Tuesday, March 7, 2017

तकब #२ @२०१७


नमस्कार मित्रों 
पुन: आपके समक्ष एक चित्र रख रहा हूँ. इस बार दिए गए चित्र को "व्यंग्य" भाव देने है आपको. नियम व् शर्ते उसी रूप में होंगी, चयन प्रक्रिया भी उसी रूप में रहेगी. श्रेष्ठ रचना को सम्मान पत्र से पुरस्कृत किया जाएगा.
निम्नलिखित बातो को अवश्य पढ़िए.
१. अपने भावों को कम से कम ८ - १० पंक्तियों की काव्य रचना शीर्षक सहित लिखिए. एक सदस्य एक ही रचना लिख सकता है. 
२. यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
[एक निवेदन- टाइपिंग के कारण शब्द गलत न पोस्ट हों यह ध्यान रखिये. अपनी रचना को पोस्ट करने से पहले एक दो बार अवश्य पढ़े]
३. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है जिसमे आपने रचना में उदृत भाव के विषय में सोच को स्थान देना है. 
४. आपके भाव अपने और नए होने चाहिए. [ पुरानी रचनाओं को शामिल न कीजिये ]
५. इस चित्र पर भाव लिखने की अंतिम तिथि १८ फरवरी, २०१७ है.
६. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा. साथ ही कोई भी ऐसी बात न लिखे जिससे निर्णय प्रभावित हो.
७. आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक समाप्ति की विद्धिवत घोषणा न हो तथा ब्लॉग में प्रकशित न हो.
८. विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और निर्णायक दल के सदस्य भी एक सदस्य की भांति अपनी रचनाये लिखते रहेंगे. हाँ अब उनकी रचनाये केवल प्रोत्साहन हेतू ही होंगी.
धन्यवाद !

इस तस्वीर के विजेता है सुश्री किरण श्रीवास्तव एवं श्री गोपेश दशोरा 


दीपक अरोड़ा
~ कब होगा उजाला ~

भ्रष्टाचार का चहुं ओर है बोलबाला
न्याय का हो रहा है मुंह काला
ऑर्डर ऑडर बस करते रहते
छीनते गरीब के मुंह से निवाला
अपने पद की महत्ता न समझी कभी
कागज के टुकड़ों से इसे है धो डाला
जाने कब छंटेगा इनके आगे से अंधेरा
कब फैलेगा ईमानदारी और नेकनीयत का उजाला


टिप्पणी- देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को खत्म करना मुश्किल जरूर है लेकिन नामुमकिन नहीं है। हर कोई यह ठान ले कि रिश्वत देना ही नहीं है तो हो सकता है उनका कार्य विलम्ब से हो, मगर होगा जरूर क्योंकि हम खुद साथ देते हैं इसलिए ही ऐसे कृत्य को बढावा मिलता है।



प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
~ऑर्डर - ऑर्डर~

जब
काया का रूप भाया
ढलती उम्र का
ख्याल तो आया
लेकिन
दिल के
टूटे फूटे दरवाजे पर
दस्तक देती
उसकी कातिल मुस्कान
कुछ समझ से परे था
लेकिन वक्त ने
करा दी जान पहचान
इश्क की अदालत में
मस्तिष्क ने
दिल को दे ही दिया
ऑर्डर - ऑर्डर

बूढ़ी हड्डियाँ
फिर जवान हो उठी
आँखों के परदे पर
मन आतुर हुआ गाने को
तू कितने बरस की ...
तू सोलह मै सतरहा
हटाकर चश्मे का पहरा
भावनाओं के सागर से
भर अहसास की गागर
जोश में खोकर होश
आँखों ने
दिल को दे ही दिया
ऑर्डर - ऑर्डर

बस नई नई जवानी
अंगडाई लेने ही वाली थी
हर उभरता ख़्वाब
सच होने ही वाला था
उम्र का पतझड़
बसंती राह पकड़ने वाला था
कि
एक कड़कती
फेफड़ो को फुलानी वाली
मधुर सी कर्कश आवाज ने
निंद्रा भंग करते हुए कहा
क्या अभी तक सोते हो
उठो ! चाय बनाकर लाओ
और सुनो पतिदेव
एक अपनी एक मेरी
चाय पीते हुए
सेल्फी खिंचवाओं
फेसबुक पर अपलोड करो
अपनी
महिला मित्रो को जलने दो
ये मेरा है
ऑर्डर - ऑर्डर



टिप्पणी: कभी कहीं पढ़ा था ..
कौन कहता है बूढ़े इश्क नही करते ...
वो इश्क करते है लेकिन लोग शक नही करते ....
सोचा इसे यह रूप दिया जाए ख़्वाब में सही लेकिन हकीकत से पहचान भी करवाई जाए :) :)




किरण श्रीवास्तव 
°ये कैसा कानून°


आर्डर- आर्डर
मत कर भईये
बहरापन बढ़ जायेगा,
अंधा तो पहले से
ही था...,
बहरा भी हो जायेगा!

