़े हो गए कान
माँ क्या मिटा रही है थकान ??.........

अपनी ढपली अपना है राग
सुर है बिगड़ा बेसुरा है साज़
माँ के सुर पंचम हुए जाते
गिरी घर पर सुरों की गाज ............

पप्पू का जियरा घबराए
टॉफ़ी दे झुनझुना बजाए
कैसे रुके माँ का प्रलाप
पप्पू की ये समझ ना आए .........

माँ की धुन है विकट बड़ी
आंखें मूंदे कर रही आलाप
दुविधा पप्पू की अवाक खड़ी
सोच पप्पू की करती विलाप ..........

माँ ना छेड़ो ये बेसुरा सा राग
हो ना जाए पड़ोसियों को खाज़
व्यर्थ का है ये बिगड़ा प्रलाप
छोडो अब जिद छोड़ो ये साज़


किरण आर्य 
भोर भई टूटी पप्पू की निंद्रा
माँ कर रही सरस्वती साधना

माँ ने छेड़ा विकट आलाप
तानपुरे का भी अलग है राग

पप्पू की मति कर रही संताप
माँ क्यों कर रही घोर विलाप

टॉफी झुनझुना ले माँ छोड़ो ये राग
फ़ैल रही पड़ोसियों के गुस्से की आग

सा रे गा मा पा दिखत है रूठे
सुर दीखते आश्वासनों से झूठे

सुन लो माँ तुम मेरी अरदास
रख लो जरा पप्पू की लाज़


भगवान सिंह जयाड़ा 
मम्मी जब गाये मेघ मल्लहार ,
भूल जाती तब मुन्ने का दुलार ,
मुन्ना हक्का बक्का रह गया ,
मम्मी को यह क्या हो गया ,
अभी तो यह मुस्करा रही थी,
मुझे भी साथ खिला रही थी ,
मम्मी को टौफ़ी खिलाता हूँ ,
उन को अब ज़रा हंसाता हूँ ,
मम्मी लो यह टौफ़ी खावो ,
और प्लीज अब चुप हो जावो ,
बरना मैं भी रोना शुरू कर दूंगा ,
तुम्हारे मेघमल्हार में साथ दूंगा ,


नैनी ग्रोवर
सुबह सवेरे राग भैरवी गाते हैं माता,
यूँ गला फाड़-फाड़ नहीं चिल्लाते हैं माता..

आये पड़ोसी इकठ्ठे होकर, पिताजी को पीट रहे,
मार रहे हैं कम, मगर ज्यादा घसीट रहे,
ढूधवाले ने भी दे दिया, उनको एक तमाचा..

यूँ गला फाड़-फाड़ नहीं चिल्लाते हैं माता..

भाग गए परिंदे पेड़ों से, कान अपने दबाये,
सारे गधे करें ढेंचू-ढेंचू, रहे तेरे सुर में सुर मिलाये,
कैसे खेलूं इन खिलौना से, सारा घर हिलता जाता ..

यूँ गला फाड़-फाड़ नहीं चिल्लाते हैं माता.....!!


आनंद कुनियाल 
चुन्नु की शरारतों से तंग आकर
मम्मी ने भी अपना स्वांग दिखाया है
उठा तम्बूरा आठवें सुर में छेड़ा
न जाने कौनसा राग दोहराया है
मम्मी का देख ये अबला रूप
चुन्नू बेचारा भी चकराया है
दिखा अपनी टॉफीयां और लॉलीपॉप
करे बेचारा हर जतन लुभाने को
पापा के आने पर खैर नहीं
लगा रूठी मम्मी को मनाने को
मम्मी अब मन भी जाओ, माँ हो
क्या बच्चे की जान लेकर रहोगी..


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ...... 
~ माँ अब चुप हो जाओ ~

माँ ये कौन सा सुर लगाया है
पापा पड़ौसी सब सिहर उठे है
माँ कौन सी हुई गलती हमसे
जो तुमने ये बेसुरे सुर लगाये है

ये तम्बूरा और तुम्हारे सुर
अब बर्दास्त नहीं कर पाता
ये टॉफी झुन्झाना सब ले लो
लेकिन माँ अब चुप हो जाओ

पापा ने तो कान में रुई डाली है
लेकिन पेट मेरा अभी भी खाली है
मेरे लिए अब कुछ नाशता बना दो
माँ अब रियाज़ अपना बंद कर दो

पड़ौसी मुझे आँखे दिखाते है
माँ को चुप करवाओ कहते है
बच्चे आस पास आते डरते है
माँ मुझ पर कुछ तो रहम करो

शरारत न अब मैं कोई करूँगा
कहोगी तुम जो वो सब करूँगा
ये टॉफी झुन्झाना सब ले लो
लेकिन माँ अब चुप हो जाओ


सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

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