Saturday, June 25, 2016

‎तकब ६ - [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता 6 ]





‪#‎तकब६‬ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #6 ]
मित्रो लीजिये अगली प्रतियोगिता आपके सम्मुख है. नियम निम्नलिखित है 
१. दिए गए दो चित्रों में अंग्रेजी में कुछ लिखा गया है दोनों में सामंजस्य बिठा कर [ चित्रऔरलिखे पर] कम से कम १० पंक्तियों की रचना शीर्षक सहित होनी अनिवार्य है [ हर प्रतियोगी को एक ही रचना लिखने की अनुमति है.] 
यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
[एक निवेदन- टाइपिंग के कारण शब्द गलत न पोस्ट हों यह ध्यान रखिये. अपनी रचना को पोस्ट करने से पहले एक दो बार अवश्य पढ़े]
२. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है कि आपने रचना में उदृत भाव किस कारण या सोच से दिया है, 
३. प्रतियोगिता में आपके भाव अपने और नए होने चाहिए. 
४. प्रतियोगिता २३ जून २०१६ की रात्रि को समाप्त होगी.
५. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा.
६.आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक प्रतियोगिता समाप्त न हो और उसकी विद्धिवत घोषणा न हो एवं ब्लॉग में प्रकशित न हो.
विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और जो निर्णायक दल के सदस्य है वे भी इस प्रतियोगिता में शामिल है हाँ वे अपनी रचना को नही चुन सकते लेकिन अन्य सदस्य चुन सकते है. सभी का चयन गोपनीय ही होगा जब तक एडमिन विजेता की घोषणा न कर ले.

इस बार के विजेता है  श्री मदन मोहन थपलियाल 'शैल'


Kiran Srivastava
"कर्म-लेखा"
======================

कर्म सदा करते जाना है
चाहा जो उसको पाना है
नहीं अडिग कर्तव्य पथ से
नहीं भाग्य पे इतराना है..!!
पहले से ही सब तय है
ईश्वर ही कर्ता-धर्ता है,
जो लिखा है किस्मत में
वो भाग कर आयेगा
जाना है गर किस्मत से
आकर भी चला जायेगा,
हम तो बस कठपुतली हैं
डोरी उसके हाथों में
वही चलाता वही नचाता
हम बस चलते जातें हैं
मनुज समझ नहीं पाता
सोचे वो भाग्य-विधाता है
जितना किस्मत में है उसके
उतना ही वो पाता हैं ,...!!!!

टिप्पणी- मनुष्य खुद को सर्वकारी समझता है ।जो की सत्य नहीं है । हम सब किसी अदृश्य शक्ति के अधीन हैं,और उसी के अनुसार कर्म करते हैं ।


बालकृष्ण डी ध्यानी
*********
~भाव मेरे~

भाव मेरे उड़ चले हैं
आज सब उड़ चले कहाँ
शब्द ना मिले मुझे
आज सब वो खो गये कहाँ

सब कुछ वो मेरे लिये था
इसका ना कभी पता चला
व्यर्थ ही जीवन मेरा आज
धूल संग उड़ चला कहाँ

कुछ उसने था लिखा
उसे ना मैं फिर लिख सका
जैसा भी हो मैं तो जी लिया
जो भी होगा उसने लिखा

बेफिक्री मौसम था वो मेरा
मेरे चारों तरफ जो बिखरा
मदहोश होकर घूमता रहा
बस मैं अपने आप से जुड़ा

भाव मेरे उड़ चले हैं ...



टिप्पणी : अपने भावों को खोजता जीवन, जैसा मिले वैसा जी रहा जीवन ,बेफिक्री में फिरता जीवन , अपने आप से लगा हुआ जीवन , मदहोश होकर घूमता जीवन


सुशील जोशी 
“आज का सत्य”
******************************************
इन्साँ ही गलती करते हैं, क्योंकि वे भगवान नहीं,
जानबूझ कर गलती करने वाले पर नादान नहीं,
लगे रहो तुम कोशिश में या लालच दो घर भरने का,
ईमान बेचकर शोहरत पाने वाला मैं इन्सान नहीं।

नहीं चाहिए ऐसा बंगला चमक हो जिसमें सट्टे की,
नहीं चाहिए दौलत जिसमें बू आती हो कट्टे की,
जो चोरी को अपना समझे ना चाहूँ उस यारी को,
ठुकराता हूँ ऐसे लोगों को उनकी मक्कारी को,
भले रहूँ गुमनामी में चाहूँ झूठा सम्मान नहीं,
ईमान बेचकर शोहरत पाने वाला मैं इन्सान नहीं।

सबका लेखा जोखा लिखकर भेजा ऊपर वाले ने,
लेकिन हम हैं जो उस सब को रख बैठे हैं ताले में,
आज हम अपने इन्साँ होने का भी सत्य भुला बैठे,
कर्म की लेकर आड़ कुकर्मों से खुद ईश रुला बैठे,
गीता के उपदेश नदारद और कहीं कुरआन नहीं,
ईमान बेचकर शोहरत पाने वाला मैं इन्सान नहीं।


टिप्पणी : आजकल के माहौल को देखते हुए अपने चरित्र चित्रण को माध्यम बनाकर मैंने सही और गलत बताने का प्रयास किया है। यद्दपि पता नहीं चित्र के साथ पूर्ण न्याय करने में मैं कितना सफल हुआ किंतु जो मन में भाव उभरे उन्हें यहाँ लिख दिया।


नैनी ग्रोवर 
~जो होना है सो होगा~

जो होना है सो होगा,
विधाता का लिखा है,
उसके लिखे को पढ़ पाना,
भला कौन सीखा है ...
मैं क्यों देखूँ,
किसी और का धर्म है क्या,
क्यों ना सोचूँ,
के मेरा अपना कर्म है क्या,
क्यों कड़वे बोल से,
किसी का मन में दुखाऊँ,
क्यों निंदा करूँ किसी की,
पाप का बोझ उठाऊं,
कर सकती नही भला,
तो किसी का बुरा भी क्यों करूँ,
किसी के मासूम सपनो को,
मैं चूरा-चूरा भी क्यों करूँ,
कौन जाने, कौन हे सच्चा,
कौन है झूठा जहान में,
स्वयं को देखूँ, भीतर तक तो,
हैं सारे ही, कर्म नादान से..!!

टिप्पणी... इंसान अपने कर्म ना देख कर दूसरों पे उंगली उठाता है, अपने किये गन्दे कर्मों को भूल जाता है ।


गोपेश दशोरा
~नियति और कर्म~

जब वो ही लिखने वाला है, और वो ही मिटाने वाला है,
किस बात का तुझको ग़म इंसा, किस बात पे तु इतराता है।
देकर जीवन उसने तुझको, अपना कर्म साकार किया,
माथे पे लिखकर किस्मत को, हाथों में उसे आकार दिया।
जो लिखा है तुझको पता नहीं, फिर हार मान क्यूं बैठा है,
मेहनत कर ले मिल जाएगा, आखिर तु उसका बेटा है।
यह जीवन सागर ऐसा है, जो जितना गहरा जाता है,
उसको ही मोती मिलते हैं, वो ही तर बाहर आता है।
हाथों पर धर कर हाथ यहाँ, कुछ होगा, सोचते रहते है,
कुछ भी नहीं मिलता उनको, किस्मत को रोते रहते है।
जो लिखा हुआ है किस्मत में, निश्चित तु एक दिन पाएगा,
पर कर्म तुझे करना होगा, वरना सब फिसला जाएगा।
जो मिला उसे सर्वस्व मान, बहुतों को यह भी मिला नहीं,
ईश्वर है तेरे साथ सदा, सच्चों को उसने छला नहीं।
अन्तर्मन में झांक के देख, है ईश्वर तेरे अन्दर ही,
भला-बुरा सब देख रहा, है कुछ भी उससे छिपा नहीं।
कर्म कर सच्चे मन से, मत फल की आशा कर पगले,
संतोष परम सुख मान सदा, बदलेंगे तेरे दिन अगले।
मत हार समझ अपनी नियति, उसने भुजबल है तुझको दिया,
विपरीत चला जो धारों के, उसने सच्चा जीवन है जिया।

टिप्पणीः कुछ लोग एक या दो असफलता के बाद उसे ही अपनी नियति मानने लगते है और कहते है कि ईश्वर नहीं होने दे रहा। जबकि कमीं उनके प्रयासों में होती है। यदि पूरे मन से प्रयास करें तो ईश्वर भी साथ देता है और सफलता निश्चित मिलती है। हो सकता है कि सफलता एक निश्चित प्रयास के बाद ही लिखी हो।