कोई करे घोटाला
कोई डाले डाका,
पर वही जेल में
चक्की पीसे जो
ठन-ठन गोपाला !

नेता -अभिनेता
सेठ- महाजन
लगते इसके भाई हैं,
आंच न आये भाई पर
ये ऐसा जुगत लगाता है..!!

घोंट गला
सच्चाई का ये,
आर्डर-आर्डर करते हैं,
सच्चाई पर बोल दें
खुलकर
क्या ऐसा दिन आयेगा...???

टिप्पणी-
कानून का निर्णय निष्पक्ष होना चाहिए ।लेकिन आज के दौर में रूतबे के हिसाब से सजा का प्रावधान देखने सुनने को मिल रहा है। दबाव में आकर सच्चाई को दबा दिया जाता है प्रस्तुत व्यंग इसी पर आधारित है।





नैनी ग्रोवर 
~आर्डर नहीं देते~


कभी सुबह की चाय,
कभी गर्म पानी की माँग,
चक्ररघिन्नी सी बनी ज़िन्दगी,
ओढ़ औरत का स्वांग...

ठंडी हो गई बाबूजी की चाय,
व्यस्त थे बहुत समाचार पड़ने में,
चाय ही लाई ठंडी बहु,
सासु जी लगीं तौहमत मढ़ने में...

पति जी दफ्तर हैं जाने वाले,
नाश्ता हुआ तैय्यार नहीं,
तुम्हारे जैसा बैठूँ निठ्ठला,
इतना मैं बेकार नहीं...

बच्चों के स्कूल की बस,
बजा भोंपू, कान खाती है,
बस पे चड़ा बाय बाय ना करो,
तो शर्म बच्चों को आती है...

क्या हुआ बहु अगर एक दिन,
कामवाली बाई नहीं आई,
तुम ही करलो झाड़ू पोछा,
कर रही हो घर में कौन कमाई...

बीत रहा है यूँ ही हर दिन,
परिवार की नैया खेते-खेते,
मामूली सी ग्रहस्थन हूँ मैं,
घरवाले नहीं कोई आर्डर नहीं देते...!!


टिप्पणी:- घर की महिला अपेक्षा की जाती है के घर के सभी काम और सबकी देखभाल उसी की ज़िम्मेदारी है, यहाँ तक के उसके माता पिता भी उसे यही सीख देते हैं, और उस पर उनका ये मानना के हम कोई आर्डर तो नहीं देते ये तो उसका फ़र्ज़ है, ये सोचने पर बाध्य करता है के क्या सच में ..? हाँ फ़र्ज़ ज़रूर है सबकी देखभाल का परन्तु उसे मात्र सेवादार समझ लेना कहाँ की इंसानियत है..?




Madan Mohan Thapliyal
~न्याय~

मुंगरी की ठक- ठक
दिल की धड़कन
किसी की जिन्दगी लील गई,
किसी का आशियाना हुआ नीलाम
किसी की किस्मत बेदाग खिल गई.

सरोकार, पैरोकार, चमत्कार
सब हथौड़े के आधीन
सब कुछ होते हुए जिन्दगी पराधीन
न पानी न काँटा
कानून के जाल में फंस जाती है मीन.

यह अपना वतन है
जहाँ वकीलों और जजों की चलती है
कानून अंधा है
कोई मरे या जिए इनकी बला से
दूसरे के आँसुओं पर जिन्दगी पलती है.

सफेद, धवल वस्त्रों में सब काला है
काले अंग्रेजों का हर तरफ बोलबाला है
इनकी ही विरासत इनका ही कानून
इनकी ही दया इनका ही अंकुश
हर गरीब इनका निवाला है.

एक मुकदमा सालों चलता है
घर, जमीन, मान-मर्यादा सब खत्म
कई बार जिन्दगी दांव पर लग जती है
वाह रे ! कानून
मरने के बाद भी यहाँ मरने वाले पर मुकदमा चलता है.


टिप्पणी: कानून अंधा नहीं सचमुच अंधा है, यहाँ कमजोर सदा पिसता है, कोई सुनवाई नहीं, पैसा ही कानून है.



कुसुम शर्मा 
~अंधा और बेहरा क़ानून~
-----------------

पहन के सफ़ेदपोश करते काला काम
अदालतों में आना जाना इनका सुबह शाम
बाँध के पट्टी आँखों में गान्धारी बना क़ानून
धृतराष्ट्र के राज्य में कानों से सुनता कौन
न्याय के पद पर अन्याय का राज
खुले घूमते अपराधी बेक़सूरो का जेलों में वास
रोज़ हो रहा चीरहरण गुहार लगा रही द्रौपदी
लेकिन उसकी चीख़ अब कोई सुनता नहीं
अातंक का चारों ओर शोर है
देखके हर कोई यहाँ मौन है
बन्द पड़े दरवाज़े न्याय के अन्याय के साथ
घुट रही आशाये दम तोड़ रही आस
सालों बीत गये पर न सुधरा क़ानून
अॉर्डर- अॉर्डर करते ही सभी को करता मौन !

टिप्पणी :- हमारे देश का क़ानून सब कुछ देख कर सुन कर भी अंधा और बेहरा है जहाँ से न्याय मिलना चाहिए वही अन्याय हो रहा है !




Sunita Pushpraj Pandey 
~आर्डर आर्डर~


न्याय की देवी के आंखों पर
बंधी पट्टी देख
कानून को शायद अंधा इसलिए सब कहते हैं
हरपल ये हम सोचा करते थे
न्याय की देवी अंधी, गूंगी और बहरी
पर पैसा बोलता है
बड़े बड़े अपराधियों को पैसे के बल पर
बाल बराबर भी आंच न आते देखा
वर्दी पहनते ही कसमें खाते
कानून के रक्षकों को दिग्गजों की
जी हजूरी और उनकी ही सुरक्षा में मुस्तैद देखा

टिप्पणी :कानून कुछ मौकापरस्त लोगों के कारण खरीदा और बेचा जा रहा है



Pushpa Tripathi 
~मुझे छोड़ दिया जाए~


हर बार कहता हूँ अपराधी नहीं मैं
नफरत का पूरा साल बाकी नहीं मैं
दिल में तमाम जख़्म तिरी रहे हम
अब ये हालात की मुद्दतों में गिने हम !!

अजीब आलम का कैदी बना हूँ मैं
सर पे ताज दामन से बेआबरू हूँ मैं
जागती आँखों से दुनिया देखा हूँ मैं
तमाम खतरों के निशानात से वाकिफ़ हूँ मैं !!!

मैं बह रहा हूँ मेरा वजूद पानी है
गिरफ्त के कटघरे जकड़ा नहीं मैं
मैं चाहता हूँ मेरी जिंदगी बरी की जाय
ऑडर देकर मुझे छोड़ दिया जाय !!!

टिप्पणी :- जब दिल समय के अदालत में खड़ा होता है तो उसके पास सिवाय आगाजे उम्र -ए -दराज़ कहने को कुछ नहीं होता ... बस चाहता है हर अंजाम से बरी हो जाय !!!



मीनाक्षी कपूर मीनू 
~आर्डर~

आधुनिक है
नारी आज ,,
माँ काली
दुर्गा और
दुष्ट संहारी है
हँसी आती है
देख पढ़ के
आधुनिकता का ढोंग
करते आज भी
गाँव गाँव में
नर नारी करते
आर्डर ,,,,,
भोजन , पानी
खेत -खलियान
दासी मज़दूर
के कर सब काम
घूँघट आज भी
डाले है बेचारी
आर्डर पूरे कर
नहीं तो ,,,
डांट पड़ेगी भारी
आज भी सबके
आर्डर सुनती
चरितार्थ ये पंक्ति
आज भी करती
ढोर गंवार समान
है ये नारी
बस आर्डर पाने
की अधिकारी
मनस्वी,,,,,,
कभी न्यायालय
कभी शहर में
आर्डर आर्डर
करके
डंके की चोट पे
नर नारी की समानता
का रौला डालते
वास्तविकता
गर देखनी तो
गाँव की उस नारी का
कभी मन पढ़ पाते,,,
उठा के उसके स्वाभिमान को
आर्डर प्यार से सुनते सुनाते
उन्हें भी इंसान की तरह
हँसते हंसाते ,,,, ,,, :)


टिपण्णी ,,,, आज भी भारत की ज़्यादातर आबादी गाँव में नारी को शोषित करती है उन्हें घूँघट डलवा कर प्रताड़ित करती है । उन्हें आर्डर करती है । उनके साथ अच्छा सलूक नहीं किया जाता । ये पंक्तियां आज की नर नारी की समानता पर व्यंग कर रही है जो गाँव में आज भी ,,,, ?