प्रभा मित्तल
~~विधि का लेखा~~
~~~~~~~~~~~~~
मन तू उठ चल ! धीरज धर,
अधिकार नहीं तेरा जिस पर
क्यों फिर तड़पन इतनी उस पर,
विधि ने दिया जो,ले ले हँस कर ,
क्यों रोता है पगले नर होकर।

मन में रखकर विश्वास अटल ,
दूर हटा दे पथ का पत्थर,
अन्य किसी से आशा मत कर
अपना मन पहले अपना कर,
अधिकार जता फिर औरों पर।

उठ, मिटने के मत कारज कर,
आँधी-तूफानों से घबराकर
क्यों बैठ गया है साहस खोकर,
जो बदा है भाग्य में तेरे,वो तो
निश्चय ही पाएगा आगे बढ़कर।

नहीं मिला संतोष कभी भी
किसी और पर दृष्टि गड़ाकर
तेरा - मेरा करते-करते ही
मिट जाएगा जीवन नश्वर।
गर ढूँढे तो मिल जाएगा -
पारस मणि तेरे ही घर पर।

तेरा सुख है तेरे ही कर्मों पर निर्भर,
दूजे के कन्धों पर चढ़कर,क्या
देख सका कोई जग सत्वर।
अरे! मंजिल तक पहुँचेगा राही
अपने ही पैरों से चलकर।

हाँ..ये सच ही तो है ...
मंजिल तक पहुँचेगा राही
अपने ही पैरों से चलकर।

टिप्पणी: मनुष्य हमेशा दूसरों के सुख को अपने से अधिक आँकता हैं ...ऐसे में मानव-मन को सम्बोधित करते हुए,जो मिला उसमें ही संतुष्ट रहने और कर्म पर विश्वास रखने की सलाह देने की कोशिश की है।



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
~ कर उद्धार ~

कर्म होता आधार
बनता नियति का सार
रचता है वो
सजता व् सवंरता मनुष्य
कैसे कोई मिटाए
किस्मत का लेखा
राजा से रंक
फकीर कोई बादशाह बनता
नियति से सोच
बदलती जाती है
अच्छा या बुरा
फिर मनुष्य करता जाता
भाग्य है प्रधान
कर्म बने पहचान
जीवन का सच
तू इसे मान न मान
कर ले ध्यान
पास तेरे भगवान
आज नही तो
कल मिलेगी तुझे पहचान
मन से शुद्ध
अपना पवित्र संस्कार
छोड़ उस पर
कर खुद का उद्धार

टिप्पणी:  नियति को मान चलता हूँ कर्म को आधार समझ बढ़ता हूँ .. सफल असफल खुद फैसला करता हूँ.


किरण आर्य 
---नियति---

जिन्दगी में नियत है सब
नियति से बंधा है जीवन और जीव
जिस तरह शब्द विचरते ब्रहमांड में
वैसे ही आत्मा बदल चौला बदलती है रूप
संस्कारों और नियति से बंधा जीवन
हर चरण को करता है पूरा

कर्म करते है नियत संस्कारों को
सुकर्म करते है अमरता प्रदान
नाम और जीवन को
कुकर्म कर जाते है कलंकित
जीवन को नरक है बनाते

एक शक्ति अलौकिक सी
करती सञ्चालन जीवन चक्र का
जीवन से मृत्यु पथ तक
जो लिखा गया वो मिटा नहीं
जो बीत गया समय वो लौटा नहीं

समय का चक्र बड़ा बलवान
बस कर्मों का खेला है जीवन
सुकर्म कर और आगे बढ़
जीवन को दे तू राह सही
बाकी कर मत चिंता तू

सब छोड़ उस परमात्मा पर तू
हो जा निश्चिन्त और निफ्राम तू
सब कुछ तुझमे और तुझ तक है
कुछ भी न अलग हाँ तुझसे है
आत्मा में बसे वहीँ राम रहीम
वहीँ है ईसा घनश्याम करीम

आत्मा भी तू परमात्मा भी तू
प्रकृति भी तू सृष्टि भी है तू
नश्वरता से अमरता तक
पंचतत्वों का है सार भी तू
आस भी तू विश्वास भी तू

अतृप्ति से तृप्ति का आकार भी तू
साकार भी तू निराकार भी तू
तुझसे ही शुरू है ख़त्म तुझी पे
ये समझ ले बन्दे बस तू ही तू..............

टिप्पणी: नियति तो अपनी चाल चलती है लेकिन अगर प्रारब्ध का फल मान लिया जाए जीवन को तो मनुष्य को सतकर्म करते हुए जीवन बिताना चाहिए



डॉली अग्रवाल 
~कर्म~

जन्मों का किस्सा
कर्मो का हिस्सा
कार्य और कारण
यूँही नही बनते !

साँस आनी जानी है
ज़िन्दगी बड़ी सयानी है
आखिर ढल ही जानी है
धूप की कहानी है !

कश्ती का रखवाला
कश्ती डुबोता है
शिकायतों का दौर
बड़ा बेमानी है !

जागता है अंधियारा
उजियारा सोता है
हर एक को विधाता
नाच करवाता है !

रिश्ते नाते , अपने परायो
की माला वो पिरोता है
नियति का नाम दे
ता -- ता थैया
करवाता है !

ज़िन्दगी की डोर थामे
गरूर वो तोड़ देता है
जब मन में आये तो
साँस भी खींच लेता है !

टिप्पणी: मिट्टी का शरीर न तेरा न मेरा -- रेत के घरौंदे है बनते है मिट जाते है ! आस्था और विश्वास जो हुआ अच्छा हुआ , जो होगा वो भी अच्छा होगा !!


Ajai Agarwal
===विधना (नियति +कर्म ) ===

मैं क्या हूँ ? इक कठपुतली !
विधना के हाथों से फिसली
विधना ही खेल खिलाती है
ये हर क्षण मुझे नचाती है ,
निज से निज की पहचान करूं
कैसे आगत का मान करूं ?
मुझको लिखकर अपनी मसि से
मुझमें ही छिपा दिया तूने !
द्वार झरोखे तन मन में !
पर फिर भी भेद नहीं पाऊं ?
तू मुझमे है ,मैं तुझमे हूँ
सदियों से सदियों तक खेल यही !
तब भी जब तू मुझ में थी ,
औ मैं अज्ञानी अंजान रही !
अब भी जब तू मुझमे है
अर मैं तुझको पहचान गई ।
जब मैं ही तू हूँ , तू ही मैं
फिर सगरा विश्व हुआ मेरा
अब ''मैं'' कहीं खोने को है -
तू ही तू है तू ही तू है।
मैं बादलों की क्यारियों से -
बरसती मोती की झालर ,
उषा की सिन्दूरि आभा ,
कुमकुम चूर्ण सी प्राची में बिखरी।
बात करूं कभी मैं तुम संग ,
कभी मैं आस करूं तेरी--
अपने तन में मेहमान रहूं
हाँ मैं हूँ तेरी कठपुतली !
ये सूरज चंदा मेरे हैं ,
नभ के सब तारे मेरे हैं ,
वन -पर्वत नदियाँ सागर ,
सब मेरे लिये -सब मेरे हैं।
झरनों सा बहता मन मेरा ,
ताल-तलैया नयन मेरे ,
सदियों की यादों के जंगल ,
है मन में रोप दिये तूने।
तू विशवास मैं तेरी अभिव्यक्ति ,
तू संस्कृति मैं इतिहास तेरा ,
तू रूढ़ कल्पना -विस्तार हूँ मैं
तू सौंदर्य और मैं चेतनता।
सब मेरा है ,तो मैं हूँ कहाँ ?
विधना ; ये सब तेरी लीला है !
है -भविष्य यदि अंधियारे में
तो ,भूत कहां उजियारा है
तड़ित की क्षणिक चमक ही
बादलों का भाग्य लेखा।
कैसे पढूं ? क्यूँकर पढूं !
जब हाथ में तेरे ही सब है
तू दीर्घ रूप नारायण है -
लघु रूप तेरा मैं तो नर हूँ।
विधना की स्याही के अक्षर
विधना ही बस तू ही पढ़ सकती
जीवन पारद माला जैसा
इक चोट लगी औ बिखर गया
जीवन ,नदिया -सागर की लहरें
पानी में लिखी लिखाई है।
भाग्य-भाग्य को क्यूँ रोऊँ ,
सत्ता तेरी कानून तेरा
मैं कुसुमों का सौरभ बनकर
पवन सुवासित बन जाऊं
विधना तू दे वरदान मुझे ,
अभिलाषा मेरी हो - लेख तेरा।।

टिप्पणी ------दो चित्रों के भाव इस कविता की प्रेरणा -- सब पूर्व लिखित ,नियति कठोर है अपने नियम नहीं तोड़ती -कर्मों का फल ,कुछ संचित अपने , कुछ पूर्वजों के --हानि लाभ जीवन मरण यश -अपयश विधि हाथ --शुभ कर्म समर्पित भाव से किये जाएँ ,तो its all about me --

Madan Mohan Thapliyal 

~ऊहापोह~

बार -बार एक प्रश्न,
कुन्द बुद्धि जाग जरा,
क्षीण होता है सब,
जब दस्तक देती जरा.

हंस रहा गगन,
किंकर्तव्यविमूढ़ वसुन्धरा,
भाग्य की ए वैतरणी,
क्या लिखा क्या धरा ?

विधाता ने सब लिखा
सयाने ए कह गए,
मिट सकता नहीं लेख,
हम हतप्रभ रह गए.

कोई करे पाप घनेरे,
क्यों है समाज कोसता,
छोड़ दें कहना सब
विधाता का है किया धरा.

तिलिस्म है जिन्दगी,
भाग्य में है क्या बदा ?
मायने टटोल जिन्दगी के,
कहानी ए रहेगी सदा.

जो करे ओ करे,
क्या सोचना श्रेष्ठ है,
स्वयं को निष्क्रिय रखना,
क्या यथेष्ट है ?

मेरा काम नहीं सोचना,
अगर सब उसी का है रचा,
बुद्धि विवेक का फिर काम क्या,
नाहक शोर है मचा.

मृत्यु उसकी बानगी,
प्रलय की डोर उसके हाथ,
यहीं धरा रह जाएगा,
कुछ था नहीं तेरे साथ.

कर पुरुषार्थ,
कुछ भी अकर्मण्य नहीं
सब है खरा-खरा,
नसीब को न बना संगिनी,
नाहक नसीब से है डरा !!!! *********।

टिप्पणी: ईश्वर के लेख को कोई मिटा नहीं सकता, लेकिन भाग्य के भरोसे हाथ पर हाथ धर कर बैठना भी बुद्धिमत्ता नहीं. पुरुषार्थ करना ही मानव का कर्म और धर्म दोनों हैं.


Prerna Mittal 
~आस्थावान या अहंकारी {दो विरोधी व्यक्तित्व }~

सृष्टि का सारा क्रम चलता, प्रभु के एक इशारे पर
क्या है प्रारब्ध, भविष्य है क्या ? उसके ही सिर्फ़ सहारे पर
अनहोनी होती कभी नहीं, जो होता है, वह होता है ।
वैसे ही फल तो पाएगा, जो जैसे बीज को बोता है ।
अच्छा तो अच्छा, बुरे को भी स्वीकार तो करना ही होगा ।
प्रारब्ध कहो, क़िस्मत कह दो या भाग्य कुछ तो कहना होगा ।
कैसा होगा भविष्य? इसको तो कोई ना जान सका ।
कल बहुत दूर, अगले ही पल को कोई ना पहचान सका ।
होनी और भाग्य, मरण, जीवन, यश, धन सब ईश की माया है ।
वह महाशक्ति है, सघन वृक्ष, जीवन उसकी ही छाया है ।

इसके विपरीत भाग्य को जो केवल पुरुषार्थ मानते हैं ।
वे अहंकार के वश होकर, सत्यता नहीं पहचानते हैं ।
गीता में योगेश्वर प्रभु ने पुरुषार्थ कर्म सब बतलाया ।
है सिर्फ़ कर्म मानव के लिए, फल इच्छित कब ?किसने पाया ?
सारे दोषों में मानव के, है अहंकार ही दोष बड़ा ।
जब मैं-मैं-मैं-मैं का डमरू बजा तो समझो ! सब कुछ नष्ट हुआ ।
मैं-मैं करने वाले को कब आवाज किसी की आती है ?
बकरी भी मैं-मैं करती है और गले छुरी फिरवाती है ।
था एक सिकंदर अति महान, दुनिया को सारी जीता था ।
दो गज़ ज़मीन ही है नियति, यह उसकी मृत्यु से सीखा था ।
बस दूर करो ये ग़लत भ्रांतियाँ, तुम कुछ भी नहीं कर सकते हो ।
उस महाशक्ति के बिना कहो क्या, एक भी डग चल सकते हो ?
भूतल से, जल से पशु-पक्षी क्यों नहीं उपजते हैं, बोलो?
पेड़ों से, पत्तों से मनुज क्यों नहीं पैदा होते बोलो ?
इतना तो बतलाना होगा, क्रमबद्ध क्रियाएँ क्यों चलती हैं ?
लपटें उठतीं क्यों ऊपर को, धारा क्यों नीचे बहती है ?

टिप्पणी : भाग्य बहुत बलवान होता है ।कर्म करना मनुष्य के हाथ में है, परंतु फल उसकी क़िस्मत के अनुसार ही मिलेगा । नियति के संचालक सिर्फ़ सृष्टि के नियंता हैं और कोई नहीं ।



अलका गुप्ता 
~हर मकां मुहब्बत का~
~~~~~~~~~~~~~~
कयास में बहु रूपों का.. टेरा लगता है |
चर्च मंदिर मस्जिद का फेरा लगता है |
हर जर्रा करे है...तेरा ही जब इशारा...
क्यूँ धर्मों का अलग से बसेरा लगता है ||

छूटें ...हे नाथ ...मायाबी ...बन्धनों से !
निकाल अंधियारे इन अति-गुम्फनों से !
शान्ति स्पंदन से भर देना जीवन ये ...
कर मुक्त ईश मुझे इन भव-उलझनों से !!

मजहब एक ही..इंसानियत...चलाया जाए !
हर मकां मुहब्बत का धरा पर बसाया जाए !
बुझा आग़ नफरतों की..बहा दरिया सीने में...
दुनिया-बे-समंदर...प्रेम ही...छलकाया जाए !!

करें अराधना आओ इंसानियत की |
मूल्यांकन करें पूजा नैतिक धर्म की |
ढकोसला धर्म का अवधारणा झूठी ..
चरित्र ही धर्म है इबादत उस ख़ुदा की ||

ईश ! वही परमपिता परमात्मा..एक है !
आत्मा प्रकृति ..रूप परिवर्तित अनेक है !
स्वामी एक वही सबका..अजर अमर वो..
घट-घट..व्यापी न्यायी उपकारी नेक है !!


टिप्पणी --इंग्लिश मुझे बहुत नहीं आती ..जितना मुझे मेरी बुद्धि ने समझाया उसी हिसाब से लिखने का प्रयास किया है... इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है |जहाँ कहीं से पुकारो सुनने वाला हर तरफ एक ही ईश है ! ...चाहें ...जिस नाम से पुकार लो उसको..| उसने हमें इंसान बनाया .. तो हमें भी बस इंसानियत का निर्वाह या कर्म करना चाहिए बिना किसी दुनियाबी धर्म के झूठे ढकोसलों में पड़े |



कुसुम शर्मा 
~..ख़ाली हाथ ही जाएगा~
----------------------
तू-तू मै-मै करते - करते
एक दिन तू मर जाएगा !
क्या लाया था साथ
जो साथ तू ले जाएगा !

पाँच तत्व का बना शरीर
उन्हीं मे मिल जाएगा !
ख़ाली हाथ ही आया तू
ख़ाली हाथ ही जाएगा !

न कोई है तेरा
न कोई साथ जाएगा !
धन दौलत सोना चाँदी
यही छूट जाएगा !

जैसा कर्म करेगा जग मे
वैसा ही फल पाएगा !
केवल कर्मों की पोथी
तू साथ मे ले जाएगा !

मोह माया मे फँस कर तू
जीवन का मक़सद भूल गया !
संसार मे आते ही तू
इसी के रंग मे रंग गया !

स्वार्थ भरी इस दुनिया मे
तू भी स्वार्थी बन गया !
करके ओरों पर अत्याचार
तू भी अत्याचारी बन गया !

किस बात का अभिमान करे
निर्दोषों को मार कर
क्यो अपने भण्डार भरे !

क्यो भूल गया उस ईश्वर को
जिसने तुझे बनाया है !
मिट्टी की देह बनाकर
सासो का दीप जगाया है !

उसने तो पाठ प्रेम का समझाया !
तूने आ कर इस जीवन मे
पापों का ही भार कमाया !

अरे पगले यहाँ सब कुछ मिलेगा दुवारा !
पर यह जीवन नही मिलेगा दुवारा !

टिप्पणी :- हम अपने जीवन मे अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए जाने कितनों का मन दुखाते है अपनी झूठी खुशी के लिए जाने कितनों को रूलाते है अपने झूठे अभिमान मे हम भगवान को भी भूल जाते है हम सोचते है जो भी कर रहे है हम कर रहे है उस सृष्टि रचेता को भूल जाते है किन्तु सत्य यह है कि हम अपने जीवन मे जैसे कर्म करते है उसी प्रकार का फल पाते है




सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Friday, June 17, 2016

तकब५‬ - [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #5 ]



‪#‎तकब५‬ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #5 ]
मित्रो लीजिये अगली प्रतियोगिता आपके सम्मुख है. नियम निम्नलिखित है 
१. इस चित्र पर कम से कम १० पंक्तियों की रचना शीर्षक सहित होनी अनिवार्य है [ हर प्रतियोगी को एक ही रचना लिखने की अनुमति है.] 
यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
[एक निवेदन- टाइपिंग के कारण शब्द गलत न पोस्ट हों यह ध्यान रखिये. अपनी रचना को पोस्ट करने से पहले एक दो बार अवश्य पढ़े]
२. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है कि आपने रचना में उदृत भाव किस कारण या सोच से दिया है, 
३. प्रतियोगिता में आपके भाव अपने और नए होने चाहिए. 
४. प्रतियोगिता १५ जून २०१६ की रात्रि को समाप्त होगी.
५. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा.
६.आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक प्रतियोगिता समाप्त न हो और उसकी विद्धिवत घोषणा न हो एवं ब्लॉग में प्रकशित न हो.
विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और जो निर्णायक दल के सदस्य है वे भी इस प्रतियोगिता में शामिल है हाँ वे अपनी रचना को नही चुन सकते लेकिन अन्य सदस्य चुन सकते है. सभी का चयन गोपनीय ही होगा जब तक एडमिन विजेता की घोषणा न कर ले.


इस बार की विजेता है सुश्री किरण आर्य 

सुशील जोशी 
~चुप्पी~

अथाह दर्द, वेदना की
दास्तान दिख रही,
सभ्यता के दौर में भी,
नारियाँ हैं बिक रहीं।

क्या हुआ जाने हमारे
चक्षुओं के नीर का,
आज भी देखें तमाशा
द्रौपदी के चीर का,
अब कलम बस कागज़ों में
चीत्कारें लिख रहीं,
सभ्यता के दौर में भी,
नारियाँ हैं बिक रहीं।

हे प्रभु ये क्यों हमारी
सोच में लगा ग्रहण,
क्यों नहीं लगती हमें वो
अपनी माँ, बेटी, बहन,
क्रूरता की भट्टियों में
रोटियों सी सिक रहीं,
सभ्यता के दौर में भी,
नारियाँ हैं बिक रहीं।

अब भी अवसर है चलो उस,
सोच को बाग़ी करें,
जो किसी असहाय अबला,
को छुए, दाग़ी करे,
दें उन्हें सम्मान जो
अपने बराबर टिक रहीं,
सभ्यता के दौर में भी,
नारियाँ हैं बिक रहीं।

टिप्पणी:
(आज के प्रगतिशील वातावरण में भी कई कुटिल मानसिकताएँ हैं जो स्त्री को मात्र भोग का सामान समझती हैं और हम दुराचार होते हुए भी ख़ामोश रहते हैं। कुछ इन्हीं भावों पर मेरी ये रचना उद्धृत हुई है। हिंदी के बड़े – बड़े दिग्गजों के बीच मेरी ये तुकबंदी मात्र प्रयास भर है।)


नैनी ग्रोवर 
~कोख~

जिस को कोख से जन्में,
उसी पे अत्याचार करें,
जीवन भर ये दरिंदे,
नारी का व्यापार करें..

रौंद देते हैं मासूम सपनो को,
ये वासना के मारे,
जीते हैं अपना जीवन ये,
इन्हीं पापों के सहारे,
किसी के घर की बेटी को,
शर्मिंदा भरे बाज़ार करें..

अगर सह भी जाए नारी,
इक बार जुल्म जो इनका,
पर बिखर जाता है उसकी,
खुशियों का मनका-मनका,
उस पे भी तानों से रोज़,
समाज उनका बलात्कार करे..

और कभी पराई बेटी को,
घर ला के जालिम सताते हैं,
नाम पर दहेज़ के ये शैतान,
फिर ज़िंदा उसे जलाते हैं,
ऐसे पाप, ऐ भगवान देखो,
तेरे ये धर्म के ठेकेदार करें ..

जिस कोख से जन्में,
उसी पे अत्याचार करें ..!!


टिप्पणी.. नारी जाति के प्रति दिन ब दिन बढ़ती घटनाएं, और समाज का खोखलापन ।



गोपेश दशोरा
~एक अनुत्तर प्रश्न~

माँ अक्सर बोला करती थी,
घर से बाहर कम जाना तुम,
और सांझ ढले उससे पहले,
घर के अन्दर आ जाना तुम।
हैं विषधर फैले चहुंओर,
जो नजर न तुमको आएंगे,
जब पाएंगें तुमको तन्हा,
वो अपना फन फेलाएंगे।
मैं हंस देती थी सुनकर सब,
ये किन सदियों की बाते है,
हैं पढ़े लिखे सब लोग यहाँ,
फिर क्यूं ये सब बतियाते है।
ढोल, गंवार नहीं अब नारी,
है उसका वर्चस्व यहाँ,
है दुनियां उसकी मुट्ठी में,
है उसका ही सर्वस्व यहाँ।
नारी अब अबला नहीं रही,
अपनी रक्षा कर सकती है,
शक्ति का पर्याय है वह,
नारी कुछ भी कर सकती है।
पर ये बाते, तो बस बाते है,
उस दिन मुझको अहसास हुआ
जब राह अकेली जाती थी,
किसी का पीछे आभास हुआ।
थे अनजाने कुछ पुरूष वहां,
आँखों में उनकी लालच था,
जीव्हा से लार टपकती थी,
मुझको पाना बस मकसद था।
उस रोज बची अस्मत मेरी,
अहसान प्रभु का माना है,
माँ तेरा आंचल छोड मुझें
कहीं और नहीं अब जाना है।
माँ! क्यूं ये दुनियां ऐसी है?
औरत का जीना मुश्किल है,
देवी का जिसमें रूप पला,
आखिर उसको ही क्यों है छला
लक्ष्मी के रूप में घर लाकर,
क्यों उसे जलाया जाता है,
नवरात्रों में पूजन करते!
और कोख में मारा जाता है।
अपराध पुरूष का होता है,
पर हमको सहना पड़ता है।
कभी वन में जाना पड़ता है,
कभी पत्थर बनना पड़ता है।
सीता से लेकर निर्भया तक,
कब तक हमको सहना होगा,
नर को नारायण कह कर,
क्या घुट-घुट कर रहना होगा?
कब बदलेगी यह रीत यहां,
नारी को नारी समझेंगे,
उसका अपना भी जीवन है,
उसके सपनों को समझेंगे।
माँ की आँखे बस भर आई,
बाहों में मुझको बांध लिया,
सोचा था माँ कुछ बोलेगी,
पर चुप्पी को ही उत्तर मान लिया।

टिप्पणीः “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते....” की संस्कृति में आज जो नारी की स्थिति है, वह विचारणीय है। भले ही हम 21वीं सदी में जी रहे है पर औरत को लेकर हमारी सोच अभी तक परिपक्व नहीं हुइ है।



प्रेरणा मित्तल 
~वीभत्सता~

वीभत्स, निर्दयी, क्रूर और
विकराल ये भीषण पंजा है ।
अजगर की तरह मुँह फैलाए,
कसता जा रहा शिकंजा है ।

अनमोल ज़िंदगी पाप और
हिंसा कर डालेगी जर्जर ।
सुंदर जीवन की हरीतिमा
क्षण में कर डालेगी बंजर ।

इस पुरुष शक्ति के ही बल पर,
नारी युग-युग शोषित होती ।
शारीरिक निर्बलता से ही,
सबला भी है अबला होती ।

क्या कोई शक्ति आसुरी है,
उपवन में झंझावात किया ।
महका फूलों का गुलदस्ता,
कुचला और खर पतवार किया ।

हिंसा, शोषण और बलात्कार से,
व्यर्थ ये जीवन होता है ।
हो गया चरित्र तो तार-तार,
इतिहास शर्म से रोता है ।

क्या जानें कब वह दिन होगा ?
जब इसका अंत हो जाएगा ।
सच मानो शिशिर, घाम उस दिन,
सचमुच वसंत हो जाएगा ।

टिप्पणी : हमारे समाज में पुरुष द्वारा नारी पर तरह-तरह के अत्याचार किए जाते रहे हैं। नारी एक डर में जीती है । इसके अंत और एक स्वस्थ समाज की कामना करते हुए इस कविता का सृजन किया गया है ।



डॉली अग्रवाल 
~महफूज नही तुम~

सुनो
घर से बाहर ना निकलो तुम ,क्योकि कही भी तुम महफूज नही---------
लोगो के ख्याल
छू कर तेरे तन को , कुरेदते है तेरे मन को
बचपन के खेल , सखियो के मेले
छोड़ सब सिमट जाओ तुम
क्योकि इस जहाँ में तुम महफूज नही हो !
डरी सहमी सी अस्मिता
बिखरी हुई हसरते
कैसे करे यकीं कोई
बाप का साया , राखी का धागा
दागदार है यहाँ हर रिश्ता
छुपा लो तुम अपनी मासूमियत ,
ये खिलती सी मुस्कुराहट , कोई छीन ना ले --
हर गली के मोड़ पे , चौराहे की ओट में
इंसान भेड़िया बना खड़ा होगा --
अस्मिता के तार कर अपने पौरष पर इतराया होगा
मान जाओ तुम , खुद को छिपा लो कही
वासना का पुजारी हर जगह समाया होगा
कौन कहता है की अब गिद्ध नजर नही आते
ध्यान से देखिये जनाब --
सड़क पर चलती चिड़ियों पर ,जाल कहि बिछाया होगा ------ !!

टिप्पणी:
नारी की सहनशीलता ही उसकी कमजोरी। बन जाती है  मन व्यथित होता है सब सोच कर मन सहमा रहता है एक बिटिया का बाप जब इंसान बनता है !