गोपेश दशोरा 
~अन्धा कानून~

है अन्धा कानून यहाँ,
ना कुछ भी इसको दिखता है।
हो जात कोई या वर्ण भेद,
इसके सम्मुख ना टिकता है।
सक्षम हो या अक्षम हो,
अपराधी बस अपराधी है।
नेता हो या कोई धन कुबेर,
ना हक में किसी के माफी है।
कितना अच्छा लगता है,
जब ऐसा बोला जाता है।
तकलीफ तो बस तब होती है,
जब केवल बोला जाता है।
कथनी और करनी में यहाँ,
अन्तर बहुत ही भारी है।
आजादी को तो बरस हुए,
आजाद कहाँ नर-नारी है।
कचहरी के चक्कर में,
जब कोई फस जाता है।
ना जीता है, ना मरता है,
ना उससे निकल ही पाता है।
तारीखों पर तारीख मिले,
एक बार नहीं, सौ बार मिले।
जूते, एडी घिस जाते है,
पर कभी ना उसको न्याय मिले।
दे दो पैसा गर थोड़ा सा,
सब काम फटाफट होता है।
चाहे कितना हो बड़ा जुर्म,
रफा-दफा सब होता है।
काश, एक दिवस ऐसा आए,
गंगाजल अमृत बन जाए।
गीता पर रख कर हाथ कोई,
ना कसम कभी झूठी खाए।
ऐसा एक स्वर्णिम दिन आए,
धन की माया ना चल पाए।
राजा हो या प्रजा सभी
सम न्याय व्यवस्था सब पाए।

टिप्पणीः हमारी न्याय व्यवस्था में काफी दौहरापन है, सभी को समान न्याय की बातें तो की जाती है, पर मिलता नहीं। हाँ अगर पैसा है तो आपकी सजा माफ हो सकती है। पर गरीब को जमानत के लिए भी एडियां घिसनी पड़ती है।



किरण आर्य
~आर्डर आर्डर~

पत्नी ने आंखें मटकाकर
कहा प्रेम से
आर्डर आर्डर
देख पत्नी जी के
तीखे तेवर
पतिदेव की मैया गई मर
बोले प्राणों की प्यारी
तुमरे ये जालिम से तेवर
कर ना दे कहीं
मेरा ये मर्डर
जब भी तुम देती हो आर्डर
बजट जाता है मेरा बिगड़
उड़ता फिरू जितना भी
मैं बावरा
क़तर देती तुम पल में मेरे पर
क़तर कर मेरे पर
तुम जिस पल मुस्काती हो
सांप लोटते है सीने पर
जान मेरी निकल ही जाती है
हाई कोर्ट के जज के जैसे
फैसला तुम सुना देती हो
मैं बेचारा पति तुम्हारा
सफाई भी न दे पाता हूँ
मन ही मन बस हे प्राणप्यारी
खून के आंसू
पी मैं जाता हूँ
उस पल तुम जो मुस्काती हो
आरी सीने पर चल जाती है
तुमरा आर्डर आर्डर अब तो
कानो में दिन रात है गूंजता
मानो या ना मानो तुम प्रिय