बालकृष्ण डी ध्यानी
~उस पल~

उस पल
कितनी चीखी होगी
कितना होगा चिल्लाया उसने
कितना उसने उस भेड़िये के आगे
रहम की भीख मांगी होगी
जिन्दगी और मौत के संघर्ष बीच
कितना उसने दरिन्दों से मुकाबला किया होगा
कितने यातना में गुजरे होंगे वो पल
कितना वो तड़पी होगी
दरिंदे ने उसकी चीखें दबाने की
कितनी कोशिश की होगी
उस वक्त उस पर क्या बीती होगी
ये सोचकर ही हर आंख में अंगारे दहक जाते हैं
कितनी बिलबिलाई होगी
कितने दर्द से वो गुजरी होगी
कितना सहा होगा उसने
वो तो वो ही जानती होगी
कितनी चीखी होगी
कितना होगा चिल्लाया उसने
उस पल
टिप्पणी: उस पल इस रचना में उस पल उस नारी के संघर्ष और उस की मनोदशा दिखाती है ये  रचना 




Kiran Srivastava 
"बेबस नारी"
======================

सदियों से आजतक
बस जुल्म ही तो सहती
आयी है नारियां....!!
कहीं दहेज के दानव
बोटियां नोचते,
कहीं होती जूल्मों
की शिकार...,
कही बदनाम गलियों
में देह व्यापार,
कही निर्भया दामिनी
सी जिल्लत...,
कहीं मां की कोख
में भी किल्लत....,
चारो तरफ हैं ये
भूखे दरिन्दे..
नजर गिद्ध सा लिए
और पंजे फैलाये..,
बनकर शिकारी
करें हैं शिकार
रहे ताक में
बस कोई हाथ आये...!!!

नहीं कोई बेटी-बहू
है सुरक्षित,
लगे डर है उनको
कही आये -जाये,
दिलों में है खौफ
और दहशत के साये
हमेंशा सिरों पर हैं
उनके मंडराये,
चिंतित है कैसे अब
अस्मत बचायें....????

======================
टिप्पणी--
औरतों के प्रति पुरूषों का नजरिया "कल-आज-कल "जो था ,है,वही रहेगा...!!!






प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
~वो प्यारी सी लड़की~

ठुमक ठुमक चलती,
छन छन बजती पायल
उसकी मासूमियत
ख़ुशी की किलकारी में झलकती
समय संग
बढती रही वो हल पल हरी दूब सी
सुंदर परिधान
पहन किलकती, शृंगार से कर दोस्ती
सुना था माँ से उसने, स्त्री सृष्टी की पोषक है
यह जान
लड़की होने पर अपने मान वो करती
फिर भी
खुश रहती जमाने के रुख से थी अनजान
वो प्यारी सी लड़की.....

मनचाहा जीवन
प्रकृति की सुन्दरता में खोजती
बचपन से
यौवन तक सफ़र, अल्हड़ मस्तमौला
नाचती कूदती
खिलती मुस्काती, अपने संसार में रमी
यौवन की
दहलीज़ पर उसके कदम रखते ही
बदलने लगा
बहुत कुछ, शारीरिक बदलाव संग
उड़ने लगा
उसका मन, बुनने लगा रुपहले सपने
प्रेम अंकुर
फूटने लगे, स्वप्नों में मिला राजकुमार
दे जाता
एहसास ख़ास, कर जाता उसे बेकरार
वो प्यारी सी लड़की.....

देख कर दर्पण
इठलाती मुस्कराती बाते करती खुद से
घर के बाहर दो चार हुई वो जमाने के स्वभाव से
रख कर कदम
ठोस धरातल पर पहचान हुई ज़माने से
उसका पीछा करती
अजब ग़जब मानसिकता व्यवहार से
ओढ़ कर चुनरी
छिपा लेती खुद को घिनौनी नजरो से
वो प्यारी सी लड़की.....

एक दिन
घटा कुछ ऐसा मानो हुआ वज्रपात
नोच डाला
कुछ दरिंदो ने होकर उसे वासनारत
तार - तार
हुई इज्जत, दर्द शरीर का चीख पड़ा
फटी रही
आँखे उसकी, दरिन्दे उसे नोचते रहे
विकृत मानसिकता
का होकर शिकार लगा उसे आघात
वो प्यारी सी लड़की.....

मल मल
कर नहाती, धोने आत्मा पर लगे दाग
कर विलाप
आंसुओ में, बहता रहा स्त्री होने का मान
पत्थर हुई
सूरत उसकी, बन कठपुतली हुई निष्प्राण
मांग रही
प्रभु से अपने, इस जीवन से दे दो मुक्ति
था जीवन
वरदान जो, लगने लगा उसे अब अभिशाप
प्रश्न पूछे
किस् से वो, हर कोई दिखता यहाँ लाचार
जला मोमबती
एक दिन, दिखा आक्रोश निभाते शिष्टाचार
मासूम सी
वो प्यारी लड़की, ढूंढ रही अपना अस्तित्व
कुंठित मन
से झेल रही वो, अपने ही अंतर्मन की पीड़ा
वो प्यारी लड़की ......

टिप्पणी: लड़की गौरव घर का, लेकिन बाहर का समाज उसे कब अपनी बुरी नज़र का सामान बना दे वो नही जानती. उसके अपने सपने, अपनी चाह उस क्रूरता की आग में भस्म हो जाते है


किरण आर्य 
~और.....~

सुतली की समझ से परे था
उसके घर में दो दरवाजों का होना.
बचपन में कई मर्तबे
देखा था उसने ठाकुर
और
उच्च कुल के पुरुषों को
बेधड़क ठेल द्वार
घर में घुसते हुए
और
माई तुरंत उसको
बाहर जाने को कहती थी,
उसने अक्सर सुनी थी
माई की दबी चीखें
और
सिसकियाँ.........
फिर सुनाई देती थी उसे आहट
पिछले दरवाजें के खुलने की
और
देखा था उसने
माई को अस्त व्यस्त पड़े
कांपते जिस्म को छुपाते हुए.
देखा था माई को अपने
निचले पेट को पकड
बुक्का फाड़कर रोते हुए.
और
देखी थी ग्लानि से
झुकी भरी आंखें बापू की
लाचारी, बेबसी अपनी माँ की.

सुतली की आँखों में
वह दृश्य सदा
एक डरावने सपने की तरह
आता था डराता था
एक दिन ठाकुर के कुछ गुर्गे
घुस आये थे घर में.
उसकी माई ने
तुरंत ठेलकर
उसे घर से बाहर किया
और
कहा लाडो आना नहीं भीतर
फिर सुनी थी उसने
गगनभेदी चीत्कारें माई की.
उस दिन उसकी माई
बिलकुल पत्थर हो गई थी.
और
अगली सुबह बापू को
लटका पाया था नीम के पेड़ से.
वह मासूम समझ नहीं पाई थी
इसकी वजह ?.
लेकिन यौवन की दहलीज़ पर
कदम रखते ही
सच नंगा हो नर्तन करने लगा
उसके समक्ष.
ठाकुर के बेटे की नज़र पड़ते ही
कुम्लहा गया उसका वजूद.
और
एक दिन
दरवाजे को ठेल
ठाकुर का बेटा घुसा था घर में.
माई नीम के पेड़ के नीचे
पागल सी हालत में बैठी रही.
एक तरफ भय से कांपती
दर्द रिस रहा था आँखों से
और
दूसरी ओर ठाकुर का बेटा
नौचता रहा सुतली के
कोमल गदगदाए बदन को.
सुतली फटी आँखों से
सच को निर्वस्त्र होते
नंगा नाच करते देखती रही,
होती रही वह पीड़ा से दोहरी
और
अपनी जांघे भीचें
दलित होने के शोक कुंड में
वेदना की आहुतियाँ डालती रही.

वैसे दलित को छूकर
अपवित्र होने वाला जिस्म,
इस घृणित कर्म से
न जाने
कितने पापों का भागी बना होगा ?.
और
उसका फल उसे
इस जन्म में या अगले जन्म में
मिलेगा, भी या नही....पता नही
लेकिन सुतली जैसी
न जाने किस
प्रारब्ध का पाप भोग रही है
और
रोज इस वेदना से गुजर रही है

टिप्पणी ----- समाज में दलित महिला किस तरह प्रताड़ित होती है और उनके बच्चियां भी उसी ऊँच जात के घिनौने कृत्यों की शिकार होती है... एक घटना को याद करते हुए कुछ मन के भाव



कुसुम शर्मा 
~नन्ही सी जान~


जाने कैसे चक्रव्यूह मे फँस गई
एक टोफ़ी के कारण
हैवान की भेंट चढ़ गई !

वो नन्ही सी जान ,थी इस से अंजान
अँकल कह कर पुकारती थी
उसको वो समझाती थी

मत ऐसे प्यार करो अँकल
मुझे बहुत दर्द होता है
पापा मेरा माथा धीरे से चूमते है
आप क्यो ऐसा करते है
क्या आप अपनी बेटी से ऐसा प्यार करते है

मेरे कपड़े मत उतरो अँकल
ऐसा कोई करता है
माता के नवरात्र मे
कंजक का पूजन होता है
हर कोई चुनरी भेंट करता है
कपड़े उतरता नही

मुझे छोड़ो अँकल
मुझे घर पर जाना है
माँ ने बना लिया होगा खाना
मुझ को वो खाना है

कह रही थी रो रही थी
तुम चाहो तो चूड़ी ले लो
मैरी घड़ी और गुल्लक ले लो
उसके सारे पैसे ले लो
जो मैने बचाये थे
अपनी गुड़िया की शादी के लिए
वो सारे ले लो

माँ कहती है ग़लत काम नही करते
भगवान जी पाप देते है
ऐसे मत करो अँकल
बड़े कहते है भगवान जी
बच्चों की सुनते है
वो आ कर तुमको मारेंगे
ऐसा मत करो अँकल
वह कहती रही
हवस का पुजारी
उसका चीर हरण करता रहा
दर्द से तड़पती नन्ही कली
भगवान को पुकारती रही
न कोई भगवान आये
न कोई इंसान
बस था एक हैवान
जिसने किया उसे लहु लुहान !

टिप्पणी :- अपनी हवस की अग्नि को पूरा करने के लिए ऐ हैवान नाबालिग़ बच्चियों को भी नही छोड़ते उन्हे टोफ़ी का लालच दे कर ये धृत कार्य करते है नन्ही बच्ची चिल्लाती रहती है उसे समझाती है पर वह उसकी एक नही सुनते वह तो बस अपनी हवस पूरी करते है !!