ये मन बस तुम्हे ही पूजता है......
[ समीक्षा के दौरान प्रस्तुत रचना }



सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/

Tuesday, January 31, 2017

#तकब१ @२०१७



नमस्कार मित्रों 
एक बार फिर इस समूह के प्रांगण में आपका स्वागत है. आप में से कुछ मित्रों के सुझाव को मध्य नज़र रखते हुए २०१७ की शुरआत एक ही चित्र से कर रहे है. 
इस बार इसे प्रतियोगिता का नाम नहीं दे रहे है. लेकिन नियम व् शर्ते उसी रूप में होंगी, चयन प्रक्रिया भी उसी रूप में रहेगी. श्रेष्ठ रचना को पुरुस्कृत किया जाएगा सम्मान पत्र के साथ. 
निम्नलिखित बातो को अवश्य पढ़िए.
१. अपने भावों को कम से कम ८ - १० पंक्तियों की काव्य रचना शीर्षक सहित लिखिए. एक सदस्य एक ही रचना लिख सकता है. 
२. यह हिन्दी को समर्पित मंच है तो हिन्दी के शब्दों का ही प्रयोग करिए जहाँ तक संभव हो. चयन में इसे महत्व दिया जाएगा.
[एक निवेदन- टाइपिंग के कारण शब्द गलत न पोस्ट हों यह ध्यान रखिये. अपनी रचना को पोस्ट करने से पहले एक दो बार अवश्य पढ़े]
३. रचना के अंत में कम से कम दो पंक्तियाँ लिखनी है जिसमे आपने रचना में उदृत भाव के विषय में सोच को स्थान देना है. 
४. आपके भाव अपने और नए होने चाहिए. [ पुरानी रचनाओं को शामिल न कीजिये ]
५. इस चित्र पर भाव लिखने की अंतिम तिथि १५ जनवरी, २०१७ है.
६. अन्य रचनाओं को पसंद कीजिये, कोई अन्य बात न लिखी जाए, हाँ कोई शंका/प्रश्न हो तो लिखिए जिसे समाधान होते ही हटा लीजियेगा. साथ ही कोई भी ऐसी बात न लिखे जिससे निर्णय प्रभावित हो.
७. आपकी रचित रचना को कहीं सांझा न कीजिये जब तक समाप्ति की विद्धिवत घोषणा न हो तथा ब्लॉग में प्रकशित न हो.
८. विशेष : यह समूह सभी सदस्य हेतू है और निर्णायक दल के सदस्य भी एक सदस्य की भांति अपनी रचनाये लिखते रहेंगे. हाँ अब उनकी रचनाये केवल प्रोत्साहन हेतू ही होंगी.

धन्यवाद !
इस बार की विजेता है सुश्री मिनाक्षी कपूर मीनू 
(बधाई एवं शुभकामनाएं तकब परिवार की ओर से )

आभा Ajai Agarwal
~एक क्लिक में ढूंढो ,चमको~
=========
गूगल बाबा ,गूगल बाबा ,
मुझको बना दिया ध्रुव तारा ,
नेट में ढूंढो मेरा नाम ,
एक क्लिक से होगा काम ,
गली गाँव शहर देश क्या
दुनिया भर के नामों में
तुम पहचाने जाओगे यदि
गूगल पर आ जाओगे ,
फेसबुक ,बलॉगर ट्वीटर
बहुत सारे पोर्टल यहां
याहू भी कर सकते हो
इंस्टाग्राम है मस्त यहां
मन की बात करो ट्विटर पे
गरियाओ हल्के हो जाओ
ब्लागर में जाकर तुम
किस्से कहानी कह आओ।
कितना अच्छा लगता है
सुंदर सपना लगता है
दुनिया में कोई भी -
मुझसे अब मिल सकता है
अरबों खरबों की भीड़ में
मेरा अलग वजूद यहां
नाम मेरा तुम टाइप करो
एक क्लिक में मुझसे मिल लो
ऑन लाइन आ जाओ सब
इस आकाश पे टिमटिमाओं सब।
गूगल अर्थ पे जाओ तुम
गाँव गली भी मिल जायेगी
और जरा सी सर्च करो
अंगने में माँ ,
खेतों में बापू दिख जायेगा।
एक क्लिक की बात है प्यारे
भीड़ में अलग नजर आओगे
आओ ऑन लाइन हो जाएँ ,
पढ़े पढायें देश बनाएं
एक क्लिक में हो शॉपिंग
एक क्लिक में सारे काम
प्रदूषण भी होगा कम
ईधन भी बच जायेगा
समय अलग बचेगा जो
काम हमारे आएगा

टिप्पणी: मेरे अनुसार एक क्लिक में आज सारी दुनिया सिमट आती है आपकी मुट्ठी में --आप के नाम पे क्लिक और आप चमकने लगते है --गूगल बाबा की करामात -- एक क्लिक से ढूंढिए अपने को अपनों को हो जाइये ऑनलाइन ,करलो दुनिया मुट्ठी में ---शायद मैं चित्र से न्याय कर पायी हूँ -------



किरण श्रीवास्तव
~तलाश~
------------
मुझे है
तलाश..!!
इंसान की ।
जो हो
वास्तव में
इंसान....।
इंसानियत हो,
जिसकी पहचान ।
कठीन हो,
शायद अभियान ।
दिनों-दिन
होती जा रही
मुश्किल रूझान...
इंसानी मुखौटो में,
भेड़िए बदहवास-
जो कर देते
इंसानियत को,
शर्मसार..
सरे बाजार!!
बेच देते जमीर
दिखाते झूठी शान,
साधू संत भी
कर देते,
इंसानियत को
लहूलुहान ..!
गर मिल जाये
इंसान तो
कर लूं दीदार
तो हो जाये
पूरी मेरी
तलाश...!!!!!!