अलका गुप्ता 
~~~~~बिटिया की आस~~~~~

हौसले..अरमान..होंगे पूरे..इक दिन..यही आस थी |
समेट लुंगी..खुशियाँ..सारी..बाँहों में..यही आस थी ||

तोड़ मरोड़ कर झिंझोड़ दिया हाय इसनी वहशत क्यों |
देखती दुनियाँ तमाशबीन ये मन को न ही आस थी ||

टूट गई हूँ ...विकल विवश सी...मन में इतनी दहशत है |
शर्म करो उफ़.. प्रश्नों से..जिनकी न कोई भी आस थी ||

देखो..अपराधी..स्वच्छंद..यहाँ...भेड़ियों की खाल में |
कैसे बनी..मैं ही अपराधिनी..न ही..इसकी आस थी ||

मानवता से...करूँ घृणा या ..देखूं ..हर मन ...संशय भर |
रक्षक समझी थी विश्वासघात की न जरा..सी आस थी ||

मिलती नहीं सजा भी क्यूँ..समझ न पाए बिटिया यहाँ |
इन घावों की सजा दे कोई...दिल को जिसकी आस थी ||


नोट__
लगा था मुझे .. मैं भी .. इक इन्सान हूँ |
डूबी जिन्दगी क्यूँ आँसुओं में .. हैरान हूँ |
बता दो कोई .. इस दर्द की दवा क्या है ?
या मैं सिर्फ .. हवस का...एक सामान हूँ ||



Ajai Agarwal
''मुझे सहारा दे माँ ''
============

== सीता- उर्मिला
राधा- दमयन्ती
कुंती -गांधारी
द्रौपदी हो या जरत्कऋ
या फिर शकुंतला
कितने नाम कितनी
वेदनाएं ----
सदियों से सदियों तक
अबला जीवन ,बेचारी
आंचल में दूध आँखों में पानी
सुनो सदियों पहले ----
सीता -प्रमद्वरा जरत्कऋ
कोख में नहीं मारी गईं
छोड़ दी गईं--डर से
माँ का आंचल न मिल सका
तब से अब तक
कुछ बदला ?
अब- कोख में उठती हैं चीखें
आंचल तो क्या ,
साँसें भी नहीं मिलतीं बेटियों को ।
जो सूर्य - किरण मिल भी गई
अँधेरा कब डस लेगा पता नहीं
कीड़े वासना के घर - बाहर
बिलबिला रहे चहुं ओर ,
नारी देह का अर्थ ----
'' कनक छवि सी कामिनी काहे को कटि हीन -
कटि को कंचन काट के कुचन बीच धरि दीन ''
से आगे नहीं है -
बलात्कारी बच्ची - बूढी
सबको देह ही समझे '
लालची आँखें वस्त्रों में भी
देह को नग्न ही देखें ,
कौन समझेगा नन्ही की पीड़ा
चहकती गौरैया पे घिनौना कुकर्म ,
घर में , वेदना में -
मुहं बंद रखने की सीख -
भाई के अधिकार
बहन का व्यापार ,
माँ तू क्यूँ चुप रहती
सुन माँ तू सुन !
बिटिया की पुकार सुन -
उसकी चीखें अपनी कोख में सुन
बलात्कार की पीड़ा सुन
माँ एक तू ही है
तू ही बस !
बचा ले अपनी बेटी को ,
फैला दे ममता का आँचल
दे सहारा --
माँ तू दुर्गा बन ,दुर्गति नाशिनी
घायल चीत्कार करते मन को
डरी हुई छुटकी को
सृष्टि की अनुपम कृति को
बचा ले माँ
तू दुर्गा बन जा
बिटिया स्वयं ही
लक्ष्मी बाई हो जायेगी ।

टिप्पणी:
---सदियों से नारी शोषित ही रही है , प्यार की मूरत सदियों से समाज के लिये अपने को अर्पित करती रही है । सीता ,राधा ,प्रमद्वरा ,सभी को किसी न किसी डर से माँ ने छोड़ दिया । दो वर्ष को हो या अस्सी वर्ष की लम्पट वहशी वासना के कीड़े को तो नारी देह ही दिखती है --माँ को ही मजबूत बनना होगा न्याय दिलवाने के लिए ।आभा ॥


प्रभा मित्तल
~~स्त्री-मन~~
~~~~~~~~~
ऐसे मत कर, वैसे मत कर
पराया धन है मर्यादित रह,
यहाँ नहीं, वहाँ मत जाना
दूजे घर जाना है तुझको
अपने मन पर अंकुश रख,
तमाम उसूलों से बँध कर
सहमी-सहमी डरी हुई,
सुन-सुन कर ही बड़ी हुई।

ये कैसी है अद्भुत् लाचारी
जिस नारी से जन्मा जग
बनी है आज वो बेचारी
घर से लेकर बाहर तक
हो रहा शोषण नारी का
हिंसा और बर्बरता का खेल
चल रहा हवस के मारों का।

कहीं है वह केवल भोग्या तो
कभी समझी गई पैर की जूती।
न संवेदना न निजत्व कहीं,
नहीं महकती पति-स्पर्श से
स्त्री की देह कभी गन्धाती है
उसके भीषण काम-प्रहारों से।

आज ये क्या हो रहा है..दैव!
भाग्य में अब क्या बदा है--
तृष्णा की तृप्ति की खातिर
हठात् और बलात्..ये पुरुष
जघन्य अपराध कर रहा है।

स्त्री हूँ , जननी भी हूँ
मैं रुदन को थाम लूँ
पर कैसे,कब तलक--
आँसुओं की बाढ़ को
क्या रोक लेंगी ये पलक?
आकुल हृदय की पीर को
जलते दृगों के नीर को
पापियों के ज्वार को
थामे रहूँगी कब तलक?

टिप्पणी
(आज समाज में स्त्री की दुर्दशा देखकर मन में उपजे भाव)



सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Thursday, June 9, 2016

#तकब4 - तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता 4






#‎तकब४‬ [ तस्वीर क्या बोले प्रतियोगिता #4 ]
मित्रो लीजिये अगली प्रतियोगिता आपके सम्मुख है. नियम निम्नलिखित है 
१. इस चित्र में है दो चित्र - दोनों में सम्बन्ध स्थापित करते हुए, कम से कम १२ पंक्तियों की रचना का सृजन करे शीर्षक सहित. 
यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
२. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है कि आपने रचना में उदृत भाव किस कारण या सोच से दिया है, 
३. प्रतियोगिता में आपके भाव अपने और नए होने चाहिए. 
४. प्रतियोगिता ७ जून २०१६ की रात्रि को समाप्त होगी.
५. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा.
६.आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक प्रतियोगिता समाप्त न हो और उसकी विद्धिवत घोषणा न हो एवं ब्लॉग में प्रकशित न हो.
विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और जो निर्णायक दल के सदस्य है वे भी इस प्रतियोगिता में शामिल है हाँ वे अपनी रचना को नही चुन सकते लेकिन अन्य सदस्य चुन सकते है. सभी का चयन गोपनीय ही होगा जब तक एडमिन विजेता की घोषणा न कर ले.


इस बार  के  विजेता  है " प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल "


1.
बालकृष्ण डी ध्यानी 
~कल्पना और हकीकत~

एक पेड़ है एक इंसान
कल्पनाओं की है ये उड़ान

कृष्ण धवल है जिनका स्थान
कल्पनाओं का रंग फीका जान

चुप है वो शांत अकेला खड़ा
अपने से वो अब क्यों बोल पड़ा

खो गयी है अब उसकी पहचान
सजीव है वो उसे तू निर्जीव जान

छोड़ चुके अब मन के प्राण
कल्पना समझ या हकीकत जान

खो गयी है अब वो मुस्कान
चुप है एक पेड़ अब चुप है एक इंसान

टिप्पणी:
कल्पना और हकीकत में ताल मेल बैठने का काम कराती ये रचना हमे अपने अब के यथार्त जीवन के दर्शन को दर्शाने की एक छूटी कोशिश की है जो रंग से बेरंग होती जा रही है


2.
Pushpa Tripathi 
~तन रूपी एक पेड़ उदास~.

नन्हा मन अंजान था
सपने बहुत देखे उसने
उम्र नादान ... अनुभवों से अज्ञान
अभी तो
छोटी छोटी कोंपल से बनती
बाद जैसे शाखाओं पर
हरी हरीभरी पत्तियाँ
पूरा का पूरा वृक्ष उत्साहों से घना बना
मन ----- अंजान उदासी से परे
फैला हुआ !!

बडा हुआ मन ,,,,,, अब
असंख्य बाधाओं विपदाओं से सना
बैठा अकेला सोचने .... करे भी तो कैसे करे
समस्या के उलझ सुलझ में
कर्तव्यो का पूरा काम !!!!

जो हौसले कल थे फूले फले
आज रंग बना एक गहरा आभास
इसी सोच में सिर्फ पत्ती नहीं बल्कि
मन सहित तन रूपी एक पेड़ उदास !!

टिप्पणी:
( आयु के एक ऐसे पड़ाव में खुशियाँ बहुत होती है जब मन बच्चा होता है उस समय उमंग और हौसले में ज्यादा फर्क नहीं रहता किन्तु उम्र के साथ जिम्मेदारियाँ व कार्य का भार बढ़ जाने से हरित मन उदास हो जाता है .... कविता का भाव इसी को दर्शाता है। )


3.
नैनी ग्रोवर 
~मन और तन~

थक चुके हैं,
मन और तन,
कहाँ जाके अब,
चैन मैं पाऊँ,
दूर-दूर तक,
धूप ही धूप है,
जिस और भी,
नज़र घुमाउँ..

जाने कहाँ,
गुम हुआ वो पेड़,
जिसपे झूला,
मैं झूला करती थी,
जिसकी ठंडी-ठंडी,
छाँव को,
माँ का आँचल,
समझा करती थी,
अब जाके वैसा,
आराम कहाँ में पाऊँ..

खूब घनेरे पत्तों से,
आँगन में,
छाँव बिछाये,
यहाँ वहां,
सारे घर को,
खुशबु से महकाए,
वो दोस्त मेरा,
फिर से कोई,
इक बार ढूंढ के लाये,
देखूँ उसे तो फिर से,
लौट जीवन में आऊँ...

ऐसा ना हो,
घुट जाए दम,
साँसे रुकने लगें,
हवा हो जाए कम,
ना मिले कोई दवा,
लाचारियों की,
हर घर बने जाए,
पनाह बीमारियों की,
जाओ जाओ,
उसे ढूंड लाओ,
इस सुलगते वीराने से,
मुझको बचाओ,
करूँ विनिति मैं,
अपनी झोली फैलाऊँ...!!


टिपण्णी:-
पर्यावरण एवम् पेड़ों के प्रति मानव जाति की लापरवाही ।



4.
Kiran Srivastava 
[प्रकृति और हम]
======================

जीवन में ठहराव कहां है
धूप ही धूप है, छांव कहां है....

पहले पेडों की छाये में
थक हार सुस्ताते थे

फिर आगे जाने की
हिम्मत हौसला पाते थे

हरियाली नाराज हो गयी
पेडों की अब छांव चली गयी...

गर मानव करनें की ठानें
पत्थर पर भी घास उगा दे

लेकिन क्यों सुस्ती है आयी
प्रकृति पर घोर आपदा छायी

प्रकृति पर हम हैं निर्भर
हमसे प्रकृति ही कायम है

सोचें कुछ ऐसी तरकीब
रहें हमेशा प्रकृति के करीब....

टिप्पणी-
पर्यावरण की रक्षा हमारी रक्षा है। पर्यावरण को बचाना हमारा कर्तव्य है।



5.
Prerna Mittal 
~एकांत~

तरु एक विशाल, बीज की छाती को चीरता,
अचल वह, हवा के तेज़ थपेड़ों को झेलता ।

पनपता, बढ़ता, वह आत्मचेतना से भरपूर,
शांत, चुप, अपने आप में मग्न और मगरूर ।
ना जाने क्या सोचता, मस्ती में झूमता,
अपनी शाखाओं और पत्तों को चूमता ।

आदमी को भी चाहिए थोड़ा सा एकांत,
सो बिताए वह स्वतः कुछ एकाकी क्षण
जिससे कर पाए आत्म विश्लेषण
पहचान पाए अपना अंतर्मन

क्या यह नीरवता दे पाएगी उसे शांति ?
कि खोज पाए वह अपने 'मैं' को ?
जो उससे कहीं खो गया है ।
वक़्त की धारा में बह गया है ।

अपने ही अस्तित्व से बेख़बर रहा अनजान भय से,
आज हिम्मत जुटाकर ईमानदार हुआ स्वयं से ।
आया इस सुनसान जगह,
जानने कि है, कौन वह ?