टिप्पणी-
आजकल इंसान में इंसानियत का ह्रास होता जा रहा इंसान और पेशे दोनों कलंकित होते जा रहे ऐसे में एक सच्चे इंसान की तलाश शायद नामुमकिन लगने लगा है..!!




प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
~ मेरी पहचान ~

छिपने लगा था हर भीड़ में
तुमने न जाने कैसे पहचान लिया
अपने में ही सिमटा था मेरा व्यक्तित्व
क्यों उसे मेरे ही सामने खड़ा कर दिया
वैसे सच कहूं
मेरी पहचान का अस्तित्व
लोगो की भीड़ में दम तोड़ रहा था
मेरी पहचान में अपनी पहचान
ढूँढने वाले लोग भी
अपना नया साम्राज्य संवारने लगे
नई पहचान की पहचान बनकर
और
व्यतीत जीवन के कटु अनुभव
मेरे ऊपर पहाड़ सा भार बन
मुझे जमीन के नीचे धकेल रहे थे
और भीड़
शरीर के हर हिस्से को कुचलते हुए
तेजी से कदम बढ़ा रही थी
मेरे होने का झूठा भ्रम
टूटने ही वाला था
कि तुमने
मुझे भीड़ से निकाल
फिर अपने आवरण में समेट
पहचान लौटा दी है
हाँ तुम मेरा हौसला
तुम मेरी उम्मीद
या शायद
वक्त हो या फिर नियति हो

टिप्पणी: खुद से खुद की पहचान होना जरूरी है, अपने हौसले और उम्मीद का दामन पकड आगे बढ़ना होगा फिर नियति और वक्त आपके साथ होंगे




ब्रह्माणी वीणा हिन्दी साहित्यकार
~ आभासी संसार ~
÷÷÷÷÷÷÷÷÷

आजकल, आभासी युग में ,
लोगों को पहचानना
बड़ा ही मुश्किल है ,
कि कौन सा चेहरा जाहिल है?
कौन सा व्यक्ति काबिल है?
सफेद पोश भेड़िए
घूमते रहते इधर उधर /
माँ बहनों की अस्मिता को,
तार तार कर देते हैं इस कदर /
माना कि वैज्ञानिक अन्वेषक,
आसमान तक पहुँच गए,
जाॅच संस्थाएँ
खगालती हैं छुप छुपकर
दोषी व निर्दोषी के घर मे घुसकर /
किन्तु राजनीति का गढ ?
अज्ञात सफेद पोशों का अड्डा है !
कौन नेता कहाँ और कैसा है?
पहचानना कठिन जैसा है /
कई कई चेहरे रखते तमाम हैं /
इनका फैला हुआ तामझाम है //
************************
*************************

टिप्पणी: आज कल दूर भाषी यंत्रों का जाल बिछा है फिर भी दोषी को पहचानना मुश्किल है समाज सफेद पोशों से भर गया है कई कईचेहरे रखते हैं तमाम लोग, ,,,,,,


डॉली अग्रवाल
~ मुखोटा ~

मुझे मुखोटा ओढ़ जीना आ गया
बिन हँसी के हँसना आ गया
ये लो दोस्तों , मुझे भी इंसान बनना आ गया
आँखे भरी है बहती नही
दर्द है चीख आती नही
हँसी है पर होंटो पर आती नही
मेरी ख़ामोशी मेरा रूप बन गया
मुझे भी इस गुमनाम से जहाँ में जीना आ गया !
ज़िन्दों का काफिला है
मुर्दो सी सोच का
मुझे मुर्दाओं के लिए नही
ज़िन्दों के लिए आँसू बहाना आ गया !
नफरतों के बाज़ार में
खुद को बचाना आ गया
आईने में खुद को खुद से मिलाना आ गया
मुझे भी इंसान बनना आ गया !!

टिप्पणी: अतीत की स्मृति , और भविष्य की कल्पना कभी इंसान को खुद से मिलने नही देती !




 Madan Mohan Thapliyal  
तीन आखर- आदमी /मानव
***************

वीक्ष ( लेंस ) से टटोला
अपने एहसास को झिंझोड़ा
हाय ! कोई भी न मिला भीड़ में
जो कह दे, औरों से अलग है ए आदमी.

चाहत तो थी, खुद की पहचान बन जाऊँ मैं
विडम्बना देखिए, खड़ा दहलीज पर
चौखट की ओट से झांकता
अपने को अलग खड़ा देखता है आदमी.