संसार से मुँह फेर,
बैठा रहा, पता नहीं कितनी देर ?
प्रारम्भ में सकुचाता,
कैसे करे अपने से ही वार्ता ।
आहिस्ता से निज से खुलता,
कभी हँसता, कभी रोता ।

आज ख़ामोशी का आलम लगता सुहाना
कितना अपना, कितना सुखद यह वीराना
मन की परत-दर-परत खोलता हुआ
आज हर सिलाई, हर टाँका उधेड़ता हुआ

हर बीते पल को टटोलता, परखता,
कहाँ हुई चूक और कहाँ मिली सफलता ।
कब किया कुछ बहुत ख़ास,
जिसने कराया तृप्ति का एहसास ।
कब हो गई यह इतनी भयंकर भूल,
अफ़सोस ! हटाई नहीं ग़लतफ़हमियों की धूल ।

आज हुआ आत्मबोध, जागी चेतना
तो बिहंसा और मुस्कराया ।
हँसी आई ख़ुद पर,
क्यों हमेशा राई का पहाड़ बनाया ।

आज आभास होता वे थीं अर्थहीन छोटी-छोटी बातें
जिनके लिए गँवाईं उसने तमाम दिन और रातें

वृक्ष जिस तरह अपने आप में ख़ुश रहता है ।
जीता है और जीने देता है ।
एकांत, मौक़ा देता आत्म विचार करने का
देता जीवन को लक्ष्य, करवाता बोध पूर्णता का ।

- प्रेरणा मित्तल

टिप्पणी:
मनुष्य व पेड़ दोनों प्रकृति का हिस्सा हैं । दोनों को ही भली-भाँति बढ़ने के लिए थोड़ा सा एकांत (space) चाहिए । असली ख़ुशी व शांति अपने आप को जानकर ही प्राप्त की जा सकती है ।


7.
भगवान सिंह जयाड़ा 
----ढलती काया----

इंशान हो या पेड़ जब ढल जाती है काया,
साथ छोड़ देता है जब अपनों का ही साया,
बस एकाकीपन और तन्हाई ही रह जाती है,
तब बीते लम्हों की यादें मन को बहुत दुखाती है,
जिस के चारों तरफ कभी उसके बहुत मंडराते थे,
कमी न रहे इनकी परवरिश में बहुत घबराते थे,
जीवन के इस पड़ाव में अब सब ने साथ छोड़ा,
निहार कर अपने लगाये पेड़ से शकुन मिलता थोड़ा,
कोई साथ नहीं तो क्या हुवा,साथी पेड़ खड़ा है,
मेरी तरह वह भी आज अकेला निर्जन पड़ा है,
बूढा पेड़ फल भले ही न दे,पर देता शीतल छाया,
आशिर्बाद ही बहुत है बुजुर्गो का जब ढल जाती काया,
करो सम्मान इन का पेड़ हो या कोई बुजुर्ग इन्शान,
मिलती एक असीम शान्ति और खुश होंगे भगवान,

-----भगवान सिंह जयाड़ा--
------------------------------------------
टिप्पणी:
अक्सर बुजुर्ग इन्शान और जर जर पेड़ों की अवहेलना को देख कर यह लिखने का मन किया,,धन्यबाद


8
प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~ शाश्वत सत्य ~

वृक्ष और जीवन
कहाँ विलग एक दूजे से
जन्म संग हो सुवासित
विकसित चलते दोनों
कोमल पौधा एक दिन
वृक्ष बन कर इतराता
बचपन से यौवन का हाथ थाम
दोनों हरित हो कुसुमित होते
जीवन के नित नए पल है बोते

एकांत से उपजी पीड़ा
अलग कहाँ होती है
वृक्ष और मानव जीवन
जन्म मरण से है बंधे
जन्मचक्र नियति का धारक
अंतिम पथ पर सब चले अकेले
रिश्ते नाते मोह जीवन का
एक पड़ाव पर सब व्यर्थ लगे

राह दुर्गम और पथ अनजाना
किस पल जाने मृत्यु वरे
बसंत सा उज्ज्वल यौवन
फिर पतझड़ की रुत आती है
टूटे मन के सपन सलोने
मृगतृष्णा सा जीवन लगता है

जाना है निश्चित
है मृत्यु शाश्वत
अंतिम पथ पर है कर्म खड़े
जो बोया वहीँ है काटे
जीवन पर यह नियम चलेतो

टिप्पणी:
जीवन एक समान पौधा हो चाहे इंसान... अंत तो एक ही है - अटल सत्य



9.
किरण आर्य 
****अंतिम यात्रा****

बचपन, यौवन का मन लिए
बुढ़ापे का जर्र जर्र तन लिए
झेल रहा है एकांत
मन में लिए कई संताप
बस अंतिम साँस के इंतजार में

सोच रहा जीवन वृक्ष सा
पथिक सा लाभ सभी उठाए
एक दिन जल कर
बन लकड़ी चूल्हे की, शायद
किसी घर का पेट भर जाए

सांस रुकी, अपने ही जला देंगे
बची खुची होगी जो राख
गंगा में विसर्जित कर देंगे
यही अंतिम यात्रा....
सत्य जीवन का यही कहलाये

टिप्पणी:
एक तरफ जीवन है लहराता और दूसरी ओर इंसान खुद पर तरस खाता - अंतिम सच से अवगत


10.

कुसुम शर्मा 
~आज और बिता कल~
-----------------

कोई क़तरा तेरी आँखो से गिरा तो होगा
कोई शख़्स तेरे सामने से गुज़रा तो होगा
जो आज है सौन्दर्य से रहित
वो कभी हरा भरा रहा तो होगा
कभी कोई पथिक तेरी छांव मे बैठा तो होगा
कभी किसी की थकान मिटी तो होगी
जो आज है निर्जन सा
उसमें कभी बाहार आई तो होगी
जाने कितनी आँधियों से गुज़रा होगा
जाने कितनी मार सही होगी
जो आज है परायो सा
वो कभी अपनो के बीच घिरा तो होगा
कोई क़तरा तेरी आँखो से गिरा तो होगा


टिप्पणी :-
ढलती उम्र के पड़ाव मे सब कुछ बदल जाता है वृक्ष जब तक हरा भारा रहता है सभी उसकी छांव मे बैठते है जैसे ही उसके पत्ते गिरने लगते है लोग वहाँ बैठना भी पसन्द नही करते इसी तरह जब तक कोई व्यक्ति अपने परिवार और समाज की अवश्यकता की पूर्ति करता है तब तक हर कोई पंसद करता है !


11.
अलका गुप्ता 
~~~~~~~~
नव-चेतना
~~~~~~~~~
कर विनाश हरीतिमा का..
अंधकार तूने ही वरा है |
स्वार्थी अतृप्त ज्वाला से..
बाँझ कर दी वसुंधरा है |
यह तिमिर वाचाल बोल रहा |
विष अम्बर में सब घोल रहा |
भाव विमूढ़ सा तू पछताएगा |
चेतन ..अवचेतन फर्क न ..
कुछ भी ...तू ..समझ पाएगा |
अब भी तो ...तू चेत जरा |
जग कर ..कुछ नव.. संधान कर |
प्राण वायु का कुशल संवाहन कर |
हरित वसुंधरा का पुनः श्रृंगार कर |
श्वेत-श्याम को परे सकेल |
सोंधी माटी ...कलरव खेल |
वन..पांखी.. पंछी खेल |
जल थल नभ चर में भरे संवेग |
भरें रंग.. हास हरित ..अतिरेक |
'सर्वे भवन्तु सुखिनः' से ...
विश्व शान्ति का ..करें अभिषेक ||

__________________अलका गुप्ता____

नोट-इंसान ने हीअपने स्वार्थ में इस धरा का अब तक विनाश किया है जंगल वृक्ष पहाड़ काट कर जल और वायु हरियाली का विनाश किया है...हमे ही जाग कर इनमे चेतनता को समझना होगा | ..हमारे सफल प्रयास से समस्त वातावरण पुनः विभिन्न जीव जन्तुओं पशु पक्षियों के सुख शान्ति का आधार बनेगा और संसार सजीव रंगों से जीवंत हो उठेगा |





12
Ajai Agarwal आभा  अग्रवाल 
 -- वृक्ष ; मित्र मेरा ---
========
दादाजी ने बिरवा रोपा था ,जिस दिन मैं धरती पे आया
तेरी मेरी एक ही आयु , फिर क्यों मेरा चेहरा पीला
रीढ़ झुक गई मेरी आज ,तरु तू अब भी तना खड़ा है
मैं नितांत अकेला खोया सा ,खग-कुल गाँव तेरे आंचल में
चकित थकित चितवन मेरी ,तेरी छाया से महक उठी
जीवन की वो आपाधापी ,महत्वाकांक्षाओं के जंगल
मैंने जिस को सुख समझा था , निज अस्तित्व मिटा ; जिन को सींचा था
संध्या बेला में जीवन की ,वे सभी अपनी ठौर बस गए
आज तेरी शरण मैं आया ,मित्र बचपन का याद आया
तेरी शाखाओं पे लटका करता था , झूला भी झूला करता था
तू ही मेरा बस इक अपना ,तूने मुझको गले लगाया
छू तुझको तृप्त हुआ मैं ,अवसाद तिरोहित तेरी छाया में
दादा -पिता जब अशक्त हो गए ,क्यों ! तेरे नीचे बैठा करते थे
आ तेरी छाँव तले ,जब ! समय निज दुःख का मैं भी भूला
तभी समझ ये मेरी आया !
ऐ मित्र तू पुरखों का साथी , सच्चा सखा मेरे बचपन का
मैं अचेतन जड़ भी मैं था ,चेतना का संसार तरु तू
बादलों के आंसुओं का मोल है तू , मित्र मेरे
आज मारुत खेलता तृण -तृण तेरे की ओट लेके
मौन हूँ , है शून्य मन में ,स्तब्ध होकर सुन रहा
गान विहगों का यहाँ मैं, ताल पत्ते दे रहे है
नृत्य करती डालियां ,मन का कलुष सब धो रही है
मैं रहा स्वारथ में डूबा ,तू साधू परमार्थी है
आज अग्नि ले हृदय में ,विनती जग से कर रहा हूँ
वृक्ष रोपो ,वृक्ष पालो ,वृक्ष को संतति बना लो
वृक्ष मुरझाने न पाये ,फलें फूलें औ लहराएं
वृक्ष ही है सच्चा साथी , प्रकृति की अनमोल थाती
जगती के सुख का गान औ कोकिल शुकों का मान तरु ये
पाप पूण्य मुझमें मिलेंगे ,स्वार्थ औ लालच भी होंगे
आज सांझ की इस बेला में मैं तो अकारथ हो चुका हूँ
पर ; होगा जब तरु ये बूढ़ा ,पत्ते झड़ेंगे ,खाद बनकर
हरियाली का पोषण करेंगे ऋण धरा का चुका देंगे
लकड़ियां इस डाल की मेरा अग्नि रथ बनेंगी
मित्र है सच्चा ये मेरा ,ऋण मित्रता का चुका देगा
आज अग्नि ले हृदय में ,विनती जग से कर रहा हूँ
वृक्ष रोपो ,वृक्ष पालो ,वृक्ष को संतति बना लो ॥ आभा ॥
=======
टिप्पणी
जीवन संध्या आ गई तब ही हम प्रकृति के पास जाते है --चलो ये भी ठीक है कभी तो वृक्ष रोपें --वृक्ष ही हमारे सच्चे मित्र हैं ,विकास की यात्रा में इन्हें काटना भी पड़े तो एक की जगह दस लगाएं ,यही उपाय है धरती माँ का ऋण चुकाने का ।



13.
गोपेश दशोरा
~वृक्ष और वृद्ध~

नव पीढ़ी को यह ज्ञात नहीं
शाष्वत सत्यों का ज्ञान नहीं,
जैसा भी जो कोई करता है,
वैसा ही वह भरता भी है।
एक वृक्ष लगा कर आंगन में,
उसको पाला, पौसा सींचा,
बरसों की मेहनत रंग लाई
पेड़ों पर अमिया उग आई।
बरसों तक पाई घनी छाह,
अब फल भी देने वाला है,
जल को पीकर अब एक वृक्ष
सोने को उगलने वाला है।
जब हुआ वृद्ध वह पेड़ कभी,
आंखे क्यू तुमने फेरी है,
अपने शैषव को भूल गये,
और उस पर आँख तरेरी है।
जब तलक तुम उनसे पाते हो,
उनके हर नाज उठाते हो।
जब देने की बारी आई
तब उनसे नजर बचाते हो।
मत यौवन मद में अंधे हो,
यह यौवन तो ढल जायेगा।
जब तु बूढ़ा हो जायेगा,
तब खुद को अकेला पायेगा।
तब याद आयेगे ये दिन तुझको,
पर कुछ भी नहीं कर पायेगा।
मत बोझा समझो बुढ़ो को,
ये घने वृक्ष हैं आंगन के,
फल ना दे कोई बात नहीं
पर छाह तो देंगे ये तय है।
-गोपेष दषोरा

टिप्पणीः अक्सर देखा जाता है कि बच्चे अपने माता-पिता उनकी वृद्धावस्था में अकेला छोड देते है। वे यह भूल जाते है कि जो उनके माता-पिता का आज है वहीं उनका कल होगा।