बुद्धिचातुर्य से वशीभूत
स्वयं की मिसाल खोजता रहा उम्र भर
विश्व विजय की पताका लिए हाथ में
खुद से खुद ही हारता रहा आदमी.

एक सी काया, एक सा रूप
फिर भी अपने स्वरूप से बेखबर
धर्म के जाल में उलझता, नाहक-
औरों से उम्र भर बैर लेता मोल आदमी.

बुद्धि की विलक्षणता कहूँ
या सनक है तेरी
अमरत्व पाने की धुन पे हो सवार
हर पल दफन हो रहा है आदमी.

अपनी चाहत औ नसीहत
लिख दी उसने तेरी तकदीर में
जब छोड़ना होगा जहां को , उठा लेगा
देखता रह जाएगा, साथ था जो आदमी.

एक सांस का ही तो उलटफेर है, नादां
चल रही है तो घमण्ड में चूर है
दान,पुण्य, पूजा-अर्चना सब धरी रह जाएगी
आखिरी सांस लेगा जिस क्षण आदमी .

न कोई साथ आया न साथ जाएगा
लिए दिए का हिसाब होगा जमीं पर
राख का ढेर हो या माटी का
टटोल लो, कहीं दिखेगा नहीं आदमी.

है जिस देह पर अभिमान उसको
पंचतत्वों से है निर्मित, उन्हीं में मिलेगा
बेसुध खड़ा कतार में अलग दिखने के लिए
न जाने किस मोह से भ्रमित है आदमी .

मानव हो मानव बन कर रहो
यही तेरी सच्ची पहचान है
जनाजे के वक्त हर मुख से निकले ए दुआ
देखो ! वो जा रहा है, जो था सच्चा आदमी.
*********

टिप्पणी : मानव ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है, लेकिन आदमी को अपने गुरूर के आगे ईश्वर के बनाए सारे नियम अर्थहीन लगते हैं और इसी ऊहापोह में उलझकर एक दिन संसार से विदा हो जा है.



नैनी ग्रोवर
~ रिश्ते ~

इतना करीब से,
रिश्तों को देखा ना करो,
सिवाय मायूसी के,
कुछ भी हाथ ना आएगा...
साथी सभी हैं नश्वर तन के,
खोखले गिठाव बन्धन के..
माया के जाल में जकड़े हैं,
मतलब से हाथ ये पकड़े है..
धन और तन के ये झूठे नाते,
बदल के भेस मन को हैं लुभाते..
सुखों के पल में जो संग आयें..
आये दुःख तो किनारा कर जाएँ..
ऐसे अपनों से क्या कहिये,
अच्छा तो यही है के चुप रहिये..
कीजे कर्म अपना अपना,
क्यों देखें रोग दूजे के मन का..
जहाँ तक साँसों का आना जाना है,
तब तक तो साथ निभाना है...
एक दिन तो अकेले जाना है,
नहीं साथ कोई भी आना है..
फिर क्यों रिश्तों को रोऊँ मैं,
क्यों अपना समय गवाउँ मैं...
कोई अच्छा कर्म तो कर जाऊँ,
निर्भय होके प्रभु के दर जाऊँ..
मायावी दुनियां की छोड़ो बातें,
साथ ना कुछ भी जाएगा...
इतना करीब से,
रिश्तों को देखा ना करो,
सिवाय मायूसी के,
कुछ भी हाथ ना आएगा....!!

टिप्पणी :- भाव तो आप सब गुणीजन समझ ही गये होंगे, तस्वीर देख कर यही उत्तपन हुए ...।।



अलका गुप्ता
*हों जागरुक !*
************

प्रदर्शक ये !
चुनाव जनता का !
नेतृत्व खास !

नेता अपना !
जाँच पड़ताल के !
चुनें ध्यान से !

हो जागरुक !
कर्मठ जिम्मेदार !
ईमानदार !

देश संवारे !
भविष्य वर्तमान !
नेता महान !

प्रतिनिध से !
हो देश विकसित !
करें विचार !

टिप्पणी - देश की उन्नति चाहिए तो हमें ईमानदार कर्मठ नेता को पूरी जागरूकता के साथ चुनना होगा



प्रभा मित्तल
--अकेलापन--

चारों तरफ लोगों का हुज़ूम
बीच खड़ा एक बेबस आदमी
ये कैसी बेकल बेकसी है
कभी भीड़ में भी अकेले
तो कभी अकेले में भी
लग जाते हैं मेले...