14.
प्रभा मित्तल
~~एक तुम और एक मैं~~
~~~~~~~~~~~~~~~~~
एक तुम और एक मैं
रहते सघन निर्जन में
हवा की सांय सांय और
पत्तों की खड़ खड़, अब
बस यही बचा जीवन में।

बोलते हैं हम एक सी भाषा
सहते हैं एक से द्वंद
वक़्त के गर्म थपेड़ों से
झुलस गए हैं मर्म के छंद।

प्राणी ने कुदरत को तड़पाया
नियति ने मनुज भरमाया,
तल में जब हुई हलचल तो
जलधि सुनामी भर लाया।
सबने अधिकार बराबर पाया।

मनुज यदि सँभल जाए तो
प्रदूषण की कालिख मिट जाए
हरी भरी हो धरती औ तुम्हारी
साँसों का जीवन बढ़ जाए।

उम्र के इस मोड़ पर एकाकी
थक हार कर बैठा ,रे मन !
विगत में डूब -उतर,क्या
सोच रहा जीवन का लेखा।

वृक्ष हमारे जीवनदाता !
होता प्रहार तुम पर, तो
मौन हो सह लेते हो वार।
मैं विद्रोही बचपन का
पर झेल नहीं सकता
रोता हूँ जार-जार,
आखिर क्यों ? क्या-
मेरा खून... खून
और तुम्हारा पानी ?

तुम जग पालित,कर्म-बद्ध!
मैं विधि शापित,होकर निवृत्त
आहें भरते हैं दोनों ...लेकिन
अब भी, तुम मौन, मैं मुखर।
तुम विशाल हृदय,मैं अनमना
इस वसुन्धरा के ही वासी-
एक तुम और एक मैं।
--प्रभा मित्तल.

(मनुष्य के प्रहार को वृक्षों ने चुपचाप सहा.. उसी सोच से उपजा मन में कुंठा का भाव।)


15.
नीरज द्विवेदी 

~ऐ मनुज, क्या बोलता है~

ऐ मनुज तू
दंड दे मे-री
खता है,
खोदकर अप-नी
जडें, ही
मृत्यु से क्यों
तोलता है?
धार दे चा-कू
छुरी में
और पैनी
कर कुल्हाड़ी,
घोंप दे मे-रे
हृदय में
होश खो पी
खूब ताड़ी,
जान ले मे-री
हिचक मत
बेवजह क्यों
डोलता है?
रुक गया क्यों
साँस लेने
की जरूरत
ही तुझे क्या,
मौत से मे-री
मरेगा
कौन, क्यों, कै-से
मुझे क्या,
सोच, तू अप-नी
रगों में
ही जहर क्यों
घोलता है?
नष्ट कर सा-रे
वनों को
खेत तू सा-रे
जला दे,
सूख जब जा-ए
तलैया
ईंट पत्थर
से सजा दे,
छेद कर आ-काश
तू अप-नी
छतें क्यों
खोलता है?
है जमीं ते-री
बपौती
और पानी
भी हवा भी,
छीन ले मा-तृत्व
इसका
और विष दे
कर दवा भी,
बाँझ कर फिर
इस धरा को
मातु ही क्यों
बोलता है?


टिप्पड़ी - मुझे लगा कि एक वृक्ष अपनी व्यथा को भुलाकर उसे काटने आए मनुज को आइना दिखा कर व्यंग्य करते हुए ये बताने और समझाने की कोशिश कर रहा है कि मेरी साँसे तुम्हारी साँसों से जुडी हुयी हैं, इस सम्बन्ध को न पहचानने पर तुम्हारा विनाश तय है।


16.
 Madan Mohan Thapliyal 

~अंतर्द्वंद्व ~

मन मारे बैठा पथिक,
देख पेड़ की डाल.
वीरान है जिन्दगी,
एक दूजे से पूछें, कैसे तेरे हाल.

बढ़त-बढ़त तृष्णा बढ़ी,
भई धरा कंकाल,
कौन लेगा सुधि तेरी मेरी,
कौन है अपना, जो पूछे सवाल.

लालच की गति रुकती नहीं,
भूख है कि बढ़ती जाए.
सब कुछ खा लिया रे बावले,
हाय ! प्यास तेरी कबहुँ न जाए.
जल मैला, हवा दूषित,
विनाश के ए हाल.

सांस लेनी दूभर हो गई,
कैसे कटें उमरिया के बाकी साल.
पानी खरीद कर पी रहे,
देश के होनहार नौनिहाल.
हवा जब बिकेगी बाजार में,
तब कैसे होंगे हाल.

सांसों पर भी होंगे पहरे,
बदल जाएगी सारी चाल.
जिन्दगी होगी गिरवी सबकी,
पर्यावरण के दुश्मन होंगे मालामाल.
औरों की छोड़ अपनी सुध ले प्यारे,
छोड़ पिपासा और बनना एक सवाल,

जैसे आया वैसे जाएगा,
थोड़ी लकड़ी और दो गज कफ़न का है सवाल.
वनस्पति और मानव का,
चोली दामन का साथ.
रोक सके तो रोक ले,
नहीं तो होगी नहीं प्रभात !!

टिपण्णी :- आदमी और पर्यावरण का चोली दामन का साथ है एक दूसरे के बिना जीवन

असम्भव है, समय से चेतना का उदय ही मानव की जिन्दगी बचा सकता है..............शैल

(मदन मोहन थपलियाल)


सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Wednesday, June 1, 2016

तकब खुला मंच #1



तकब खुला मंच #1
समूह का यह पहला खुला मंच है. माह के अंतिम सप्ताह में प्रतियोगिता नही होगी. यह एक खुला मंच होगा चर्चा, परिचर्चा, समीक्षा हेतु. इस खुले मंच में हम एक युवा प्रतिभावान रचनाकार को आमंत्रित करेंगे. उनकी कविता के साथ एक चित्र प्रस्तुत करेंगे. परिचर्चा के दौरान वे ही आपकी रचनाओं की समीक्षा करेंगे - एडमिन किरण प्रतिबिम्ब
मित्रो इस बार हम मृदुभाषी, सरल, सच्चे व्यक्तित्व के युवा रचनाकार  "अमित आनंद पाण्डेय " जी का हम सभी स्वागत करते है और उन्हें आमंत्रित करते है इस खुले मंच की अध्यक्षता हेतु. वे आपकी रचनाओं को पढ़ेंगे और उन पर अपने विचार रखेंगे - स्वागत एवं आभार - शुभम
[धन्यवाद  अमित जी आपके समय व्  मार्गदर्शन हेतु ]
कुल १३  रचनाये 


नैनी ग्रोवर
~पागलपन ~

गुस्से में आपे से बाहर,
पगलाये से,
कौन हो तुम ?
जात पात के नाम पे,
ज़रा ज़रा सी बात पे,
लिए हाथों में हथियार,
एक दूजे को
मिटा देने को बेकरार,
हाँ हाँ फूंक दो गाड़ियाँ,
जला दो बसें,
नोच लो,
मेहँदी लगे हाथों की महक,
बस ज़रा रुक के
इतना तो बता दो
कौन हो तुम ?
धर्म के ठेकेदार ?
समाज के सरदार ?
या किसी और के
हाथों की कटार ?
दो पल को करो याद,
अपनी मासूम बहन को,
माँ बुहारती है रोज़,
उस अपने आँगन को,
छोड़ो, फेंको ये तलवार,
मत करो किसी पे वार,
लौट जाओ अपने घर,
नही है भला रास्ता इधर,
करो कानून पे भरोसा,
उसे उसका काम करने दो,
तुम क्यों चले आये ?
कठपुतली किसी की
बनने को ?
सुंदर है जीवन
इसे प्रेम से गुज़ारो,
भूलो छोटी छोटी बातें,
भूल अपनी सुधारो..!!


प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
~मौत देना चाहते हो~

आखिर,
तुम सड़को पर उतर ही आये
अपने ईमान की बोली लगाने
नहीं जानता कौन है
तुम्हे नियंत्रित करने वाला आका
लेकिन जानता क़त्ल होते है
कोई भाई, कोई पिता, कोई काका


भीड़ में हथियार सहित देख
लगता ! तुमसा बुझदिल कोई नही
क्या मांग रहे हो
और किस से तुम मांग रहे हो
माना जायज होंगी मांगे
लेकिन अपने हक़ लिए कत्ल ?

तोड़ फोड़ कर
किसका नुकसान करते हो
भरपाई तो फिर
हमे तुम्हे ही करनी है
और बिन सोचे तुम
किसी का बेटा छीन रहे हो
किसी का भाई छीन रहे हो
किसी पत्नी की मांग उजाड़ रहे हो

दिल रखते हो या पत्थर
झांको भाई अपने अंदर
इंसान को इंसान समझो
अपने अंदर अपने को देखो
कल तुम् भी इस में
अपनी जान खो सकते हो
अपनी माँ का सोचो
अपने पिता का सोचो
अपनी बहन का सोचो
अपनी पत्नी का सोचो
अपने भाई का सोचो
अपने चाहने वालो का सोचो
उन्हें क्यों जीते जी
तुम मौत देना चाहते हो ..................



~सीमा अग्रवाल~ 
एक नज़्म

ये कौन है जो शब........हाथों में लिए घूमते हैं
ये तिनके आग के आँखों में लिए घूमते हैं

धुएं की शक्ल में आते हैं बिखर जाते हैं
सुकूं की आँख में आँसू से ठहर जाते हैं

कहीं हैरत कही सांसत कहीं वहशत बनकर
हर एक शहर में फैले हैं ये दहशत बन कर

दरो दीवार पे दिखते हैं ये .......दरारों से
बिछे हैं फ़िक्रो यकीं पर मुहीब सायों से

ये जो भी लोग हैं बेसिम्त हैं बीमार हैं ये
ये खुद ही खुद से हैं बेज़ार या अय्यार हैं ये

ये जो भी लोग हैं इंसान नहीं हो सकते
किसी खुशी का ये उनवान नहीं हो सकते

ज़रा सोचो ज़रा समझो ज़रा संभल जाओ
अब इनकी नस्ल को परखो ज़रा बदल जाओ

चलो फंसा लें उँगलियों में उंगलियाँ लाओ
जगा के अपनी खुदी होश में दुनिया आओ

बना लो सख्त इक घेरा अमन के चारो तरफ
शम्मएँ प्यार की रख दो चमन के चारो तरफ

कोई वहशी जो इस तरफ को चल के आयेगा
खुलूसो इश्क की आतिश में पिघल जाएगा..


आभा अग्रवाल 
'' भीड़ ''
मजहब ,धर्म ,वर्ग जाति
औ खिंच गई तलवार लो
पद -प्रतिष्ठा ,सामर्थ्य , आकांक्षा मोह
आ बसे सब लाठियों में ,रूढ़ियों की ताकतों में
वो व्यापारी है अभिलाषा का ,सौदाई महत्वाकांक्षा का -
हांकता वो भीड़ को बेचता सपने घृणा के
भीड़ -हाँ ! ये भीड़ है मस्तिष्क न हो शर्त जिसकी
हों कान औ कुछ कदम जो -
भेड़ों के रेवड़ से चलें ,
हो जोश पर सोचें न कुछ भी
चाहते हों काम करना
पर -------
मस्तिष्क से नहीं ,हाथों से -
नीले आसमान में उड़ने की हो चाहत सभी की
पर ------
तुम्हारे ! दिए पैसों के बल पे
प्रतिक्रिया मात्र में हो दिलचस्पी इनकी
समाज का दबाव -धर्म का दबाव
कुछ बनने का दबाव कुछ होने की चाहत
है ये विचारों के अंधड़ में डोलती भीड़
संपत्ति ,वर्ग ,जाति धर्म -
चक्रवात में फंसी भीड़
ऊँचे पद पाने की हो छटपटाहट
अस्तित्व तिरोहित होने का भय
दूसरा हावी हो न जाय
भयभीत भीड़ -
खो बैठती है संयम ।
भीड़ में शामिल सभी
राम - रहीम औ पीटर -
बाढ़ में बहने वाले फूल हैं
ये मोहरा हैं चंद -कुर्सी में बैठे ,
महत्वाकांक्षी स्वार्थी लोगों का ,