​इस जीवन दर्शन ने
एकांत के सिलसिले में
मन ने, लो आज मन को
फिर से झकझोर दिया।
यादों की गठरी खुल गई
कुछ ने तो बेरहमी से
मुझको घेर लिया।

घंटों ..पहरों ...बीत गए
फुर्सत नहीं मिली
उन यादों से, जो कभी
निकली नहीं जेहन से।

अन्तर में रचे बसे
चलते-फिरते उन चेहरों से
कितनी ही बार अपनी कहते
अपने ही कानों सुना है मैंने
क्या देखा है तुमने मुझको
खुद से खुद की बातें करते...

मन ही मन मीलों चलकर
मंज़िल तय करते
हर मोड़ पर ठहर-
ठिठक मुड़ मुड़ कर
देखते ...हर बार
साथ चलने की चाह में
चार कदम आगे चलकर
दो डग पीछे हट जाते
क्या देखा है तुमने मुझको
रुक रुक कर रस्ता तय करते।

आखिर मिट गई दुविधा सारी
रिश्तों का हुजूम तो था भारी
पर आदमी भीड़ में अकेला
बहुत हुआ वक़्त का खेला

अब मंजिल दूर नहीं
वक़्त के थपेड़ों से लड़ना सीखा
इन कदमों ने चलना सीखा
जब भी अँधेरों रास्तों से गुज़रती हूँ
मन का उजाला साथ चलता है
अकेला आदमी कभी नहीं होता
उसका जमीर हरदम साथ होता है।

टिप्पणी: आदमी कभी अकेला नहीं होता उसका अनतःकरण हमेशा उसका साथ देता है।



मीनाक्षी कपूर मीनू
~आईना मन का~
,,,,,,,,,,,,,,

सभी इंसान अच्छे लगते है
मन के सच्चे लगते हैं
ख़ुशी से जब हाथ
पकड़ के
एक दूजे का
झूमते हैं तो सच में
बिलकुल बच्चे लगते है
अचानक मन बदलने लगता है
आँखों पर पर्दा पड़ जाता है
जाति वाद या धर्म का
झूठ का या
कच्चे कान के मर्म का
अवसाद मन का छा जाता है
तन पर
और आँखों का आईना
अब नहीं देखता समान
बदल देता है
सफेद को नीले पीले में
क्योंकि ,,, मनस्वी
मन बदलने से
वही दीखता है
जो हम देखना चाहते है
सब बदला बदला सा
वो अपना नहीं
बीच में हाथ पकड़ा खड़ा
नकाबपोश काला है
पीठ में छुरी चलायेगा
अपना होते हुए भी
पराया है।

टिपण्णी: मन भटकने से हम रास्ता भटक जाते है । सच झूठ का अंतर नकार हम वही देखने लगते है जो हमारी मन रूपी आँखों का आईना दिखाता है तब समान भाव में भी अलगाव नज़र आ ता है ।


प्रेरणा मित्तल 
~ख़ास~
*****

हज़ारों-लाखों आमों के बीच, कोई ख़ास,
नज़र रुक जाती है बस, उसी के आसपास।
जैसे हो हंसों के बीच एक कौआ,
या हो कौओं के बीच कोई हंस।

ग़ुदड़ी का लाल हो या दीपक तले अंधेरा,
पृथक हो भीड़ में बस, जिसे लोग निहार सकें,
श्वेत हो तो मर सकें या ईर्ष्या से जल सकें,
उँगली उठाकर स्याह पर, अहम् को हवा दे सकें।

जो बन गया, किसी के लिए इतना विशेष,
क्या अनजान था वह, या कुछ परवाह थी शेष।
क्या भिज्ञ था इससे, कि कुछ ख़ास है उसमें,
तभी तो आकर्षण जन्म लेता है, लोगों के दिल में।

या नितांत अनभिज्ञ, दूसरों की उठती निगाहों से,
जो दूर तक पीछा करतीं, उसके पदचिह्नों का,

उन नेत्रों में मंशा बस,
उसे ख़ास से आम बनाने की,
या स्वयं आम से ख़ास बनने की।

टिप्पणी : जो सबसे अलग हो चाहे अच्छा हो या बुरा सबके ध्यान का केंद्र बन जाता है। लेकिन क्या उसे इस बात का अहसास होता है ? और देखने वाले की नीयत भी अलग - अलग होती है।


सभी रचनाये पूर्व प्रकाशित है फेसबुक के समूह "तस्वीर क्या बोले" में https://www.facebook.com/groups/tasvirkyabole/