ये भूल गए ,
''मुझे
तरकारियाँ ले जानी हैं
माँ
रोटिया बेल रही होंगी!''
-( अमित )
माँ सभी को करती है एक सा प्रेम !
भीड़ ने अपना ली आंतरिक विसंगति ,
कोई आयेगा समझाने ,हम सचमुच में कौन हैं ?
प्रेम हमारा लक्ष्य है ,
मानवीय गरिमा हमारा ध्येय है -
ये प्रश्न है ?
इसे मैं यूँ ही छोड़ रही हूँ -
तब के लिये जब हम भीड़ नहीं होंगे !



किरण आर्य 
~हर आँख खून की प्यासी ~

हर तरफ फैली बदहवासी थी
फिजाओं में कुछ नाराज़ी थी
थम गईं हर किसी की साँसें
हर आँख खूब की प्यासी थीं।

हाथों में लिए वो खंजर थे
तौबा अजब वो मंजर थे
नफरतों का बाज़ार था गर्म,
हर आँख खून की प्यासी थीं।

जो जिस्म को छिपाए बैठी थी
अपने को अपने में समेटी थी
अस्मत कपड़ों से झाँक रही,
हर आँख खून की प्यासी थी।

वो नन्हा सा एक बालक था
खंजर ने कर दिया घायल था
धरती काँप रही शैतानियत से,
हर आँख खून की प्यासी थी।

वो मुठ्ठी भर जो दंगाई थे,
इंसान नहीं वो कसाई थे,
धर्म की भाँज रहे लाठियाँ
हर आँख खून की प्यासी थी।

जब भी थमेगा यह तूफान सुनो,
मिलेगा सुकून औ इत्मिनान सुनो
वीरानियाँ पूछेंगी बस यह सवाल,
क्यूँ हर आँख खून की प्यासी थी ?



मीनाक्षी कपूर मीनू 
~प्रश्नजाल~
................
स्वर्णिम भारत माँ
की आभा आज
ज़रा सी .....
धूमिल हो गयी
कसमसाहट हैं
उस बंधन की
जो शीशे की
डोर बन गयी ....
भारत माँ को
जकड- पकड़ के
कोशिश है रुलाने की
जगह जगह जख्म दे दिए
खून बना दिया पानी है
कोई लाठी उठी
बचाव के लिए
कोई उठी
बदलाव के लिए
कोई जायज़ मांग के लिए
कोई नाज़ायज़ हक़ के लिए
मगर पिसता इन सब के बीच
आम शरीफ इन्सान है
जूझता दो रोटी को
खाता मगर .....
गोली की मार है
घर से निकल सुबह शाम
पूरी करता घर की मांग
वापिस पहुँच पायेगा
ये तो अब बस
भगवान् से गुहार है
प्रश्नो के जाल में
उलझे हम सब प्राणी
*मनस्वी *....
इस उलझन को
सुलझाये कौन ....?
भारत माँ की
आन -बान को
'इन सब से '
अब बचाये कौन ....????



भगवान सिंह  जयाड़ा
~जन आक्रोश ~
--------------------------------------
आज फिर एक दूसरी अफवाह उड़ी है ,
फिर वही पहले वाली भीड़ उमड़ पड़ी है,
सायद वही फिर धर्म के नाम पर होगी ,
या फिर दलित और सवर्ण जात पर होगी ,
लेकर के हाथों में लाठी डंडे और हथियार ,
बस हर तरफ यह मची है कैसी काट मार ,
जान का दुश्मन बना इन्शान,इन्शान का ,
धर कर बेबजह भयानक रूप हैवान का ,
आग यह फैलाई किसने क्यों और कब ,
बस मरने मारने पर उतारू हो रखे यह सब,
बस मौन खड़ा हो कर हर यह देख रहा है ,
दिल के जख्मो को दिल में ही सह रहा है ,
कुछ लोग अपना ही घर बर्बाद कर रहे है ,
और खुद की बर्बादी का जश्न मना रहे है ,
दुवा है ऊपर वाले से सब को सद्बुद्धि देना,
हे ईश्वर हमारे अंदर के शैतान को हर लेना ,
वह अमन चैन और सुख समिर्द्धि लौटा देना ,
सर्वधर्म और जात पाँत में विशवास  लौटा देना ,



Sunita Pushpraj Pandey
~दंगे की आँच~
दंगे की आँच मे झुलस रहा था
मेरा भारत महान
उसी दंगे की आड़ में
उपद्रवी मचा रहे थे हाहाकार
लूट रहे थे माँ बहनों की इज्जत
जला रहे थे घर बार
वही कही किसी कोने मे
पेट में रोटी की खातिर
सिसक रहे थे नौनिहाल
रोजी रोटी के जुगाड़ को
घर से निकलता पिता लाचार
उल्टा लौट के आ जाता घर को
पुलिस के डंडे खा दो चार


बालकृष्ण डी ध्यानी
~एक पत्थर~

एक पत्थर
हिन्दू का
एक पत्थर
मुस्लिम का
मकसद
बस नेतों का
किस्सा
वो अपनों का
खून की बौछारें
अपने ही वो
गलियारें
मातम है
माँ बहनो का
वो
एक पत्थर



Pushpa Tripathi 
~ना ये खूनी खेल दिखाओ~ .

ओह्ह कितना आक्रोश है
उनकी दुश्मनी में जान है
देना चाहते है जिस्म पर लाठी
गद्दार कितना ... हैवान है !

इंशा नहीं, इस मुल्क में रहते हो
जन्म वतन सरजमीं पर जीते हो
कौन हो तुम किसके लिए करते हो
मजहब के नाम पर दहशत ढाहते हो !

तुम क्या जानो इंसानियत क्या है
आम आदमी की मजबूरी क्या है
पीसकर आता कष्ट मेहनत से वो
सड़कों पर तुम तब लाठी बरसाते हो !

ओ इंशा के पक्के दुश्मन
अमन के नाम पर ठहर जाओ
फेंक दो लाठी बुराई का तुम
खुद भी जियों और जीने दो !

घर किसी का राह देखता
परिवार उसके ही दम से चलता
बक्श दो उनको ... दूर हो जाओ
आतंक का ना ये खूनी खेल दिखाओ !



प्रभा मित्तल.
~~ दहशत ~~

हाथों में खंजर है
खौफ़नाक मंजर है
चीख और धमाकों से
गूँजता सन्नाटा है।

खाने को रोटी नहीं
हथियार तो अपार हैं
गलियों और सड़कों में
लाशों के अम्बार हैं।

रक्त रंजित देह लेकर
बच्चे -बूढ़े,निरपराध
आतंक से भरे,डरे-डरे
मर-मर कर जी रहे ।

मानव ही मानव को
देखो तो कैसे छल रहा
कहीं मज़हब कहीं ईमान
आज चिता पर जल रहा।

अपने ही साए से अब
सहमी दुनिया सारी है
बाँधकर हाथ अपने
लुटने की लाचारी है।

हर रात काली और
हर सहर मुरझाई है
दहशत में डूबी हुई
सूनी पड़ी अमराई है।

धिक्कार है मनुज तुझे
नियतियाँ नित कह रही,
हिंसक भाव सभी तज दे ,
खूनी खेल कर खत्म यहीं।

कोई तो दिन ऐसा होगा
जब ज्योति पुंज प्रखर
फूट पड़ेगी सहसा ही,
निर्भय हो प्रकाश में रवि के
जी जाएगा ये जग भी।

--


डॉली अग्रवाल
~मायाजाल~

सियासत में बेठे , शतरंज खेल रहे लोग
मोहरो की तरह एक दूसरे को पीट रहे लोग !
दरन्दगी की हद से गुजर रहे लोग
जाने कौन सी इच्छा पूर्ति कर रहे लोग !
जान का कोई मोल नहीं , सोच नाच रहे लोग
खून का व्यापार करने वाले , जेब भर रहे लोग !
झगड़े , हमले , आंतक भारी है चारो और
हिन्दू , मुस्लिम की जात नहीं , पिसते जा रहे आम लोग
सुनो ,
मेरे वतन में हिन्दू भी बहुत , मुस्लिम भी बहुत है ---
बस इंसानो की इंसानियत से खाली है लोग



Prerna Mittal 
~झुंड मानसिकता~

चौड़ी सड़क पर सुबह-सुबह,
प्रातःकाल के भ्रमण के वक़्त,
क़दम ठिठके सुनकर कुछ शोर,
सतर्कता से बढ़े, देखते चहूँ ओर ।

मोड़ आते ही देखी भीड़ बहुत बड़ी,
हाथों में दण्ड और लाठी सधी हुई ।
जिज्ञासावश झुण्ड की तरफ़ क़दम बढ़ाया,
एक नेता टाइप लड़के को इशारे से बुलाया ।

आते ही दबंग, एक टेढ़ी हँसी मुस्कुराया,
पूछा, आज सड़कों को क्यों अखाड़ा बनाया ।
बोला, महँगाई छू रही आसमान,
टमाटर, प्याज़ हो या घर का कोई सामान ।

आज हम सरकार को मज़ा चखाएँगे,
मंत्री के निवास पर धरना बिठाएँगे ।
माननी ही पड़ेंगी आज उन्हें हमारी माँगे,
नहीं तो जान से हाथ धोएँगे या तुड़वाएँगे टाँगे ।

आगे भीड़ में एक संभ्रांत सा आदमी,
पूछा, आप क्यों यहाँ, आपको क्या कमी?
बोला, सोचते ही रहे हमेशा करें विरोध,
मनमानी व अन्याय का लें प्रतिशोध ।

आज इस युवा ने नि:स्वार्थ क़दम बढ़ाया है,
हम सबमें उत्साह और विश्वास जगाया है ।
अब तो ना पीछे हटेंगे,
मारेंगे उन्हें या स्वयं मरेंगे ।

सोचा एक मिला पथप्रदर्शक और एक पिछलग्गू
मन में आया किसी एक और से करूँ गुफ़्तगू
भीड़ के पीछे नज़र आया एक निराला व्यक्तित्व
पूछा, क्यों भाई कहाँ चल दिए छोड़कर सर्व कृत्य

बोला, लक्ष्य प्राप्ति का बीड़ा उठाया है,
क्या लक्ष्य ? मन में तुमने कौतूहल जगाया है !
सब कर रहे हैं तो कुछ अच्छा ही होगा
उद्देश्य कुछ महत और सच्चा ही होगा ।

मैंने तुरंत किया सदन की ओर प्रस्थान
दिल में आया मेरा भारत महान



अलका गुप्ता
__आतंकवाद ___

जल रहे गीता कुरान भी ...
साम्प्रदायिकता की आग में ।
वहशत नग्न नाच रही ...
शस्त्र लिए हाथ में ।
आत्मा ही मर गई जिनकी ।
मानवता को कुचल उनकी ।
यही आतंकवाद है ...
क्या यही जेहाद है...?
प्रश्न लाचार खड़ा..मौन क्यूँ ?
जब तडफ रही ...हर तरफ ।
हर दिल ...हर आँख है ।।

___________अलका गुप्ता_____



Kiran Srivastava
 " सियासी चाल"
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कुछ आराजक तत्व
बस! लगातें हैं चिंगारी...
फिर होतें हैं ,
सिलसिलेवार दंगे...
त्राहि-त्राहि चहुंओर
कितने मारे जातें हैं
बेगुनाह लोग...
कितने हो जातें है
बच्चें अनाथ...
देश की दुषित राजनीति
सियासी चाल...
कहीं वोट के लिए दंगे
कहीं नोट के लिए दंगे
कहीं मंदिर-मस्जिद
कहीं मुल्क-राज्य के लिए
कही बदले के लिए दंगे...

दंगाई नहीं होते जन्मजात
हैं ये अयोग्यता के पोषक
अल्प स्वार्थकारी..
दूसरों के हाथों की
कठपुतली मात्र...
नहीं जानते इनका भी
हो सकता है यही हश्र..
अरे! भारत मां के सपूतों
बुद्धि-विवेक का करो उपयोग
देश की आन-बान के लिए
कुछ तो करो सहयोग..!!!!!

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